बड़ा कयामतनामा - प्रकरण २३ | Bada Kayamatnama prakaran 23
दिन कयामत के पूरे कहे, सो खास उमतवालों ने लहे । क्यों लहे जाको लिखी दोजक, जावे नहीं तिनों की सक ॥१॥
पुरसिस का दिन साहेब देखावे, कयामत कौल दूजा कोई न पावे । पांच सूरत लिखी आम सिपारे, ए समझें पाक दिल उजियारे ॥२॥
ए पांचों नेक अमल जो करें, सो भिस्ती फुरमान से ना टरें । और झूठा काम बदफैली करे, सो दोजख की आग में परे ॥३॥
हमेसां दोजखी बदकार, रोज कयामत के हुए खुआर । ए दिन किने न किया मुकरर, ताए पेहेचानो जिन दई खबर ॥४॥
कोई न जाने राह न जाने दिन, इन समें हादिएँ किए चेतन । उस दिन बदला होवे अति जोर, हाथों सीधे साहेब करे मरोर ॥५॥
तित पोहोंच के सुध दई तुमें किन, बुजरकी दई इत इन । निहायत इस रोज की कोई न पावे, ए पातसाह पुरसिस का देखावे ॥६॥
किनको नफा न देवे कोए, तब कोई न किसी के दाखिल होए । कूवत तिन समें कहुंए जाए, तो कोई नफा किसी को न सके पोहोंचाए ॥७॥
हुकम हादी का साहेब फुरमान, करे सिफायत खुदा मोमिनों पेहेचान । मोमिन आकीनदारों को चाहें, हकमें भी उनहीं को मिलाएँ ॥८॥
जब जाहेर हुआ रोजा और हज्ज, तब काजिएँ खोल्या मुसाफ मगज । ए बात साहेबें छत्रसालसों कही, घर इमाम बिलंदी छत्ता को दई ॥९॥
॥ प्रकरण ॥२३॥ चौपाई ॥५२५॥
