बड़ा कयामतनामा - प्रकरण १ | Bada Kayamatnama prakaran 1
खास उमत सों कहियो जाई, उठो मोमिनों कयामत आई । केहेती हों माफक कुरान, तुमारे आगे करों बयान ॥१॥
जो कोई खास उमत सिरदार, खड़े रहो होए हुसियार । वसीयत नामे देवे साख, अग्यारैं सदीं होसी बेबाक ॥२॥
बरकत दुनियाँ और कुरान, और फकीरों की मेहेरबान । ए दरगाह से आया बयान, जबराईल ले जासी अपने मकान ॥३॥
और तिन दिन होसी अंधाधुंध, द्वार तोबा के होसी बंध । कह्या होसी और रवेस, तब कोई किसी का नाहीं खेस ॥४॥
अब कहो जी बाकी क्या रह्या, निसान कयामत का जाहेर कह्या । पातसाही ईसा बरस चालीस, लिख्या सिपारे अठाईस ॥५॥
क्या हिंदू क्या मुसलमान, सब एक ठौर ल्यावें ईमान । सो क्या होसी उठे कुरान, ए विचार देखो दिल आन ॥६॥
नव सै नब्बे हुए वितीत, तब हजरत ईसा आए इत । सो लिख्या अग्यारहें सिपारे मांहें, मैं खिलाफ बात कहोंगी नाहें ॥७॥
रूहअल्ला पेहेनें जामें दोए, ए लिख्या कुरान में सोई होए । ए लिख्या छठे सिपारे मांहें, धोखे वाला जाए देखे तांहें ॥८॥
ए जो बरस ईसा की कही, तिन की तफसीर कर देऊं सही । दस अग्यारहीं बारहीं के तीस, ईसा पातसाही बरस चालीस ॥९॥
सत्तर बरस और जो रहे, सो तो पुल-सरात के कहे । मोमिन चलें बिजली की न्यात, मुतकी भी घोड़े की भांत ॥१०॥
और जो जाहेरी उमत रही, दस बिध तिनको दोजख कही । पुल-सरात कही खाँडे की धार, गिरे कटे नहीं पावे पार ॥११॥
अमेतसालून में कह्या ए, ए जाए देखो दीदे दिल के । ए जाहेर कह्या बयान, पर दिल के अंधे न सके पेहेचान ॥१२॥
दसहीं ईसा अग्यारहीं इमाम, बारहीं सदी फजर तमाम । ए लिखी बीच सिपारे आम, तीसमा सिपारा जाको नाम ॥१३॥
आए ईसा महंमद और इमाम, सब कोई आए करो सलाम । पर न देखो आंखों जाहेरी, दिल दीदे देखो चित्त धरी ॥१४॥
अजाजीलें देख्या वजूद, तो आदम को न किया सजूद । सिजदे किए तिनें बेहद, सो सारे ही हुए रद ॥१५॥
जो उनने देख्या आकार, तो लगी लानत और हुआ खुआर । तब अजाजीलें मांग्या वचन, के आदम मेरा हुआ दुस्मन ॥१६॥
इनकी औलाद की मारों राह, सबके दिल पर होऊं पातसाह । आदम अजाजीलसों ऐसी भई, आठमें सिपारें में जाहेर कही ॥१७॥
फेर तुम लेत वाही की अकल, पर क्या करो तुम जो वाही की नसल । तुम दज्जाल बाहेर ढूंढ़त, वह दिल पर बैठा ले लानत ॥१८॥
ऊपर माएने न होए पेहेचान, ए तुम सुनियो दिल के कान । हमेसां आवत है ज्यों, अब भी फेर आए हैं त्यों ॥१९॥
सब पैगंमर जहूद खिलके, विचार देखो दीदे दिल के । ओ तो आए हिंदुओं दरम्यान, जिनको तुम केहेते कुफरान ॥२०॥
तुम ढूंढ़ो अपने खिलके मांहें, तामें तो साहेब आया नाहें । जिनको तुम केहेते काफर जात, सो सबकी करसी सिफात ॥२१॥
रब ना रखे किसी का गुमान, ओ तो गरीबों पर मेहेरबान । परदा लिख्या जो हजरत के रूए पर, तिन की क्या तुमको नहीं खबर ॥२२॥
परदा लिख्या वास्ते आवने हिंदुओं मांहें, ए पढ़े इसारत समझत नाहें । जो देखत हैं जेर जबर, सो हकीकत पावें क्यों कर ॥२३॥
ऐसी हिंदुओं की कही सिफत, आखिर हिंदुओं में मुलक नबुवत । और आप हजरत रिसालत-पनाह, जहूद फकीरों में पातसाह ॥२४॥
पांचमें सिपारे में एह बयान, न मानो सो जाए देखो कुरान । और हिंदवी किताबों में यों कही, बुध कलंकी आवेगा सही ॥२५॥
सो आएके करसी एक रस, मसरक मगरब होसी बस । कोई केहेसी क्या दोऊ होसी एक बेर, तिनका भी कर देऊं निबेर ॥२६॥
ए इसारत खोले निज बुध, बिना हादी ना पाइए सुध । घोड़े को लिख्या कलंकी कर, ताकी किन को नहीं खबर ॥२७॥
जोतिष कहे विजिया अभिनंद, सब कलिजुग को करसी निकंद । अंजील कहे ईसा बुजरक, सो आए के करसी हक ॥२८॥
जहूद कहें मूसा बड़ा होए, ताके हाथ छूटें सब कोए । यों सारों ने रसम जुदी कर लई, सब बुजरकी धनी की कही ॥२९॥
ओ उरझे जुदे नाम धर, रब आलम का आया आखिर । अपनी अपनी में समझे सब, जुदा न रह्या कोई अब ॥३०॥
सब किताबों दई साख, जुदे नाम जुदी लिखी भाख । सत असत दोऊ जुदे किए, माया ब्रह्म चिन्हाए के दिए ॥३१॥
दोनों जहान में थी उरझन, करमकांड सरीयत चलन । करी हकीकत मारफत रोसन, साफ किए आसमान धरन ॥३२॥
ब्रह्मांड को भान्यो खिलाफ, सब जहान को कियो मिलाप । ग्वाही खुदा की खुदा देवे, करे बयान हुकम सिर लेवे ॥३३॥
सब पूजसी साहेब सरत, कलाम अल्ला यों केहेवत । ए लिख्या तीसरे सिपारे, खोले अर्स अजीम के द्वारे ॥३४॥
लैलत-कदर के तीन तकरार, तीसरे फजर में कार गुजार । रूहों फरिस्तों वजूद धरे, लैलत कदर के मांहें उतरे ॥३५॥
खैर उतरी महीने हजार, गिरो दोऊ भई सिरदार । हुकम दिया साहेबें इनके हाथ, भई सलामती इनके साथ ॥३६॥
यों केतिक ग्वाही देऊं कुरान, इन्ना इन्जुलना में एह बयान । तीसरे तकरार की भई फजर, अग्यारैं सदी में देखो नजर ॥३७॥
और पेहेले सिपारे में जो लिखी, सो तुम क्या नहीं देखी । साहेदी कुंन की देवे जोए, खास उमत का कहिए सोए ॥३८॥
अब जो कोई होवे खास उमत, देवे ग्वाही सो होए साबित । उड़ाए गफलत हो सावधान, छोड़ो पढ़ों का गुमान ॥३९॥
हकुल्यकीन और सुंनी जोए, पेहेले ईमान ल्यावेगा सोए । पीछे जाहेर होसी साहेब, तब तो ईमान ल्यावेंगे सब ॥४०॥
भिस्त दोजख जाहेर भई, नफा किसी को न देवे कोई । ले हिरदे हादी के पाए, छत्रसाल यों कहे बजाए ॥४१॥
॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥४१॥
