बड़ा कयामतनामा - प्रकरण १२ | Bada Kayamatnama prakaran 12
कुरान तफसीर जो हुसेनी, बुजरक एह पेड़ से केहेनी । मरद तीनों पर है मुद्दार, जो कलाम अल्ला कहे सिरदार ॥१॥
ए तीनों सूरत हैं एक, सो रसूल तीनों सरूप विसेक । सब नामों बुजरकी लिखी जित, मगज खुलें सब देखोगे तित ॥२॥
ल्याए फुरमान केहेलाए रसूल, पर ताए खुले जाए खिताब मूल । ए इलम ले रूहअल्ला आया, खोल माएने इमाम केहेलाया ॥३॥
दसमी के सवा नव बरस, ता दिन पैदा सरूप सरस । पीछे जो तीसरा हुआ तमाम, वह चांद ए सूरज आखिरी इमाम ॥४॥
कहों कुरान देखियो अंदर, पट उड़ाऊं आड़ा अंतर । उस ईसे पीछे जो उस्तुवारी, सो तो कायदे खुदा के सिफत सारी ॥५॥
बुनियाद रसूल सोई आखिरी, ए सिफत सारी इनकी करी । इन इमाम औलाद जो यार, पाक दरूद करे हुसियार ॥६॥
एक से इसारत दूसरे, बिलंद अस्थाने खुसखबरे । इन देहरी की सब चूमसी खाक, सिरदार मेहेरबान दिल पाक ॥७॥
आगे चलने की निसानी, पातसाह नजीक दरगाह पेहेचानी । मिल्या कह्या मुलक पातसाही, सो खासी गिरो रूहें दरगाही ॥८॥
उतपन अपनी बड़ी दौलत, औलाद यार दोऊ बाजू उमत । बड़े साहेब की ए पातसाही, जाहेर हुआ खंभ खुदाई ॥९॥
जिनमें हुकम किया इसलाम दीन, दौलत दई सबों आकीन । मोती कह्या डब्बे बुजरक, उतहीं का सितारा हक ॥१०॥
दबदबे का रोसन सूर, मेहेरबानगी साया खुदाए का नूर । ए सारे जो कहे निसान, सो पावे हादी से होए पेहेचान ॥११॥
सिरदार अस्वार इज्जत मैदान, आली सेर इन दरगाह का जान । इन पातसाह ऐसा जमाना, बकसीस चाहे बखत की पना ॥१२॥
इन गुलजारी की खुसबोए, रोसन होवे दिल रूह दोए । सब दुनियां में अकल इन, करे पसारा एक रोसन ॥१३॥
चांद सूरज दोऊ कही दौलत, मिने चार बिलंदी और मिलत । जबराईल रोसन वकील, बुध नूर की असराफील ॥१४॥
रूहअल्ला ईसे का नूर, महंमद हुकम सदा हजूर । ए इमाम की सब कही सिफत, मोमिन मुतकी दोऊ साथें उमत ॥१५॥
ढूंढेंगे हरघड़ी मरतबा, दुनियां सिर रसूल दबदबा । बिलंद दुनियां का हुआ आसमान, होए चाह्या मरतबा पावे पेहेचान ॥१६॥
इन सरूप पर खुदाए का प्यार, दोनों जहान का खबरदार । पाया साहेब थें नेक बखत, दोऊ जहान बुजरकी पावे इत ॥१७॥
सब रोसनाई तमामियत, पाई बुजरकी कर कर कस्त । ल्याया मुंह सब किताब, नजर चारों पर खुली सिताब ॥१८॥
जवेर बयान तोहफे हुकम, चार जिलदों पर दई खसम । तलब पाकी की पकड़ी, तरतीब तमामियत पाई बड़ी ॥१९॥
पेहेली जिलद तमामियत, ले हाथ बिलंद पनाह पोहोंचत । कबूलियत पाई है जित, बोहोत साथ मिलावत ॥२०॥
लिखना बाकी जिलद का है, सो तले तरजुमें लिखना कहे । जुदियां कर मिलाइयां जंजीर, सो कौन पावे बिना महंमद फकीर ॥२१॥
पेहेली तारीख पाई बुजरक, मेहेरम थे तिन पाया हक । इत थें बरस सत्तानवें, तित दूजे जामें जाहेर भए ॥२२॥
गैब आवाज हुई इसारत, उतरी इलाही इन सरत । आठ महीने हुए तिन पर, तब पेहेली किताब भई मयसर ॥२३॥
ए जो आलम जात खुदाई, गरीबी परेसानी बंदों पर आई । आगे हुसेन किया बयान, वास्ते रसूल हाथ फुरमान ॥२४॥
ए दूजे जामे की कही, तहां पांच बुजरकी भेली भई । आगे दिन केहेने कयामत, सोई खोलों मैं हकीकत ॥२५॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥३७६॥
