परमहंस बाबा दयाराम | Baba Dayaram
दयाराम जी का जन्म विक्रम सम्वत् 1785 में ग्राम कबीरवाला, जिला मिन्टगुमरी (वर्तमान जिला साहिवाल, पाकिस्तान) में हुआ था । उनके पिता का नाम कन्हैया लाल और माता का नाम राधा बाई था । उनके दो बड़े भाई थे- गोवर्धन दास और छबील दास ।
बाल्य काल में ही दयाराम जी के मन में वैराग्य भावना उत्पन्न हो गई । विवाह आदि में उनकी कोई रुचि नहीं थी । वे सांसारिक मोह-लोभ से दूर रहते थे । वे बहुत दयालु प्रवृत्ति के थे और उनकी बुद्धि प्रखर थी । उनके अन्दर ऐसे गुणों को देखकर लोग उन्हें बाबा कहकर पुकारने लगे ।
बाबा दयाराम की रुचि धार्मिक ग्रन्थों और कथाओं में रहती थी । पन्द्रह वर्ष की आयु तक उन्होंने शास्त्र, भागवत, रामायण, गीता, आदि अनेक ग्रन्थों का अध्ययन कर लिया । धर्म ग्रन्थों के अध्ययन से उनके मन में परम तत्व के प्रति जिज्ञासा और तीव्र हो गई । अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे सच्चे सद्गुरु की खोज में घर से पैदल निकल पड़े ।
बाबा दयाराम तीन वर्ष तक ऋषिकेश में रहे । फिर सद्गुरु की खोज में वे पैदल मथुरा, प्रयागराज, काशी, गया, रामेश्वरम, आदि तीर्थों की यात्रा करते हुए द्वारिका पहुंचे । द्वारिका में उन्हें एक दिव्य स्वरूप का दर्शन हुआ और उस स्वरूप ने निर्देश दिया कि मल्काहांस में दरबारा सिंह की शरण में जाओ, वहां तुम्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त होगा ।
बाबा दयाराम पहले भी मल्काहांस (वर्तमान जिला पाक पटन, पाकिस्तान) में भाई दरबारा सिंह का दर्शन कर चुके थे । उनका मन गुरु दर्शन के लिए तड़पने लगा । वे द्वारिका से मल्काहांस के लिए चल पड़े । विक्रम सम्वत् 1820 में वे मल्काहांस पहुंचे और भाई दरबारा सिंह से ब्रह्मज्ञान प्रदान करने की प्रार्थना की । भाई दरबारा सिंह ने उन्हें निजानन्द दर्शन की मूल बातें समझाकर तारतम दे दिया । बाबा दयाराम बहुत प्रसन्न हुए ।
अब बाबा दयाराम पूरे हृदय से सद्गुरु दरबारा सिंह की सेवा में समर्पित हो गए । उनकी श्रद्धा, सेवा और प्रेम भाव से सभी बहुत प्रभावित हुए । दयाराम जी के मुख से वाणी चर्चा तथा परमधाम का वर्णन सुनकर सबको आनन्द मिलने लगा । उनसे मुखरित ब्रह्मज्ञान के प्रकाश की किरणें दूर-दूर तक फैलने लगीं । बहुत से सन्त-महात्मा और सामान्य जन उनसे शिक्षा व दीक्षा लेने के लिए आने लगे । बाबा दयाराम की सक्रियता से मल्काहांस का मन्दिर एक तीर्थ के समान बन गया । वहां आने वालों के लिए आवास की व्यवस्था कर दी गई और भण्डारा होने लगा ।
एक वर्ष पश्चात् भाई दरबारा सिंह का धामगमन हो गया । उनके उपरान्त सबने बाबा दयाराम से उस स्थान का संरक्षण सम्भालने का आग्रह किया, परन्तु बाबा दयाराम ने अपनी असमर्थता व्यक्त की । उनके मन में श्री राज का प्रेम पाने की इच्छा थी, किसी पद या गादी का कोई लालच नहीं था । तब भाई दरबारा सिंह के छोटे भाई जीवन दास को गादी पर बैठाया गया ।
विक्रम सम्वत् 1822 में बाबा दयाराम पुनः यात्रा पर निकल पड़े । वे लम्बी, कठिन, पैदल यात्रा करके श्री पद्मावती पुरी, पन्ना पहुंचे । वहां पर उन्होंने बीतक और श्री कुलजम सरूप का अध्ययन किया । चौपड़ा मन्दिर की महिमा को समझते हुए, बाबा दयाराम वहां पर साधनारत हो गए । इस साधना के फलस्वरूप उन्हें युगल स्वरूप का दर्शन प्राप्त हुआ और यह भी पता चला कि वे परमधाम की केशर बाई की वासना हैं ।
बाबा दयाराम दस वर्ष तक पन्ना में रहे । इसके पश्चात् वे अन्य आत्माओं की जागनी और तारतम ज्ञान के प्रसार के लिए निकल पड़े । बीतक के अनुसार, जहां-जहां पर श्री प्राणनाथ के चरण पड़े थे, वहां-वहां दर्शन व जागनी करने बाबा दयाराम गए । वे श्री नवतनपुरी (जामनगर), विजावर, चित्रकूट, कालपी, रामनगर, आकोट, औरंगाबाद, उज्जैन, अनूपशहर, दिल्ली, हरिद्वार, मथुरा, मेड़ता, अहमदाबाद होते हुए श्री महामंगल पुरी (सूरत) पहुंचे । अन्त में विक्रम सम्वत् 1860 (सन् 1803) में वे श्री पद्मावती पुरी (पन्ना) पहुंचे । वहां से श्री राज की प्रेरणा से वे मल्काहांस के लिए निकल पड़े ।
मल्काहांस के गादीपती भाई जीवन दास का धामगमन हो चुका था । उन्हें न पाकर बाबा दयाराम गम्भीर हो गए । भाई जीवन दास के स्थान पर प्रेम दास जी को गादी पर बैठाया गया था । उन्होंने बाबा दयाराम का यथोचित सत्कार किया । बाबा दयाराम के लौटने पर सुन्दरसाथ को भी प्रसन्नता का अनुभव हुआ ।
दो वर्ष पश्चात् प्रेम दास जी का भी धामगमन हो गया । मल्काहांस का स्थान पुनः संरक्षण विहीन हो गया । सभी ने बाबा दयाराम से गादी सम्भालने की प्रार्थना की, परन्तु उन्होंने पहले की तरह अपनी असमर्थता व्यक्त की । तब कुछ सुन्दरसाथ अपने सिर पर श्री कुलजम सरूप रखकर बाबा दयाराम के समक्ष आए और पुनः प्रार्थना करने लगे । वाणी के सम्मान हेतु वे मना न कर सके और मजबूरी में स्वीकृति दे दी ।
यह बात आसपास के क्षेत्रों में आग की तरह फैल गई । असंख्य सुन्दरसाथ बाबा दयाराम के दर्शन करने मल्काहांस पहुंचने लगे । पाक पटन, चीचावतनी, बहावल नगर, दिपालपुर, कमालिया, कबीरवाला, आदि स्थानों से बहुत लोग मल्काहांस पहुंच गए ।
सबकी उपस्थिति में बाबा दयाराम को सम्मानपूर्वक गादी पर बैठाया गया । विशाल भण्डारा हुआ । सब सुन्दरसाथ की खुशी का ठिकाना नहीं था । बाबा दयाराम के मुख से वाणी चर्चा सुनकर व आशीर्वाद प्राप्त करके सब वहां से विदा हुए ।
श्री कुलजम सरूप के ज्ञान का प्रकाश सब ओर फैलने लगा । मल्काहांस के मन्दिर की महिमा इतनी बढ़ गई कि सभी धर्म और वर्ग के लोग वहां आने लगे । बाबा दयाराम ने पूरे पंजाब में जागनी का डंका बजा दिया । सैंकड़ों आत्माओं की जागनी हुई । मिन्टगुमरी (वर्तमान साहिवाल), लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद), पाक पटन, मुलतान, लाहौर, अमृतसर, आदि जिलों में ब्रह्मज्ञान की गूंज होने लगी । बाबा दयाराम का दर्शन पाकर सबको सुख की प्राप्ति होती थी और उनके आशीर्वाद से सबके कष्ट भी दूर हो जाते थे । यह लीला तेइस वर्ष तक चली ।
विक्रम सम्वत् 1885 (सन् 1828) में सौ वर्ष की आयु में बाबा दयाराम ने ब्रह्ममुहूर्त में जीवित समाधि ले ली । उनके विछोह से पूरे समाज में दुःख की लहर फैल गई । सभी सुन्दरसाथ मल्काहांस की ओर भागने लगे । उनकी समाधि के चारों ओर एकत्रित सुन्दरसाथ जोर-जोर से विलाप कर रहे थे । वह बहुत ही हृदय विदारक दृश्य था । किसी तरह साधु-महात्माओं ने लोगों को समझाकर शान्त किया ।
उनकी समाधि पर माथा टेकने से लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होने लगीं, इसलिए सभी धर्म के लोगों की भीड़ वहां लगने लगी । ज्ञान, प्रेम, सेवा, तप, त्याग की मूर्ति बाबा दयाराम की महिमा ऐसी है कि आज भी सुन्दरसाथ उन्हें याद करते हैं, परन्तु उनके सच्चे अनुयायी तो वे हैं जो उनके बताए मार्ग पर चलकर दिखाएं ।
सन् 1947 में देश के बंटवारे के बाद मल्काहांस की सेवा श्री कृष्ण प्रणामी मन्दिर, करनाल में पधरा दी गई । आज भी वहां पर बाबा दयाराम की स्मृति में हर वर्ष मार्च में कार्यक्रम होता है ।
