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बड़ा कयामतनामा - प्रकरण २२ | Bada Kayamatnama prakaran 22

अमेतसालून

महंमदें जाहेर करी दावत, डर फुरमाया रोज कयामत । पढ़या खलक ऊपर कुरान, ए तीनों मानें नहीं फुरमान ॥१॥

काफर पूछें मोमिनों से ले, ना पूछे रसूल को दिल दे । खुदाए ताला ने कह्या यों कर, किस चीज से पूछें काफर ॥२॥

कुरान चीज ऐसी बुजरक, फेर तिन में ल्यावें सक । रसूल को नाम धरें काफर, किवता झूठा जादूगर ॥३॥

ए बुजरक बुनियाद नबुवत, बीच कौल दरगाह बड़ी सिफत । कोई कहे पैगंमर है, कोई सायर दिवाना कहे ॥४॥

कोई कोई कयामत को मानें, कोई कोई सामे मारें तानें । एक गिरो मिने नबुवत, कहे छुड़ावेंगे वे कयामत ॥५॥

केतेक साहेब सों बैठे फिर, केतेक कयामत से मुनकर । बाजों को दुनियां हैयात, बाजे सक ल्यावें इन बात ॥६॥

खुदाए की सौंह खाए के कही, के कयामत नजीक आई सही । पेहेली नीयत अकीदे अपनी, झूठा कौल ना करे धनी ॥७॥

जिमी को री कहा बिछान, तिन पर ल्यावसी तीनों जहान । पहाड़ मेखां कही उस्तुवार, पैदा किया दुनियां नर नार ॥८॥

तो नसल तुमारी बाकी रहे, स्याह सुपेत छोटे बड़े कर कहे । कोई खूब कोई किए बुरे, नींद रात ताजगियां करे ॥९॥

रात निकोइयों को भाने, कूवत हैवानी की आने । बंदगी इनसे होवे दूर, सब ढांपे अंधेर मजकूर ॥१०॥

साहेब फतुआत का यों कहे, साहेब रातों के तले रात रहे । इनकी नजरों न छिपे दुस्मन, जो कोई हैं साहेब के तन ॥११॥

रातों चलने वाले कहे सेखल इसलाम, करें परदा दुनियां सों चलें आराम । दिन के तांईं कह्या बाजार, इत बे इन्साफी चलन हार ॥१२॥

ए जो चले रातों के यार, मैं इन बंदे पाकों की जाऊं बलिहार । कह्या जो साहेब का दिन, ओ बखत तलब करें मोमिन ॥१३॥

इनहीं में ढूंढ़ें हासिल, इस दिन उमत की फसल । इनके तले सातों आसमान, ए सारों के ऊपर जान ॥१४॥

और खलक जो इनके तले, तिन खलकों को होए जुलजुले । पैदा किया आफताब रोसन, ए दिन हुआ वास्ते मोमिन ॥१५॥

इनों के साथ उतरया बादल, सो नूर बादलियां रोसन जल । तिन की पैदास कही दाना घास, ए कही इसारत तीनों पैदास ॥१६॥

गेहूं जौ और कह्या घास, काफर फरिस्ते रूहें उमत खास । फरिस्ते जो गेहूं इसलाम, और घास कह्या सब काफर तमाम ॥१७॥

मोती दरियाव से काढ़या महंमद, इन बिध इत लिख्या सब्द । घास कह्या सब चारा हैवान, गिरो उतरी दोऊ दरियाव से जान ॥१८॥

याही को बाग दरखत कहे, नजीक मिलाप लपेटे गए । इनों के बीच चले हुकम, रोज कयामत को जाहेर खसम ॥१९॥

बरकरार किया हुकम बखत, ए इसारत जाहेर कही कयामत । ए फसल परहेजगार मोमिन, काफरों के तंबीह के दिन ॥२०॥

इस रोज फूंके करनाए, असराफील सूर कुरान के गाए । एक सूरें आखिर हुई सबन, दूजे सूरें उठे सब तन ॥२१॥

सब उठे कबर थें अपनी, कायम किए कयामत के धनी । इमाम सालबी यों कहे बनी, रसूल पूछे उमत अपनी ॥२२॥

कहे कयामत में सबे उठाए, दस बिध फैल पूछे जाए । बांदर सूरत होसी सुकन चीन, जिनों हिरदे में नहीं आकीन ॥२३॥

सुवर सूरत हरामखोर कहे, जो कबूं हलाल के ढिग ना गए । गधे सूरत कहे हरामकार, जिन के बुरे फैल रोजगार ॥२४॥

सूद खाने वाले हुए अंधे, उसी खैंच से दोजख फंदे । न किया सिजदा न सुनी पुकार, सो हुए बेहेरे पड़े दोजख मार ॥२५॥

गूंगे कहे जालिम हुकम, वे सबके तले न ले सकें दम । पढ़े जुबां काटे पीव लोहू बहे, झूठे फैल मुख सीधे कहे ॥२६॥

मलें दोजखी हाथ पांऊं दोए, ताए देखे भिस्ती अचरज होए । उड़न वाले कहे मोमिन, मुतकी भी पड़ोसी तिन ॥२७॥

ताए हर भांत रंज पोहोंचाया जिन, सो लटके बीच सूली अगिन । चुगलखोर काटे हाथ पांऊं, और सखती दिलों को लगे घाउ ॥२८॥

ए दस भांत की कही दोजक, जो बे फुरमान हुए हक । जिनहू फैल जैसे किए, तिनको बदले तैसे दिए ॥२९॥

फुरमाया केतेक फेर उठाए, तकब्बरों दोजख हमेसगी पाए । और जो कहे मोतिन के घर, सो खासी उमत साहेब के दर ॥३०॥

उनको जो लगे रहे, सो मुतकी बूंदों मिले कहे । जिनों इनों की दोस्ती लई, साहेबें पातसाही तिनको दई ॥३१॥

और भी सुनो दूजी जंजीर, दिल दे देखो खीर और नीर । ए जो दुनियां का कह्या आसमान, दो टुकड़े दिल कह्या जहान ॥३२॥

ए रोज है निपट सखत, यों जुलजुला होसी कयामत बखत । बीच हवा के पहाड़ उड़ाए, ए जो दुनियां में बुजरक केहेलाए ॥३३॥

बुजरकों धोखा क्योंए न जाए, तो बखत ऐसा दिया देखाए । फितुए इनों के जावें तब, ऐसा कठिन बखत देखें जब ॥३४॥

ठंढे वजूद होवें वर पाए, तब हकीकत देखें आए । सब दुनियां हुई गुन्हेगार, यों देख्या बखत दोजखकार ॥३५॥

अब जो सुनो खास उमत, खड़े रहो दोजख एक बखत । जिन भागो गोसे रहो खड़े, देखो दोजखियों खजाने बढ़े ॥३६॥

भिस्त रजवान मोमिन निगेहवान, दोजख खजाना पोहोंचे कुफरान । तहां तांईं बखत पोहोंचे सबन, पैदरपे जले अगिन ॥३७॥

गुजरे हैं हद सें काफर, दूर दराज जानी थी आखिर । दुख लंबे हुए तिन कारन, यों मता पाया दोजखियों हाल इन ॥३८॥

करे मोअलिम नकल अपनी जुबांए, सांची जिकर जो कही खुदाए । जब मगज माएने लीजे खोल, तब पाइए इसारत बातून बोल ॥३९॥

साखी- दुनियां की उमर कही, अव्वल सिपारे मांहें । सात हजार साल चालीस, नीके देखियो ताहें ॥४०॥

तैंतालीस जुफ्त जो कहे, हर जुफ्त सत्तर बहार भए । हर बहार सात सौ बरस लए, हर बरस तीन सौ साठ दिन दए ॥४१॥

याके एकैस लाख सात हजार दिन, आदम पीछे मजल इन । ए रसूल के आए की मजल, ए गिनती कर तुम देखो दिल ॥४२॥

पांच हजार ताए बरस भए, आठ सौ सैंतालीस ऊपर कहे । त्रेसठ बरस उमर के लिए, छे हजार नब्बे कम किए ॥४३॥

इतथें रसूलें करी सफर, इनके आगे की करों जिकर । अग्यारहीं के जब बाकी दस, तब दुनियां उमर सात हजार बरस ॥४४॥

इत थें अमल भयो इमाम, चालीस बरसों फजर तमाम । जोड़ा पर जोड़ा गुजरे, दुनियां उमर इत लों करे ॥४५॥

तिन में जो दस बरसों फजर, सब दुनियां भई एक नजर । तीस बरस जब अग्यारहीं पर, तब दुनियां सब भई आखिर ॥४६॥

सत्तर बरस पुलसरात के कहे, सो उठने कयामत बीच में रहे । पुलसरात दुख कहिए क्यों कर, काफर जलें जुलजुले आखिर ॥४७॥

दस और दोए बुरज जो कहे, सो बारहीं कयामत के पूरे भए । ए तीसरी बड़ी फरिस्तों की फजर, पीछे उठ खड़ी दुनियां नूर नजर ॥४८॥

॥ प्रकरण ॥२२॥ चौपाई ॥५१६॥

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