बड़ा कयामतनामा - प्रकरण ८ | Bada Kayamatnama prakaran 8
लिख्या सिपारे आखिरे सात दसमी सूरत, रोसन कुरान लिखी हकीकत । मोमिनों का लिख्या मजकूर, सो ए कहूं सब देखो जहूर ॥१॥
पाई खलासी मोमिन, हुआ मकसूद सबन । ऐसे होवे जो कोई, सांची बंदगी में सोई ॥२॥
रखो खुदाए का डर, बंदे सिजदे पर नजर । किया कबूल एह जहूर, दरगाह साहेब के हजूर ॥३॥
पैगंमर हजरत, निमाज अदा इन सरत । ऊपर से आयत आई, तब नजर आसमान से फिराई ॥४॥
किया सिजदा मूल वतन, जो दरगाह बड़ी है रोसन । यों कह्या बीच लवाब, ए हमेसां मूल सवाब ॥५॥
जो बका साहेब का घर, रखो दीदे धनी नजर । ए सिजदा तब पाइए, खूबी घर की देखी चाहिए ॥६॥
जब ए हुई खुसाली, तब भूले सिजदे खाली । निमाज के बखत दिल धर, छूटी दाएँ बाएँ नजर ॥७॥
हुआ साहेब का करम, पाया भेद बीच हरम । हुई कबूल निमाज इन हाल, हुए साहेब सों खुसहाल ॥८॥
सिर से छूट गया करज, हुए मोमिन बेगरज । छूटा मूल जो हुकम, हुआ सिजदा हजूर कदम ॥९॥
सो ए करता हों मैं तफसीर, जुदे कर देऊं खीर और नीर । पेहेले था बेहेरूल्हैवान, तब तो तिन में था फुरमान ॥१०॥
अब दरिया हुआ हक, इन में न रहे किसी की सक । दरिया हक बीच मजकूर, कह्या जाहेर खुसाली नूर ॥११॥
सुरत दाएँ बाएँ भान, सिर आगूं धरिया आन । खड़ा रहे दोऊ हाथ पकर, सो सके हजूर बातां कर ॥१२॥
हुआ साहेब सों परस, दिल से छूटी हवा हिरस । भेद पाया सिरर हक, मासूकी दरिया बीच हुआ गरक ॥१३॥
सो ए रोसन जहूर निसान, खूबी नूर बिलंद गलतान । एह बात जिनोंने पाई, बीच तेहेकीक के फुरमाई ॥१४॥
अव्वल एही है निमाज, जो गुजरे साहेब सिरताज । मिले वाही के तालिब, हुआ चाहिए दोस्त साहेब ॥१५॥
जब तें एह आसा मेटी, तब तो तूं साहेब सों भेंटी । जो लों कबू देखे आप, तो लों साहेब सो नहीं मिलाप ॥१६॥
जो लों कछुए आपा रखे, तो लों सुख अखंड न चखे । तसबी गोदड़ी करवा, छोड़ो जनेऊ हिरस हवा ॥१७॥
दोऊ जहान को करो तरक, एक पकड़ो जो साहेब हक । या हँस कर छोड़ो या रोए, जिन करो अंदेसा कोए ॥१८॥
जो ए काम तुमसे होए, तब आई वतन खुसबोए । और फैल झूठे जो कोई, काफर गुस्सेसों कहे सोई ॥१९॥
केहेत इमाम केसरी, खुदा इन वास्ते नई आयत करी । खासा सोई है बुजरक, ए साहेब कहे बेसक ॥२०॥
और जो कोई साहेब सों फिरे, काम दुनी का दिल में धरे । याही में पावे आराम, सोए रहे छल बाजी काम ॥२१॥
साफ कौल इनोंके फैल, यामें नाहीं जरा मैल । ऐसी जो कोई धनी मिलक, तिनों जगात देनी हक ॥२२॥
देना है ठौर बुजरक, आप सदका देना बलक । छोटा बड़ा जो नर नार, ए सबन पर है करार ॥२३॥
ऐसी गिरो जो दरगाही, ताए रखना आप दृढ़ाई । जेती बातें हैं हराम, ए नजीक नाहीं तिन काम ॥२४॥
या अपना या बिराना, सब परहेज किया दिल माना । तिस वास्ते ऐसी जानी, हाथ साहेब के बिकानी ॥२५॥
दाहिनी तरफ जो है हक, ए लड़कियां तिन की मिलक । निगाह रखे जानें सुपना, इंद्रियों से आप अपना ॥२६॥
इन भांत किया दिल धीर, उपजे नहीं कोई तकसीर । इन भांत की जो है औरत, तिन पाया रोज सरत ॥२७॥
और सुख ना नफसों आराम, और रह्या न चाहें बेकाम । और जेता कोई बद काम, सो नफसानी हिरस हराम ॥२८॥
जो ए काम ढूंढ़े बदफैल, काफर चाहे उलटी गैल । ऐसे जो हैं सितमगार, पाया न समया हुए खुआर ॥२९॥
और जो कोई पाक गिरो आकीन, किया अमानत बीच अमीन । इत कही जो इसारत, ए जो पाक कही उमत ॥३०॥
ए पैदास अमानत हक, इत रोजा रबानी बेसक । याही बीच निमाज असल, रखे आपा कर गुसल ॥३१॥
इनके साथ बीच हक, कोई बांधे कौल खलक । निगाह रखे खड़ा रहे आप, सूरत आयत करे मिलाप ॥३२॥
कोई निगाह रखे निमाज करे, हमेसां कबहूं ना फिरे । रखे अदब बंदगी सरत, फुरमाया अदा सोई करत ॥३३॥
मूलथें बंदगी करे जिकर, करे सिफत निकोई आखिर । ए जो मुतकी मुसलमान, करी इसारत ऊपर ईमान ॥३४॥
बंदगी एही है बुजरक, दूजी पाक गिरो बीच हक । गिरो मोमिन जमे करें, छे सिफतें वारसी धरें ॥३५॥
और जेती कोई वारसी नाम, सो ना पकड़ें हाथ हराम । जिनों किया साहेब तेहेकीक, लई मिरास अल्ला नजीक ॥३६॥
जिनों भिस्त बिलंदी पाई, गिरो बड़े मरातबे पोहोंचाई । लई औरों भिस्त मीरास, जो रहे मोमिन बीच विलास ॥३७॥
बिना मोमिन ए जो और, ताको दोजख भिस्त बीच ठौर । और काफर दोजख में जल, देखें भिस्ती मरें जल ॥३८॥
भिस्ती देखें दोजखियों दुख, देखें मोमिन होवे सुख । यों कह्या बीच मिसल जादिल, पावे ईमान बीच मिसल ॥३९॥
जो सके ना सांच कर, सो जले दोजख मांहें काफर । भिस्त दोजखी दूरथें देखें, त्यों त्यों जलें आप विसेखें ॥४०॥
ए जो कहे भिस्त वारस, रेहेने वाले भिस्त हमेस । इन आदम की पैदास, किया बीच खलक के खास ॥४१॥
खैंच किया सबों के आगे, मोमिन इनपे पेसवा लागे । बीज मिट्टी दुनियां की न्यात, पर ए पाक साफ कही जात ॥४२॥
एक किया इसकी नकल, दूजा पाक कह्या असल । आया इन तरफ बहार, जिनों पकड़या पाक करार ॥४३॥
नूस्खे रेहेमत मदतगार, इन ठौर भया उस्तुवार । तीन सरूप की एह बयान, सो ए कहे एक के दरम्यान ॥४४॥
सिफत तीनों की जुदी कही, सो सब बुजरकी एक पर दई । ज्यों बसरी मलकी हकी, त्यों रसूल रूहअल्ला इमाम पाकी ॥४५॥
न पावें ऊपर माएने जाहेरी, ए मगजों सों इसारत करी । एक सरूप अवस्था तीन, ज्यों लड़का ज्वान बुढ़ापन कीन ॥४६॥
तीन सरूप चढ़ती उतपनी, चढ़ती चढ़ती कही रोसनी । खोली राह आखिर बाग की, तंग सेती पोहोंचे बुजरकी ॥४७॥
बिध बिध की न्यामत पोहोंचाई, और कई तरबियत फुरमाई । लड़के सेती पोहोंचे ज्वान, रख्या कदम हक बयान ॥४८॥
पाई सेखी हुए बुजरक, नेक न सक करते हक । लायक खुदाए के करी सिफत, पैदा किया अर्स दोस्त ॥४९॥
कुरसी फिरस्ते लोहकलमी, कायम सितारों आसमान जिमी । पीछे आदम के पैदा भया, जात पाक से दोस्त कह्या ॥५०॥
बुजरकी दलील फुरमाई, आदम पर बकसीस बड़ाई । मेहेर करी ऊपर सूरत, इन मेहेर की करी न जाए सिफत ॥५१॥
जो कह्या इन सेती नूर, सच्चे सूर कहावें जहूर । इनका रंग है तकव्वल, सिर बिलंदी ताज सकल ॥५२॥
और मिले गिरदवाए लोक, हुआ बुजरकी का गले में तोक । ए बकसीस और से रोसन, उन सुने गैब के सुकन ॥५३॥
एह बात ए पैदास कही, सो सिफत सब महंमद पर भई । ए तीनों सिफतों भया रसूल, ए सजीवन मोती कह्या अमोल ॥५४॥
इन मोती को मोल कह्यो न जाए, ना किनहूं कानों सुनाए । सोई जले जो मोल करे, और सुनने वाला भी जल मरे ॥५५॥
बाजे कहे साहेब इस्क, सबसे जुदा ए आदम हक । जैसे जात पाक सुभान, एह मरातबा किया बयान ॥५६॥
हद सबों की करी जुबांन, क्या कोई कहे ए सिफत जहान । अब कहूं मैं इनकी बात, जो कह्या आदम पाक जात ॥५७॥
सो अफताली महंमद का भया, जो आदम ऐसा बुजरक कह्या । ए पैदा हुआ कारन महंमद, एह रसूल की कही हद ॥५८॥
जो सिफत आदम की कही न जाए, तो महंमद की क्यों कहूं जुबांए । ए दोऊ सिफत सरूप जो एक, तीसरा साकी इन में देख ॥५९॥
ईसा आदम महंमद नाम, ए तीनों एक मिल भए इमाम । और जो कहे मुरदों की भांत, साकी प्याले होसी कल्पांत ॥६०॥
सो सारे फना आखिर, जेती वस्त कही जाहेर । जिन माएने लिए ऊपर, सो ए वजूद को रहे पकर ॥६१॥
जाहेर जिनकी भई नजर, कयामत बदला कह्या तिन पर । करे जिमीन सात आसमान, वास्ते उमत महंमद दरम्यान ॥६२॥
सात हजार राह फरिस्ते, करी इसारत दुनी कयामते । अब खुदाए ने यों कर कह्या, मैं आसमान जिमी से जुदा रह्या ॥६३॥
जेती कोई पैदाइस कुंन, मोको तिन थें जानो भिंन । मैं ना इन में ना इनके संग, बेसुध कहे सब इनके अंग ॥६४॥
मेरे इनसों नहीं मिलाप, मैं बेखबरों में नाहीं आप । मैं इनों सों नहीं गाफिल, ए दुख सुख में रहे मिल ॥६५॥
सिरक इनों की मैं जानों सही, बिना खबर याकी जरा नहीं । ऊपर से उतरया पानी, तिन से नेकी बंदों की जानी ॥६६॥
मरतबा इनों देऊं उस्तुवार, इन पानी से होए करार । इबन अबास करे बयान, आया पानी इन दरम्यान ॥६७॥
पांच नेहेरें जबराईल पर, आइयां भिस्त से उतर । पांचों कही जुदे जुदे ठौर, बिना इमाम न पावे और ॥६८॥
उतरियां सरूप पांच चसमें, रहियां एक झिरने सच में । हिंद बलख और कही मिसर, कौल पाया करार पत्थर ॥६९॥
ए मेला हुआ आखिर दिन, तब नफा मसलहत पाया सबन । दजला फिरात जुदी कही, जाहेरी माएने भेली न भई ॥७०॥
चसमें पहाड़ जारी करे, चसमें कायम पानी भरे । कह्या जिमी ए बादल पानी, जिनसे साबित भई जिंदगानी ॥७१॥
उतरया पानी ऊपर ले जाए, सब कर सके जो कछू ए चाहे । इन वीरजमें होवे आप, और दूर दुनी संग नहीं मिलाप ॥७२॥
इन समें उतरया आजूज, और संग इनके माजूज । पीछे उतरया जबराईल, लेवे सबको न करे ढील ॥७३॥
एक मक्के का काला पत्थर, कुरान और खुदाए का घर । और ठौर कह्या इभराम, और यार महंमद आराम ॥७४॥
पीछले जेते गए दिन, बाकी कोई न रेहेवे किन । एक बेर फना सब किए, फेर कायम उठाए के लिए ॥७५॥
ए पांचों नेहेरें कही जो पानी, जिनसे दुनियां भई जिंदगानी । बागोंने ताजगियांं पाई, सो भी पानी हादी ने पिलाई ॥७६॥
सो भी कहे भिस्त के बाग, जिनसे खेती पायो सोहाग । इनकी मैं करों तफसीर, जुदे कर देऊं खीर और नीर ॥७७॥
उमत लाहूती कही अंगूर, दूजी जबरूती कही खजूर । मलकूती को खेती कही, इनको बड़ाई उनथें भई ॥७८॥
दोऊ कायम भई उमत, उठे बीच हादी कयामत । तीसरी कायम भई दुनियां और, तिन सबों की हज इन ठौर ॥७९॥
और दुनियां ने सब फसल पाई, उमत बाग हासिल आई । एह खुदाए का बरस्या नूर, देखो छत्ते का जहूर ॥८०॥
हुआ खुदाए के हजूर, बात याही की हुई मंजूर ॥८१॥
॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥३१०॥
