बड़ा कयामतनामा - प्रकरण ६ | Bada Kayamatnama prakaran 6
हो सैयां फुरमान ल्याए हम, आए वतन से वास्ते तुम । इन में खबर है तुमारी, हकीकत देखो हमारी ॥१॥
सिफत रसूल अल्ला कलाम, रूहअल्ला ईसा पाक इमाम । कही खास उमत महंमद, जाकी सिफत को न पोहोंचे सब्द ॥२॥
सोई कहूंगी जो लिख्या कुरान, सब्द न काढूं बिना फुरमान । या तो कहूं महंमद हदीस, भला मानो या करो रीस ॥३॥
दे साहेदी कहूंगी हक, सो देखो कुरान जाए होवे सक । अब लों जाहेर थी सरीयत, खोले माएने बातून हकीकत ॥४॥
अब सबमें जाहेर हुई कयामत, खुले कलाम जब पोहोंची सरत । लिख्या सिपारे सोलमें मिने, आगे राह न पाई किने ॥५॥
ए जो चौदे तबक की जहान, इनकी फिकर लग आसमान । जब लग आए रसूल महंमद, किने न छोड़ी अक्सा मसजिद ॥६॥
और लिख्या मेयराजनामें माहीं, जब हुआ मेयराज रसूल के तांई । रसूल चले पांउं सिर दे, संग एक जबराईल ले ॥७॥
चौदे तबक की खबर भई, ला मकान हवा को कही । निराकार कहिए सुंन, एही बेचून बेचगून ॥८॥
छोड़ याको आगे को गए, नूर बनमें दाखिल भए । जबराईल रह्या इन ठौर, ला मकान से ए मकान और ॥९॥
आगे चल न सक्या क्योंहीं कर, नूर तजल्ली जलावे पर । तहां पोहोंचे रसूल एक, तित अनेक इसारतें कही विवेक ॥१०॥
लिख्या दरिया मीठा मिश्री से पाक, तित कह्या मुरग चोंच में खाक । गिरो फरिस्तों करी इसारत, खाक वजूद नूर खिलकत ॥११॥
और कह्या देख दाहिंनी तरफ, मोतिन के मुंह पर कुलफ । पूछा रसूलें कुलफ क्यों किया, तेरी उमतें गुनाह कर लिया ॥१२॥
इनकी किल्ली तेरा दिल, खुले कुलफ जब आओ मिल । सब हकीकत बीच किताब, पर पावे सोई जिन पर होए खिताब ॥१३॥
और कई बातें खुदाए से करी, लिए नब्बे हजार हरफ दिल धरी । तीस हजार का हुआ हुकम, जाहेर करो दुनियाँ में तुम ॥१४॥
और कहे जो तीस हजार, ए तुम पर रख्या अखत्यार । बाकी रहे जो तीस हजार, आखिर इन पर है मुद्दार ॥१५॥
सो कयामत पर बांधे निसान, एही सरत जब खुल्या कुरान । अमेत सालून में एह बात, बिध बिध कर लिखी विख्यात ॥१६॥
रूहें कही बारे हजार, बुजरकी को नहीं सुमार । जिनकी इच्छासों फरिस्ता होए, बड़ा सबन का कहिए सोए ॥१७॥
सो रूहें दरगाह के मांहें, ऐसा नजीकी और कोई नाहें । सो ए रूहें आदमी सकल, ए आदमी इनकी नकल ॥१८॥
और लिख्या अठारमें सिपारे, नूर बिलंद से उतारे । काम हाल करें नूर भरे, नूर ले दुनियां में विस्तरे ॥१९॥
और जो अंधेरी से पैदा भए, काफर नाम तिनोंके कहे । फिरे मन के फिराए उलटे फेर, काम हाल उनों के अंधेर ॥२०॥
और लिख्या वाही सिपारे, ए कुरान से न होए न्यारे । फरिस्ते उतरे वास्ते कुरान, फरिस्तों पर आया फुरमान ॥२१॥
फौज फरिस्तों की भरी नूर, असराफील बजावे सूर । और तीसमें सिपारे एह बयान, इन्ना इन्जुलना सूरत परवान ॥२२॥
फरिस्ते नजीकी जो बुजरक, साथें हुकम धनी का हक । उतरे लैलत कदर के मांहें, तीन तकरार रात के जाहें ॥२३॥
रूहों फरिस्तों वजूद धरे, जोस धनी का ले उतरे । रात नूर भरी कही ए, जित रूहअल्ला के तन जो कहे ॥२४॥
एक तकरार हूद के घर, दूजे तकरार नूह किस्ती पर । तीसरा तकरार ए जो फजर, जित रूहें फरिस्ते पैगंमर ॥२५॥
खैर उतरी महीने हजार, गिरो दोए भई सिरदार । हुकम दिया सब इनके हाथ, भई सलामती इनके साथ ॥२६॥
आखिर मिलावा साहेब इत, रूहें फरिस्ते पैगंमर जित । याही सिपारे छत्तीसमी सूरत, नीके कर तुम देखो तित ॥२७॥
तीन सरूप खुदाए के कहे, तीनों तकरार रूहों बीच रहे । एक बृज बाल दूजा रास किसोर, तीसरे बुढ़ापनमें भोर ॥२८॥
दोए सरूप कहे मिने और, किल्ली कुरान ल्याए इन ठौर । पांच सरूप मिले इत नूर, असलू बीज मांहें अंकूर ॥२९॥
वजूद आदम का जैसा खाक, पांच पचीसों इनके पाक । आठमें सिपारे एह बयान, लिख्या जाहेर बीच कुरान ॥३०॥
एह दज्जाल जो अजाजील, सबमें दम इनका कमसील । न करे सिजदा ऊपर आखिरी आदम, फेरया जाहेर कलाम अल्ला का हुकम ॥३१॥
मांहें गया सबन को खाए, पढ़े ढूंढ़त जुदा ताए । जाहेरियों न देवे देखाए, ऊपर माएने दिए भुलाए ॥३२॥
दाभ-तूल-अर्ज माएने बातन, मुख आदम का गधी तन । बातून माएने कही कयामत, देखसी खुले हकीकत ॥३३॥
दज्जाल एक आंख जाहेरी, कई बिध तिनकों लानत करी । नाहीं दज्जाल आंख बातूनी, जासों मारफत पाइए धनी ॥३४॥
खोलने न दे आंख अंदर, दिल पर दुस्मन जोरावर । पातसाही करे सबों के दिल पर, ए जो बैठा ले कुफर ॥३५॥
दुस्मन राह मारे इन हाल, भूले देखें बाहेर दज्जाल । छठे सिपारे लिख्या इन पर, ईसा मारसी इन काफर ॥३६॥
करसी राज चालीस बरस, सब जहान होसी एक रस । साहेबी उमत की साल दस, पीछे चौदे तबकों बाढ़यो जस ॥३७॥
अखंड भिस्त इत जाहेरी, होए रोसन सबमें विस्तरी । दुनियां दौड़ मिली सब धाए, छूट गए वरन भेख ताए ॥३८॥
कह्यो न जाए धनी को विलास, पूरी साथ सकल की आस । लीला विनोद करसी हाँस, ए सुख उमत लेसी खास ॥३९॥
ले दौड़े रोसनी दासानुदास, ले जाए पवन ज्यों उत्तम बास । इस्क न खाने देवे स्वांस, ज्यों अगनी न छोड़े दाना घास ॥४०॥
जाए पड़े प्रेम के फांस, ज्यों सूके लोहू गल जाए मांस । पीछे तीसों नूर बरसात, तिन आगूं आवसी पुल-सरात ॥४१॥
सत्तर बरस लों आग जलाए, तब फरिस्ते दिए चलाए । अजाजील विरहा आग जल, पीछे असराफीलें किए निरमल ॥४२॥
आगे असराफीलें कायम किए, तेरही में नूर नजर तले लिए । नूर नजर तले हुए सुध, आए मांहें जाग्रत बुध ॥४३॥
नतीजा पावे सब कोए, सो हुकम हाथ छत्रसाल के होए ॥४४॥
॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥१९१॥
