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आवेश | Aavesh

परब्रह्म सशरीर कभी इस स्वप्नमयी संसार में नहीं आते, अपितु वे अपने आवेश (शक्ति स्वरूप) के माध्यम से संसार में लीला करते हैं । परब्रह्म का आवेश सिर्फ धाम की आत्मा पर ही विराजमान होता है, कभी अकेले जीव पर नहीं आता ।

श्री कृष्ण में परब्रह्म का आवेश

अक्षर की जो मूल सुरत (आत्मा) है, जिन्हे प्रेम-स्नेह की लीला देखने की चाहना थी, वह सुरत प्रियतम (अक्षरातीत) के आवेश को लेकर नन्द घर में प्रवेश कर गई ।1

महामती जी के तन में आवेश

(श्री राज ने) हाथ पकड़कर मुझे बैठाया और मेरे अंग में अपना आवेश (शक्ति स्वरूप) दे दिया ।2

(प्रियतम ने) अपना अंग, (धाम की) बुद्धि और आवेश (शक्ति) देकर मुझ (इन्द्रावती) से कहा- तू मुझे प्यारी है । तुझे हुकम करता हूं कि सब (ब्रह्मसृष्टियों) को (जागनी का) सुख दो ।3

मुझ पर प्रियतम का आवेश है, जिससे मैं सुहागिनों को एकत्रित करूंगी । सब सुहागिन मिल कर मूल वतन (धाम) का सुख लेंगी ।4

आवेश का हिस्सा

मैं सब सैयों को आवेश का हिस्सा देऊंगी, जिससे उनके मनोरथ पूर्ण हो जाएंगे और सब मिलकर हर्ष से घर (धाम) में जाग्रत होंगी ।5



(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/29 (2) कलस हिन्दुस्तानी 9/4 (3) कलस हि. 9/30 (4) कलस हि. 21/13 (5) कलस हि. 21/16