बड़ा कयामतनामा - प्रकरण १३ | Bada Kayamatnama prakaran 13
ए सिपारे पेहेले की कही, जंजीर सोलमें की मिलाऊं सही । तहां लिख्या है इन अदाए, बिना देखाए समझी न जाए ॥१॥
न था मैं परवरदिगार मेरे, बीच साहेब याद तेरे । कायदा उमेद गया सब भूल, मुझ ऐसे की द्वा करी कबूल ॥२॥
तुम कबूल मैं तरबियत पाई, खसलत तुमारी इन में आई । भी देखो तुम एह वचन, हजरत ईसे जो कहे रोसन ॥३॥
तेहेकीक मुझको है ए डर, खलक अपनी जो है हाजर । पीछे मेरे मोहीम खैरात, जो वर पाए करे दीन की बात ॥४॥
पातसाही मेरी बीच उमत, कबूल करने को बजाए ल्यावत । पीछे मेरे मौत के कहे हजरत, चाहिए खलीफा इस बखत ॥५॥
ना जनने वाली मेरी औरत, अठानवे बरस की मजल है इत । और बस बकस ना कर, नजीक तेरे तेहेकीक मुकरर ॥६॥
फरजंद मेरे ऐसा होए, साहेब दीन हुकम का सोए । लेवे मीरास इमामत, लेवे मुझ से हकीकत ॥७॥
एह मीरास कही मिलकत, इलम की लेवे हिकमत ॥८॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥३८४॥
