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ब्राह्मण | Braahman

हिन्दू समाज के चार वर्णों में से पहला ब्राह्मण है, जो वैदिक ज्ञान के पठन-पाठन, यज्ञ करने, पूजा-पाठ करवाने का कार्य करते हैं । ब्राह्मण स्वयं को अन्य वर्णों से श्रेष्ठ मानते हैं । वे शरीर की स्वच्छता और कर्मकाण्ड पर पूरा ध्यान देते हैं ।

क्या अध्यात्म के अनुसार ब्राह्मण श्रेष्ठ है?

एक तन ब्राह्मण का है । दूसरा तन चाण्डाल का है, जिसके छूने से छूत मानते हैं और उसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं ?1

यदि चाण्डाल का हृदय निर्मल हो, तो वह भगवान के साथ खेलता है । वह किसी के सामने दिखावा नहीं करता, (अपनी भक्ति को) गोपनीय रखता है । उसका हृदय एक क्षण के लिए भी भगवान से अलग नहीं होता और सच्चे प्रेम व आनन्द में मग्न रहता है । वह सदैव आत्मा की दृष्टि से देखता है और देह से आसक्ति नहीं रखता ।2

जो ब्राह्मण के भेष में है, उसकी दृष्टि बाहरी (शारीरिक) है । वह वेद के अनुसार छह कर्मों (यजन, याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान लेना, दान देना) का पालन करता है । श्याम (परमात्मा) कभी एक क्षण के लिए उसके स्वप्न में भी नहीं आते और वह ब्रह्म के रहस्यों को नहीं जानता । अपने परिवार का पेट भरने के लिए वह शरीर की उत्तमता का दिखावा करता है । वाद-विवाद में वह (संस्कृत) व्याकरण के आधार पर कई प्रकार के अर्थ करता है ।3

अब बताओ किसके छूने से शरीर में छूत लगती है ? ब्राह्मण अधम (नीच) है और उसके हृदय में अन्धकार है, जबकि चाण्डाल के हृदय में प्रकाश है ।4

सबको देह की पहचान (जानकारी) होती है, किसी के पास आत्मा की दृष्टि नहीं है । विराट का चलन उल्टा है और सारी सृष्टि इसी प्रकार चलती है ।5



(1) कलस हिन्दुस्तानी 16/15 (2) कलस हि. 16/16,17 (3) कलस हि. 16/18,19 (4) कलस हि. 16/20 (5) कलस हि. 16/21