परमहंस भैया सीताराम | Bhaiya Sitaram
जब श्री प्राणनाथ रामनगर पधारे, तो अनेक आत्माओं की जागनी करी । उनमें से एक बिहारी दास थे । कुछ वर्षों पश्चात् यही बिहारी दास जब पन्ना आए, तो इन्होंने सीताराम जी को जगाया । भैया सीताराम के अन्दर धाम की वासना थी और वे भजन में लीन रहते थे ।
एक दिन भैया सीताराम बंगला जी में सो रहे थे, तब साक्षात् श्री प्राणनाथ ने उन्हे दर्शन दिया और कहा कि तुम पंजाब चले जाओ, जरा भी देर मत करो । कमालिया में दर्शन भगत नाम की धाम की वासना है, उसे जाकर जाग्रत करो । पंजाब में धाम की एक हजार वासनाएं उतरी हैं । उन्हें जगाने का यश तुम्हें मिलेगा, मन में कोई चिन्ता मत करो । यह सब मुद्दा मेरे हाथ में है और इसकी शोभा तुम्हारे सिर पर है ।
श्री जी की आज्ञा को शिरोधार्य करके भैया सीताराम चल पड़े । उन दिनों यातायात की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी । सीताराम जी वृद्ध हो चुके थे, फिर भी वे पैदल कठिन यात्रा करते हुए कमालिया (वर्तमान जिला फैसलाबाद, पाकिस्तान) पहुंचे ।
भगत दर्शन दयाल संसार में मृतक के समान रहते थे । उन्हें धन-सम्पत्ति अथवा अन्य सांसारिक वस्तुओं का कोई लोभ नहीं था । भगत दर्शन दयाल के भक्तिबल की महिमा दूर-दूर तक फैली हुई थी और लोग मनोकामना की पूर्ति के लिए उनके पास आते थे ।
उस क्षेत्र में क्षत्रिय और अरोड़ा जाति के लोग रहते थे । वे भगत दर्शन दयाल के भजन आनन्द से सुना करते थे । उनके भजन पंजाबी भाषा में हैं । उन लोगों का खानपान सात्विक नहीं था । वे लोग भगत दर्शन दयाल के समझाने पर भी मांस-मदिरा का सेवन त्यागना नहीं चाहते थे ।
भैया सीताराम भगत दर्शन दयाल से मिले और उन्हे उपदेश दिया, किन्तु भगत जी के हृदय पर जरा भी असर नहीं पड़ा । वे कई दिन तक सत्संग और आध्यात्मिक चर्चा करते रहे, परन्तु उनके सभी प्रयास विफल हुए । अन्त में वे हताश होकर अपने साथियों के साथ श्री पद्मावती पुरी, पन्ना वापस लौट आए ।
कुछ दिनों के बाद भैया सीताराम को स्वप्न में दोबारा हुकम हुआ कि तुम फिर से पंजाब जाओ और दर्शन भगत को जगाओ । अब उनका जाग्रत होने का समय आ गया है, वे तुम्हारी एक-एक बात मान लेंगे । भैया जी की पंजाब जाने की इच्छा तो नहीं थी, किन्तु श्री जी के आदेश को शिरोधार्य करके पुनः पंजाब के लिए निकल पड़े । इस बार वे अपने सिर पर श्री कुलजम सरूप लेकर चले ।
वृद्ध अवस्था में श्री कुलजम सरूप को सिर पर धारण करके एक हजार कि.मी. पैदल यात्रा करना सरल नहीं होता । परमहंसों ने श्री राज का हुकम पूरा करने के लिए बहुत कुर्बानियां दी हैं । पैदल चलते समय जब उन्हें विश्राम करना होता, तो भैया सीताराम ग्रन्थ को किसी ऊंचे व स्वच्छ स्थान पर रख देते । लम्बी यात्रा के बाद अन्ततः वे गन्तव्य तक पहुंच गए ।
कमालिया पहुंच कर भगत दर्शन दयाल से भेंट हुई । उन्होंने सीताराम जी के सिर पर शोभायमान पूज्य ग्रन्थ के दर्शन किए और स्वागत-सत्कार किया । भैया सीताराम ने अपने सिर पर धारण श्री कुलजम सरूप वाणी की महिमा सुनाई । भगत दर्शन दयाल बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने श्री मुख वाणी को सम्मानपूर्वक एक पावन स्थल पर पधराया ।
इसके बाद तारतम ज्ञान के विषय पर चर्चा होने लगी । सीताराम जी ने क्षर, अक्षर और अक्षरातीत, ब्रज, रास और जागनी लीला, परमधाम के पच्चीस पक्ष का वर्णन किया । ऐसी अलौकिक बातें सुनकर भगत दर्शन दयाल की आत्मा चौंक गई और उन्होंने भैया सीताराम से तारतम ले लिया ।
भैया सीताराम के मुख से वाणी चर्चा होने लगी । उनकी चर्चा सुनने के लिए दूर-दूर से साधू-सन्त और साधारण लोग आने लगे । मल्काहांस के भाई दरबारा सिंह और पाक पटन के टहल दास जी परमधाम की अमृतमयी चर्चा में विशेष रुचि लेते थे और तन्मयता से रसपान करते थे । भैया सीताराम और भगत दर्शन दयाल भी समय-समय पर चर्चा सुनाने मल्काहांस और पाक पटन जाने लगे ।
इस दौरान एक दिन एक दुर्घटना घटी । दर्शन दयाल जी के दो भतीजे थे- सन्त दास और कमल नयन । वे दोनों सदा उनकी सेवा में लगे रहते थे । सन्त दास का विवाह निश्चित हुआ था । विवाह की तैयारी भी हो चुकी थी कि कमल नयन की मृत्यु हो गई । परिवार में शोक का वातावरण छा गया । दुःखी होकर परिवार जनों ने व्यंग्यात्मक शैली में कह दिया कि यह सब सत्संग का फल है ।
दर्शन दयाल ने समस्त वृत्तान्त भैया सीताराम को सुनाया । भैया जी दुःखी हुए और समाधि लगा ली । उन्होंने आत्मदृष्टि से परख लिया कि यदि कोई अपनी आयु का कुछ अंश दे दे, तो बालक बच सकता है । भगत दर्शन दयाल ने अपनी आयु में से छह माह छोड़कर शेष आयु देने का संकल्प कर लिया ।
तब भैया जी ने पूछा कि क्या मैं भी अपनी आयु दे दूं ? इस पर भगत जी ने हां कह दिया । भैया सीताराम की आयु के दस वर्ष बचे थे । उन्होंने इसमें से आठ दिन छोड़कर शेष देने का संकल्प कर लिया । दोनों ने श्री प्राणनाथ से प्रार्थना की और उसी क्षण कमल नयन उठ खड़ा हुआ । परिवार में प्रसन्नता छा गई और सन्त दास का विवाह सम्पन्न हुआ ।
भैया सीताराम ने बचे हुए दिनों में बहुत वाणी चर्चा की । हजारों का जनसमूह उनकी चर्चा सुनने के लिए आने लगा । उन्होंने भगत जी से कह दिया कि जहां उनकी पंचभौतिक देह अचेत हो, वहीं उनको समाधि दी जाए । आठ दिन के बाद विक्रम सम्वत् 1800 में उनका धाम गमन हो गया । उनकी इच्छानुसार कमालिया के उसी स्थान पर भैया सीताराम के पार्थिव शरीर को समाधि दी गई ।
इस घटना के बाद भगत दर्शन दयाल ने वाणी चर्चा को जारी रखा । एक दिन मल्काहांस में भाई दरबारा सिंह से चर्चा के दौरान भगत दर्शन दयाल ने पूछा-
या कुरान या पुरान, ए कागद दोऊ परवान । याके मगज मायने हम पास,....
भगत दर्शन दयाल ने चौथा चरण नहीं कहा । तब दरबारा सिंह जी सोचने लगेे कि इसका चौथा चरण क्या होगा ? फिर उन्होंने श्री मुख वाणी का अध्ययन करके उत्तर दिया- अन्दर आए खोले प्राणनाथ ।
उत्तर सुनकर भगत दर्शन दयाल बहुत प्रसन्न हुए । भगत दर्शन दयाल की प्रेरणा से भाई दरबारा सिंह के संरक्षण मेें मल्काहांस में श्री कुलजम सरूप की सेवा पधराई गई ।
भगत दर्शन दयाल निश्चिन्त होकर कमालिया आ गए और भैया सीताराम की समाधि के पास रहते हुए ध्यान करने लगे । उनके मन में इस बात का दुःख था कि उन्होंने भूलवश अपने सद्गुरु भैया सीताराम की आयु हर ली । वह काफी समय तक अन्न त्याग कर विलाप करते रहे और छह माह पूर्ण होने पर उनका धामगमन हो गया ।
भैया सीताराम की समाधि पर अनेक चमत्कार होने लगे । हिन्दू और मुसलमान सभी उसे पूजते थे और मनवांछित फल पाते थे । देश के विभाजन के पश्चात् कमालिया की सेवा जालन्धर आ गई और यहां भी भैया सीताराम की स्मृति में हर वर्ष वसन्त पंचमी पर मेला मनाया जाने लगा ।
