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बड़ा कयामतनामा - प्रकरण ४ | Bada Kayamatnama prakaran 4

तीसरे सिपारे बड़ा जहूर, इमाम सुलतान का मजकूर । महमूद गजनवी सुलतान, मिले इमाम सुख हुआ जहान ॥१॥

लागन हिंदू मुसलमान, गजनवी महमूद सुलतान । ढ़ाए हिंदुओं के खाने बुत, दिल में इमाम की ज्यारत ॥२॥

अपने जमाने था उस्तुवार, कुतब औलियों का सिरदार । बंदगी मांहें था बड़ा, सफ तलेकी रेहेता खड़ा ॥३॥

तलब द्वा फातियाओं की कर, चाहता था तो अजमंतिसा अवसर । फकीर सुलतानसों बातें भई, तब आकीन आया सही ॥४॥

इमामें कह्या यों कर, पेसकसी ल्यावें हम घर । बस्ती कोस पांच हजार, मुलक मदीने कई सेहेर बाजार ॥५॥

एक हजार सात से हाथी, लाख घोड़े सूरमें साथी । एती आए के पेसकसी करी, ओढ़ के पुरानी कमरी ॥६॥

आप होए के नंगे पाए, तले की सफ में खड़ा आए । आजिज होए नमाया सीस, कहे मोको करो बकसीस ॥७॥

कहे मोको सबूरी देओ, फकीरों के मिलावे में लेओ । दुनियां थें आजाद किया, फकीरों के मिलावे में लिया ॥८॥

तो अजमंतिसा में सही, गजनवी को बकसीस भई । इमाम पेहेचान करो रोसन, संसे भान देऊं सबन ॥९॥

देऊं कुरान की साहेद, बिना फुरमान न काढ़ों सब्द । छठे सिपारे में एह सनंध, ईसा नुसखे का खावंद ॥१०॥

और साहेदी देऊं तीसरी, अहेल किताबें दिल में धरी । दस और एक सिपारा जित, एह सब्द लिखे हैं तित ॥११॥

बरस नव सै नब्बे हुए जब, मोमिन गाजी आए तब । रूहअल्ला आए तिन मिसल, दूसरा जामा होसी मिल ॥१२॥

बंदगी ए करसी कबूल, एक की हजार देवें इन सूल । ए दूजा जामा ईसे का होए, बातून माएने पाइए सोए ॥१३॥

चौथी साहेदी नामें नूर, हुआ रूहअल्ला का नुसखा जहूर । नव सै नब्बे नव मास ऊपर, ए नुसखा लिया मिसल मातबर ॥१४॥

असराफील इत बीच इमाम, ए नुसखे इलम की किताबें कलाम । एक रोज आए खाने किताब, कह्या पोहोंचाओ नुसखा सिताब ॥१५॥

महमूद गजनवी सुलतान, ओ नुसखा हासिल करे परवान । जब नुसखा उनने सही किया, पंद्रा रोज सामें आएके लिया ॥१६॥

तब अव्वल आखिर की मिली सब जहान, मिले तित हिंदू मुसलमान । और भी मिली अनेक जात, सब कोई नुसखा करे विख्यात ॥१७॥

केतोंक अपना किया कुरबान, करें निछावर बुजरक जान । इत पांच सै जुलजुलाटहू, संग रसूल के असलू रूह ॥१८॥

ए बखत हुआ कही कयामत, दोस्त खाना दाना पोहोंची सरत । गुनाह सुलतान के किए सब माफ, लिया नुसखा हुआ साफ ॥१९॥

बारे हलके थे जो बंध, किए आजाद छूटे माया फंद । लाख नंगों के दिए सिरो पाए, हुआ सुख दुख सबों जाए ॥२०॥

पचास हजार बाग किए खैरात, बरकत नुसखे भई सिफात । हवेलियां जो थी वैरान, सो किया खड़ियां हुए मेहरबान ॥२१॥

ए जो बात कुराने कही, सो मैं जाहेर करी सही । इनका बयान करे आलम, बिना फुरमाया करे जालम ॥२२॥

तुम माएने ऊपर के यों लिए, किस्से कुरान के पेहेले हो गए । जो जमाने हुए मनसूख, ए रोसनी तित क्यों डारो चूक ॥२३॥

ए जो इमाम गजनवी का मजकूर, लिख्या आखिरत को होसी जहूर । सो मजकूर कहें हो गया, जो जाहेर कयामत में कह्या ॥२४॥

उमी आप पढ़ें कुरान, सुनो जाहेरियों दिल के कान । काजी कजा पर आया आखिर, खोल दिल दीदे देखो नजर ॥२५॥

‍ल्याओ आकीन कहे छत्रसाल, असलू पाक हुए निहाल ॥२६॥

॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥१०५॥

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