बड़ा कयामतनामा - प्रकरण १० | Bada Kayamatnama prakaran 10
चौथे सिपारे में लिखी, सो रोसनी मैं दिल में रखी । जाहेर करों वास्ते उमत, खोलों बातून आई सरत ॥१॥
केतों के मुंह उजले भए, केतों के मुंह काले कहे । कैयों आकीन कई मुनकर, यों लिख्या होसी आखिर ॥२॥
हक ताला ने किया फुरमान, डांटत हैं कीने कुफरान । अंजील तौरेत से जो फिरे, सोई काफर हुए खरे ॥३॥
काफर दिल में कीना आनें, अंजील तौरेत पर मारे ताने । जो खुदाए का पैगंमर, तिनसे फिरे सो हुए काफर ॥४॥
जुबां आकीन कयामत न मानें, ऊपर इसलाम के कीना आनें । उनसे जो हुए मुनकर, सोई गिरो कही काफर ॥५॥
मुनकर हुकम और कयामत, हुए नाहीं नेक बखत । फंद मांहें हुए गिरफ्तार, भमर हलाकी पड़े कुफार ॥६॥
उस्तुवार न पाई सुंनत, ए जो हुए बदबखत । सुपेत मुंह कहे मोमिन, पाई राह जमात से तिन ॥७॥
नव सदी के आगे रोसन, कह्या होसी भिस्त का दिन । अरफा आगे रोज भिस्त, जाहेर होसी सबों सरत ॥८॥
रूहों का होसी मिलाप, जो बीच दरगाह के आप । होसी अल्ला का दीदार, मिलसी तीनों इत सिरदार ॥९॥
ए हमेसां हैं भिस्त के, नहीं बराबर कोई इनके । सुपेत मुंह रहें मस्त, खुदाए की राह पर करी है कस्त ॥१०॥
जो गुजरया बीच इन सूरत, खबर हुकम हकीकत । ए जो कही आयत साहेब, सो पढ़ी मैं कहे महंमद ॥११॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥३३९॥
