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बड़ा कयामतनामा - प्रकरण १५ | Bada Kayamatnama prakaran 15

छिपके साहेब कीजे याद, खासलखास नजीकी स्वाद । बड़ी द्वा मांहें छिपके ल्याए, सब गिरोह सों करे छिपाए ॥१॥

बरस निन्यानवेलों सरम, न करी जाहेर होए के गरम । बरस निन्यानवे कही हुरम, साथ ईसा के समझियो मरम ॥२॥

सो ए ना जननेवाली कही, तलब बेटे की राखे सही । बूढ़ा ईसा आवाज करे, आस्ती आवाज कोई ना दिल धरे ॥३॥

पाँच जिल्दें इन मजलें पाई, तो लों बात करी छिपाई । जेता कछू केहेता पुकार, सुनने वाला न कोई सिरदार ॥४॥

आवाज उनकी थी इन पर, चाहे आप कोई लेवे खबर । ए सुनियो दूजी विख्यात, दूजे जामें की कहूं बात ॥५॥

कह्या सुनो मेरे परवरदिगार, धोए हाड़ बुढ़ापे नार । खंभ में वजूद इन घर, बूढ़े हाड़ सुस्त इन पर ॥६॥

कह्या होवे वजूद तमाम, इन सें भली भांत होवे काम । जो सिर मेरा हुआ सुपेत, तरफ रोसनी नहीं अचेत ॥७॥

अंदर ज्वानी है रोसन, काह ज्यों पकड़े अगिन । उसही झलकार थें मकबूल, बूढ़े रोसनी न गई भूल ॥८॥

॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥४१९॥

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