बड़ा कयामतनामा - प्रकरण ५ | Bada Kayamatnama prakaran 5
लिख्या मांहें नामें नूर, जाए देखो महंमद का जहूर । आरिफ कहावें मुसलमान, पावें नहीं हिरदा कुरान ॥१॥
महंमद मुरग कह्या आसमान, ए नीके कर देऊं पेहेचान । इन मुरग ने किया गुसल, धोए पर अरक निरमल ॥२॥
तिन मुरगें झटके अपने पर, ता बूंदोंके भए पैगंमर । एक लाख भए बीस हजार, जिनों पैगाम दिए सिरदार ॥३॥
कलाम अल्ला की तो एह नकल, देखो दुनियां की अकल । महंमद को करहीं औरों समान, इन दुनियां की ए पेहेचान ॥४॥
जो कहावें महंमद के बंदे, सो भी न चीन्हें हिरदे के अंधे । कहावें जाहेरी मुसलमान, गिनें महंमद को औरों समान ॥५॥
ऊपर माएने ले भूले जाहेरी, कलाम अल्ला की सुध न परी । पेहेले कही जो तुम दिल में आनी, तुम जो जानी मुसलमानी ॥६॥
पाले अरकान मसले बावन, तुम वाही को जानो मोमिन । उजू निमाज रोजा फरज, ए तो इन पर धरया करज ॥७॥
और भी इनों मुसलमानी करी, सो भी देखो चलन जाहेरी । ए लानत लिखी मांहें फुरमान, सो बड़ी कर पकड़ी मुसलमान ॥८॥
सरीयत यों कहे इभराम, जिनों किए हैं बद फैल काम । जिनों अंगों लोप्या फुरमान, सो सारे किए नुकसान ॥९॥
इबराहीम सिर ए लानत कही, सो पढ़ों सुंनत बड़ी कर लई । जिन दई लानत ऊपर तकसीर, सो सोभा लई मुल्लां मीर पीर ॥१०॥
ए पावें नहीं अल्ला कहानी, इन याही में कर लई मुसलमानी । लानत करी ऊपर की बानी, इनों सोई भली कर मानी ॥११॥
पढ़े आलम आरिफ कहावें, पर एक हरफ को अर्थ न पावें । मुखथें कहें किताबें चार, पर हिरदे अंधे न करें विचार ॥१२॥
तौरेत अंजील और जंबूर, चौथी कलाम अल्ला जहूर । ए चारों उतरियां जिनों पर, सो चारों नाम कहे पैगंमर ॥१३॥
मूसा ईसा और दाऊद, ए चारों आए बीच जहूद । और आखिरी कहे महंमद, खतम किया इत बांधी हद ॥१४॥
मनसूख तीन कही ता मिने, फुरकान एक यों भने । समझे ना किताबों के तांईं, क्या लिख्या है माएनों माहीं ॥१५॥
तौरेत लिखी ठौर बीसेक कही, सो जुदे जुदे नामों पर दई । ता बीच कहे अल्ला कलाम, कौल कयामत इन पर इसलाम ॥१६॥
अब को मनसूख और को कही हक, जाहेरी कोई न हुआ बेसक । और भी तुमको कहूं हक, बिना पाए मगज न छूटे सक ॥१७॥
कुरान लिख्या दिया चार ठौर, भी किताबें दैयां ठौर और । अब को अव्वल को कलाम आखिरी, ए नीके तुम ढूंढ़ो जाहेरी ॥१८॥
किस्से कुरान के डारो तित, रद जमाने हो गए जित । ताए क्यों कहो यों कर, जो रोसनी होसी आखिर ॥१९॥
लिख्या अठारमें सिपारे, ले ऊपर के माएने सो हारे । ऊपर माएने ले देवे सैतान, जाको कहिए बेफुरमान ॥२०॥
जो कोई होसी बेफुरमान, नेहेचे सो दोजखी जान । ताको ठौर ठौर लानत लिखी, सोई जाहेरियों हिरदे में रखी ॥२१॥
अब और कहूं सो सुनो, महंमद को क्यों औरों में गिनो । गिरो महंमद तो होए पेहेचान, जो मगज माएने पाओ कुरान ॥२२॥
एक लाख भए बीस हजार, जिनों पैगाम दिए सिरदार । सात कलमें वाले पैगंमर, गिरो सबों की कही काफर ॥२३॥
उनों करी बेफुरमानी, ताथें गिरो सबों की रानी । अमेत सालून जो सूरत, तामें लिखी यों हकीकत ॥२४॥
महंमद की जो उमत भई, दस विध दोजख तिनकों कही । यामें फिरके कहे बहत्तर, तामे एक मोमिन लिए अंदर ॥२५॥
कौन गिरो जो अंदर लई, और कौन काफर हुए सही । वाही सूरत में कही पुलसरात, कौन गिरो चली बिजली की न्यात ॥२६॥
को निकसी घोड़े ज्यों पार, और कौन कटी पुलसरात की धार । खास गिरो साहेबें सराहीं, गिरो दूजी पीछे लगी आई ॥२७॥
और सैताने पीछी फिराई, सो सब दोजख को चलाई । ऐसे उलमा सबही कहें, पर माएना बातून कोई न लहे ॥२८॥
अठारहें सिपारे लिख्या हरफ, बिना मगज न पावें आरिफ । बिना मगज न महंमद पेहेचान, बिना मगज ना पढ़या कुरान ॥२९॥
बिना मगज न पाइए फुरकान, किन वास्ते आया फुरमान । एह वास्ता पाइए तब, मगज माएनें खुलें जब ॥३०॥
खोल न सकें पढ़ें अल्ला कलाम, सो खोले उमी सब मेहेर इमाम । अव्वल एही बांधी सरत, खुले माएने जाहेर होसी कयामत ॥३१॥
किन खोले न माएने कबूं कुरान, पावें न हकीकत करें बयान । पढ़े आलम आरिफ कई जन, पर एक हरफ न खोल्या किन ॥३२॥
अब देऊं दरवाजे खोल, कहूं हकीकत बातून बोल । जासों जाहेर होवे मारफत, दिन पाइए रोज कयामत ॥३३॥
साहेदी देवे अल्ला कलाम, सब दुनियां कबूल करे इसलाम । खोले माएने बातून हकी, मोमिन जाहेर करों बुजरकी ॥३४॥
लिखे सब माएने बातन, सो हनोज लों ना खोले किन । सब खूबियां हैं बातन, खुले मगज सबों भई रोसन ॥३५॥
अव्वल खूबी अल्ला कलाम, दूजी खूबी गिरो इसलाम । तीसरी खूबी तीन हादी वजूद, आखिर आए बीच जहूद ॥३६॥
रसूल रूहअल्ला और इमाम, ए तीनों एक कहे अल्लाकलाम । बसरी मलकी और हकी, तीनों तरफ साहेब के साकी ॥३७॥
आदम नूह मूसा इभराम, और अली भेला मांहें इमाम । महंमद ईसा पेहेले कहे, ए सातों कलमा आए इत भेले भए ॥३८॥
जेता कोई पैगंमर और, सारी सिफतें याही ठौर । सतरहें सिपारे यों कर कह्या, बिना महंमद कोई आया न गया ॥३९॥
और लिख्या अठारमें सिपारे, महंमद नाम पैगंमर सारे । सब पैगंमरों को जो सिफत दई, सो सिफत सब रसूल की कही ॥४०॥
ए मगज खोल्या कुरान, सुनो हिंदू या मुसलमान । जो उठ खड़ा होसी सावचेत, साहेब ताए बुजरकी देत ॥४१॥
कहे छत्ता तिनका अंकूर, नूर तजल्ला मांहें जहूर ॥४२॥
॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥१४७॥
