बड़ा कयामतनामा - प्रकरण ७ | Bada Kayamatnama prakaran 7
हुइयां सोभा तेरी सोहागनियां, इन जुबां न जाए बरनियां । ए जो मिलावा माननियां, ताए बड़ाइयां दैयां धनियां ॥१॥
कदम हादी मेरे सिर पर, जो सब दीनों का पैगंमर । हजरत ईसा रूहअल्ला नाम, कहूंगी जो कह्या अल्ला कलाम ॥२॥
रसूल रूहअल्ला और इमाम, इन तीनों मिल मोको दई ताम । मैं सिर पर ए लिए कलाम, आए कुंजी बका की करी इनाम ॥३॥
ए साहेदी सिपारे सूरत, जो उतरियां अल्ला आयत । या तो हदीसें कहूं महंमद, या बिन और न कहूं सब्द ॥४॥
बावन मसले जो कहे अरकान, जो बजाए ल्यावे मुसलमान । तिनका कौल था एते दिन, सांचे पाक दिल किए जिन ॥५॥
ए बंदगी कही सरीयत, याको फल पावें खुले हकीकत । जब खोले दरवाजे मारफत, पोहोंची सरत आई कयामत ॥६॥
और लिख्या सिपारे पांचमें, सो नीके कर देखो तुमें । कृपा भई हिंदुओं पर घनी, जित आखिर को आए धनी ॥७॥
सब पैगंमर आए इत, कह्या सब मुलक नबुवत । जो कोई आया पैगंमर, सो सारे जहूदों के घर ॥८॥
ज्यों अव्वल त्योंहीं आखिर, सोभा सारी महंमद पर । ए तुम देखो नीके कर, सारे कुरान में एही खबर ॥९॥
लोक ढूंढ़ें मांहें मुसलमान, सूझत नाहीं जो लिख्या कुरान । अव्वल सिपारे एह सुध दई, सो मैं जाहेर करहों सही ॥१०॥
हरफ अलफ लाम और मीम, ए तीनों एक कहे अजीम । जिन न जान्या एह जहूर, सो काट कुरान से किए दूर ॥११॥
याको जाने खुदा एक, ऐसो बांध्यो बंध विवेक । कलाम अल्लाएँ ऐसी कही, आलम आरिफ की हुज्जत ना रही ॥१२॥
और लिख्या है बीच कुरान, दूसरे सिपारे में एह बयान । इनका जित खुल्या है द्वार, तिनका दिल दे करो विचार ॥१३॥
ए महंमद पर दिया खिताब, माएने खोले सब किताब । सो माएने रूजू उमतसें होए, खासी उमत कहिए सोए ॥१४॥
महंमद की इनपे पेहेचान, भली भांत समझें कुरान । जैसे पेहेचानने का हक, इन उमत को नहीं कोई सक ॥१५॥
जिनको किताब दई तौरेत, सब दुनियां को एही सुख देत । मांहें लिख्या सिपारे उन्तीस, जाए देवें खुदा तासों कैसी रीस ॥१६॥
आए ईसा रूहअल्ला पैगंमर, गिरो जहूदों बनी असराईल पर । जो गिरो बनी असराईल की भई, सो औलाद याकूब की कही ॥१७॥
हुए सामिल रसूल महंमद, रूहअल्ला इस्म हुआ अहमद । संग रोसन तौरेत कुरान, सो रान्या जाए न हुई पेहेचान ॥१८॥
भए जहूदों के बड़े बखत, पाई बुजरकी आए आखिरत । इत जाहेर हुए इमाम हक, सोई काफर जो ल्यावे सक ॥१९॥
उल्लू न चाहे ऊग्या सूर, जिन अंधों का दुस्मन नूर । ए सुन वाका जो न ल्यावे ईमान, सोई चमगीदड़ उल्लू जान ॥२०॥
महंमद के कहावें मुसलमान, ए जो जाहेरी लिए ईमान । जो तौहीद का कलमा कहे, उमत सरीकी लिए रहे ॥२१॥
जो होए इस्क आकीन साबित, तोभी झूठी ए सरीकत । सिरे न पोहोंच्या इनका काम, ऐसा लिख्या मांहें अल्ला कलाम ॥२२॥
सिपारे तीसरे में कही, पांच वज्हे की पैदास भई । दुनियां हुई केहेते कलमें कुंन, एक एक हाथ एक दो हाथन ॥२३॥
एक सरूप कह्या एक हाथ, दो हाथ सरूप मिले दो साथ । रसूल रूहअल्ला और इमाम, एक सरूप तीनों बिध नाम ॥२४॥
एक गिरो आई मूलथें कही, सो मौजूद रूहें दरगाह की सही । दूजी गिरो कही खिलकत और, सो मलायक मुतकी नूर ठौर ॥२५॥
तीसमें सिपारे लिखी ए बिध, सो क्यों पावे बिना हिरदे सुध । नूह नबी के बेटे तीन, तिन में स्याम सलाम अमीन ॥२६॥
मुस्लिम किस्ती पार पोहोंचाए, काफर तोफानें दिए डुबाए । ए तीनों मिल दुनी रची और, सो तीनों आए जुदे जुदे ठौर ॥२७॥
चांद कह्या आरब फारस, रोसन स्याम लियो बड़ो जस । चांद आरब दूजा कौन होए, इत महंमद बिना न पाइए कोए ॥२८॥
पेहेले किस्ती दई पोहोंचाए, इत फुरमान ल्याए रसूल केहेलाए । हिसाम चांद कह्या हिंदुस्तान, ए जो पूज्या हिन्दुओं साहेब जान ॥२९॥
याफिस आया तुरकस्थान, तो न सक्या कोई पेहेचान । आजूज माजूज औलाद इन, तीन फौजां होए खासी सबन ॥३०॥
तीसरे सिपारे लिखे ए बोल, पढ़े न देखें दिल आंखें खोल । नूह का बेटा बुजरक स्याम, जाको दोनों जहान में रोसन नाम ॥३१॥
स्याम ल्याए चीजें दोए, चौदे तबकों न पाइए सोए । एक देवे अल्ला की ग्वाही, दूजी करे बयान हुकम चलाई ॥३२॥
पूछे रसूल सों दोए सुकन, सो साहेब ने किए रोसन । ए दोनों बात खुदाए से होए, इनको पूजेंगे सब कोए ॥३३॥
तोफतल कलाम जो है किताब, ए लिख्या तिस बीच आठमें बाब । उमतें सब पैगंमरों की मिली, सब दिलों आग दोजख की जली ॥३४॥
जलती सब पैगंमरों पे गई, पर ठंढ़क दारू काहू थें ना भई । हाथ झटक के कह्या यों कर, हम सब सरमिंदे पैगंमर ॥३५॥
सब दुनियां को एही दिया जवाब, महंमद इनको लेसी सवाब । सब दुनियां जलती महंमद पे आई, दोजख आग रसूलें छुड़ाई ॥३६॥
सबों को सुख महंमदे दिए, भिस्त में नूर नजर तले लिए । कहे छत्ता अपनायत कर, जिन कोई भूलो ए अवसर ॥३७॥
हुई फजर मिट गई वाद, भूले बड़ो करसी पछताप ॥३८॥
॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥२२९॥
