बड़ा कयामतनामा - प्रकरण १७ | Bada Kayamatnama prakaran 17
कह्या आम सिपारे मांहें, अग्यारै सदी लिखी है जांहें । हुकम हादी के खोलों इसारत, पाइए कौल जाहेर कयामत ॥१॥
दावा हुआ हजरत के सेती, ए करार बाँध्या सरत एती । नाम हजरत के सेहर कही, अग्यारे गिरह रस्सी पर दई ॥२॥
रस्सी रखी कूएं के मांहें, ऊपर पत्थर दिया तांहें । जबराईलें कही खबर, भेज्या अली कूएं गया उतर ॥३॥
अली रस्सी ल्याया ऊपर, गिरह अग्यारैं सदी हुई नजर । अग्यारे आयत आई तत्पर, भेजी खुदा ने जबराईल खबर ॥४॥
इन पढ़ने रसूल खबर भई, हर आयत हर गिरह खुल गई । उमर रजीअल्ला करी नकल, अजब आयत आई सकल ॥५॥
वास्ते रद करने को सेहर, खुली गांठें छूटे पैगंमर । इन से पनाह पकड़ी मैं, सो तिन की फजर करी हैं जिने ॥६॥
फलक चीज केहेते हैं हक, हुआ चाहिए दोऊ देखो विवेक । महंमद ले उठे उमत खास, सो तो पोहोंचे साहेब विलास ॥७॥
पीछे रह्या जो पत्थर घास, सो इन दुनियां की पैदास ॥८॥
॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥४३३॥
