आत्मा
आत्मा ब्रह्म का स्वरूप है । आत्मा को वासना, सुरता या रूह भी कहते हैं ।
आत्मा और जीव में वही अन्तर है, जो दिन और रात में होता है । आत्मा सत्य है और जीव असत्य (स्वाप्निक) है ।
परिचय
आत्मा के अन्तर्गत ईश्वरी सृष्टि और ब्रह्म सृष्टि आते हैं, परन्तु यहां ब्रह्मसृष्टि को ही आत्मा मानकर विवेचना की गई है ।
उत्पत्ति
आत्मा की कभी उत्पत्ति नहीं होती, वह अनादि (हमेशा से) है । आत्मा साक्षात् परब्रह्म (अक्षरातीत पुरुष) का अंग है, इसलिए उसे परब्रह्म के समान ही समझना चाहिए ।
निवास
आत्मा का घर अखण्ड धाम है ।
लीला
आत्मा अपने प्रियतम अक्षरातीत के साथ प्रेम और आनन्द की लीला करती है । आत्मा के अन्तःकरण में सदैव परब्रह्म वास करते हैं ।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि यदि आत्मा संसार में आती है, तो जीव और आत्मा एकसाथ एक ही शरीर में विराजमान रहते हैं । ऐसी स्थिति में जीव कर्ता होता है, जबकि आत्मा दृष्टा बनकर उसके कार्यों को देखती है ।
अन्त
आत्मा अमर है, उसका कभी अन्त नहीं होता । परब्रह्म का अंग होने के कारण वह अनन्त काल तक उनके साथ धाम में विहार करती रहेगी ।
आत्मा की यात्रा
हमारे आड़े चौदे तबक (लोक) और मोह तत्व या निराकार-निरंजन है । हमें इसके पार पहुंचना है । इसके पार पिया का वतन (धाम) है ।1
बीच में ऐसा पंथ (मार्ग) है, जिस पर न तो पांव (कर्मकाण्ड व उपासना) से चला जाता है, न ही पंख (श्रद्धा और प्रेम) से उड़ा जाता है । परन्तु यह सब (अवरोध) तभी तक दिखता है, जब तक कंथ (प्रियतम) के दर्शन नहीं हो जाते ।2
अब तन, मन और वचन से आत्मा की आशा अपने प्रियतम से बंधी है । महामती कहती हैं कि खसम के हुकम के बिना कोई यहां (धाम में) नहीं आ सकता ।3
आत्माओं के बीच सम्बन्ध
हम तुम एक वतन (धाम) के हैं और हमारी आत्मा दो नहीं है (एक स्वरूप है) ।4
(1) कलस हिन्दुस्तानी 4/16 (2) कलस हि. 4/17 (3) कलस हि. 4/18 (4) कलस हि. 11/33
