बड़ा कयामतनामा - प्रकरण २ | Bada Kayamatnama prakaran 2
एक तो कहे अल्ला कलाम, जाहेरी माएनों का नाहीं काम । दूजे तो इसारत कही, इत हुज्जत काहू की ना रही ॥१॥
तीसरे जंजीरों करी जिकर, पोहोंचे न चौदे तबकों की फिकर । सोए परोवनी मोतियों मांहें, खुदा बिन दावा किनका नाहें ॥२॥
केहेलावें काजी पढ़े कुरान, अल्ला रसूल ना उमत पेहेचान । ना कुरान ना आप चिन्हार, अहेल किताब यों कहावें दीनदार ॥३॥
जाहेरी माएने लिए अंधेर, जाको लानत लिखी बेर बेर । ढांपे कुरान की रोसनाई, अंदर सैतानें एही सिखाई ॥४॥
दिल पर दुस्मन हुआ पातसाह, मारी दीन इसलाम की राह । हुए हिरस हवा के बंदे, किए सैताने देखीते अंधे ॥५॥
सब अंगों बैठा दुस्मन जोर, दिल के दीदे दिए फोर । दुस्मनें ना छोड़या कोई ठौर, चौदे तबकों इनकी दौर ॥६॥
उबरीं एक रूहें उमत, दूजी गिरो फरिस्तों की इत । जिनमें इमाम हुआ आखिरी, हिंदू फकीरों में पातसाही करी ॥७॥
देखाई राह तौरेत कुरान, कुफर सबों का दिया भान । ल्याया नहीं जो आकीन, सो जल दोजख आए मिने दीन ॥८॥
जो थी चौदे तबकों अंधेर, भान्यो सैतानी उल्टो फेर । कराया सबों को सिजदा, जाहेर किया जो साहेब है सदा ॥९॥
खास गिरो नूरजमाल में लई, नूरजलाल ठौर दूजी को दई । तीसरी जो सब दुनियां कही, करी नूर नजर तले सही ॥१०॥
भिस्तां बांट दइयां इन बिध, काम सबों के किए यों सिध । कहे छत्ता जो पेहेले ल्यावे ईमान, खास उमत का सोई जान ॥११॥
॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥५२॥
