बड़ा कयामतनामा - प्रकरण २१ | Bada Kayamatnama prakaran 21
लिख्या आम सिपारे सूरत, आठईं मांहें मजकूर कयामत । सौंह करी साहेब आसमान, ए इसारत बारहीं सदी में निदान ॥१॥
दो हादी दसमी सदी से आए, उमत तिन में लई मिलाए । दस ऊपर दोए बुरज जो कही, इन में हादी उमत मजकूर भई ॥२॥
दस और दोए जुदे कहे, ए इसारत जिनकी सोई लहे । ए बुरज कहे दस और दोए, ए गिनती मजल चांद की सोए ॥३॥
या दरिया या आसमान सब, ए कौल साहेब का न भूलें कब । ए सौगंद खाए के करी सरत, एही रोज जो कही कयामत ॥४॥
फेर फेर कह्या सौं खाई, अल्ला की साहेदी देवाई । खुदाए देखता है सबन, और जानता है सबन के मन ॥५॥
ग्वाही भी साहेब की कही, सौंह भी खुदाए की खाई सही । एक कौल बीच बंदा कह्या, पैगंमर भी एही भया ॥६॥
॥ प्रकरण ॥२१॥ चौपाई ॥४६८॥
