बड़ा कयामतनामा - प्रकरण ९ | Bada Kayamatnama prakaran 9
लिख्या सिपारे सूरतों, और आयतें देखो जाए । कयामत कलाम अल्लाह में, ठौर ठौर दई बताए ॥१॥
अब लों तारीख आखिर की, न पाई कुरानथें किन । सो रूहअल्ला के इलम से, जाहेर हुई सबन ॥२॥
सबों सिपारों कयामत, एही लिख्या है मजकूर । पर क्यों पाइए हादी बिना, कलाम अल्ला का नूर ॥३॥
आगूं नव सदीय के, कह्या होसी रूहों मिलाप । बुजरक मिलावा होएसी, देवें दीदार खुदा आप ॥४॥
बाकी दसमी सदीय के, सवा नव साल रहे । गाजी मिसल मोमिन की, रूहअल्ला उतरे कहे ॥५॥
रूहअल्ला रोसन ज्यादा कह्या, दूजा अपना नाम । एक बदले बंदगी हजार, ए करसी कबूल इमाम ॥६॥
बीच अग्यारहीं सब रोसनी, ज्यों ज्यों मजलें भई जित । हक न्यामत लई हादियों, त्यों लिखी कुरान में तित ॥७॥
एक जामा हजरत ईसे का, मिल दोए भए तिन । मुद्दतें एक जुदा हुआ, साल सतानवें पोहोंचे इन ॥८॥
किताब इलाही उतरी, गैब से आई इत । महीनें आठ लों उत जुध हुआ, चले मदीने से इन सरत ॥९॥
पांच किताबें पेहेचान से, हुकमें हाथ दई । ए साल निन्यानवें लिख्या, गंज छिपे जाहेर भई ॥१०॥
लकब इद्रीस जान्या गया, सौ साल की मजल । जित तीस वरक खुदाए के, हुए थे नाजल ॥११॥
टोना कह्या महंमद पर, अग्यारे गांठ लगाए । वह गांठें छूटे बिना, काहू ना सकें जगाए ॥१२॥
दस पर एक सदी भई, छूट गई गांठें सब । आमर महंमद आखिर हुई, ठौर पोहोंचे मोमिन सब ॥१३॥
दस और दोए बुरज कहे, वह बारहीं सदी कयामत । क्यों पावे बंधे जाहेरी, बुजरक इन सरत ॥१४॥
दसमी से दोए भए, सो हादी दोए बुजरक । आखिर जमाना करके, पोहोंचाए सबों हक ॥१५॥
इन बीच जो गुजरे, तिन बरसों की तफसीर । दस अग्यारहीं तीस बारहीं, और सत्तर की जंजीर ॥१६॥
इन दसों उमत खासी चली, दुनी चली तीस भए जब । पुल-सरात सत्तर कहे, पोहोंची आखिर फरिस्तों तब ॥१७॥
पीछे तेरहीं में उठ खड़े, सुख कायम पोहोंचे सब । आठों भिस्त विवेक सों, हुए नजरों न छूटे अब ॥१८॥
॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥३२८॥
