श्री बीतक
परब्रह्म स्वरूप श्री राज श्यामा जी ने संसार में प्रकट होकर श्री देवचन्द्र और श्री मेहेरराज के तन से लीला की । उनकी अलौकिक ज्ञानमयी लीला का ही वर्णन "श्री बीतक" ग्रन्थ में किया गया है । यह पूरा ग्रन्थ चौपाई रूप में है और इसकी रचना श्री लालदास जी ने की है ।
विषय सूची-
- भविष्य पुराण में राजा कहे जुग चार
- अब कहों फेर के मूल मिलावे की बीतक (महाकारण)
- अब कहो कच्छ देस की पहुंचे आप आये जित (बीतक कच्छ देश की)
- या समै हरदास जी एक दिन नीको ठहराय कर (श्री देवचन्द्र जी के स्वरूप की पहचान)
- अब इहां से आये बीच हलार देस
- अब कहों श्री देवचन्द्र जी की जो बात मूल बुजरक (दरसन)
- साल नव सै नब्बे मास नव हुए रसूल को जब
- अब तुम सुनियो मोमनों देखो अपने कदम
- अब कहूं मोमिन की जो फिदा हुए ऊपर हक
- पहिले कहों श्री देवचन्द्र जी कबीले के नाम
- पहिले दीन इसलाम में गांग जी भाई धरे कदम
- सिपारे बारमें मिने पाने चौबीस में (कुरान पुरान की साखी)
- श्री देवचन्द्र जी के अमल में साथ को सुख हुआ अंग (दोनों स्वरूपों का मिलाप)
- तेरह वर्ष माया मिने था ऊपर लौकिक बोझ
- सम्वत सत्रह सौ तिलोत्तरे हुक्म हुआ श्री राज (खेता भाई के कार्य हेतु अरब को गए)
- आय के मुलाकात करी लगे श्री देवचन्द्र जी के कदम
- सम्बत सत्रह सौ बारोत्तरे आसो महिने में
- अब फेर कहों हब्से की जाको प्रबोध पुरी नाम
- तीन सृष्ट कही वेद ने तीनों कही फिरकान
- फेर कहों श्री जीय की जो बीतक बीच इसलाम
- फेर कहे सुकन जयराम को दीप में श्रीजीयें जब
- फेर कहों दीप बन्दर की जो लड़ाई दज्जाल बीतक
- अब कहों बीतक ठट्ठे की याद करो मोमिन
- चिन्तामनि ढूंढ़त फिरे कहां है उन साध का ठौर
- ए ठट्ठे की बीतक लालदास की मुलाकात (श्री लालदास जी का श्री जी से मिलाप)
- आए पहुँचे मसकत में उतर नाव से
- अबासी बंदर में भैरों रहे सिरदार (अबासी बन्दर की बीतक)
- अबासी बन्दर से आये कोग बन्दर (आवासी बन्दर से श्री जी का ठट्ठानगर पहुंचना)
- श्री जी साहिब जी चले ठट्ठे से नलिये आये पहुंचे
- देख नूर चरचा रोसनी भई बिहारी जी को दिल सक
- श्री जी साहिब जी खुस्की चले रण आन उतरे
- हजरतें हज इत करी लेनें को मक्का
- श्री जी संग श्री बाई जी और भट्ट गोवरधन
- इहाँ लगे कतेब की चरचा में न चित
- इन समय सूरत से आया लक्ष्मीदास
- फेर दस नाम सन्यास जो बोले इस्ट प्रमाण (अथ दस नाम सन्यासी की विधि)
- षट दर्सन बोले तबे प्राचीन हम मत (अथ षट दर्सन की बिध)
- फेर श्री राज आए दिल्ली आए मिले सब साथ
- लाल दरवाजे की हवेली में श्री राजें किया हुकुम
- रोहिल्ला खान की सराय में बैठ किया विचार
- रामचन्द्र वकील के फिरे कोईक दिन
- यों करते संझा समे उठ आये अपने घर
- साथ सबे मिल बैठ के लगे करने परियान
- मुलाकात सुलतान की सुनी श्री राज नें जब
- ऐसी साहेदियां कई हैं बीच अल्लाह कलाम (लैल-तुल-कद्र)
- अब तुम सुनियो मोमिनों कहों जो बीतक तुम
- अब कहो मैं मजल की जो हुई लड़ाई सरियत (आगे आपने पत्री लिखी सो शुरु)
- ऐ समाचार सुनियो हम सूरत और सिद्ध पुर (आगे छोटी पत्री वोही में पुरजी)
- कामा पहाड़ी से होए आए बीच आमेर (अब दिल्ली छोड़ उदेपुर आए)
- फेर उहां से आये उदयपुर उतरे हवेली में (उदयपुर)
- अब कहों मन्दसोर की आये उदेयपुर से चल (मन्दसोर की बीतक)
- इहां से आए सीतामऊ तहां से नोलाई (उज्जैन की बीतक)
- राणा के मुलक से आए रामपुरे के ठौर
- अब तुम सुनियो साथ जी सुकराना करो याद (शुक्राना - आकोट)
- उहां से आए बुढ़ानपुर फेर पहुंचाया पैगाम (लाल दास लसकर को गए)
- सिपारे दसमें मिनें पाने सत्ताईस मिनें बयान
- बुढ़ानपुर से आकोट तहां रहे महिने चार
- ए बात हरिसिंह सुनी करने आया दीदार
- गढ़े की मजल में आया याद रामनगर
- पहिले सूरत सिंह सुनी बीच राम नगर (श्री जी व महाराजा जी की भेंट)
- अब कहूं बीतक परना की जब बैठे इत आए
- अब्बल हक के दिल में खेल दिखाऊं रूहन (मंगलाचरण)
- सुन्दर सेज सरूप की अति प्यारी भरी नूर (अष्ट पोहोर की सेवा- पहला पहर)
- अब कहों दूसरे पहर की सेवा साथ की जे (दूसरा पहर)
- अब कहूं आरोगन की उठत समें झीलन
- अब कहूं तीसरे पहर की बीतक जो सैंयन (तीसरा पहर)
- अब कहूं पोहोर चौथे की बीतक जो सैयन (चौथा पहर)
- अब कहूं पहर पांचमा आया जब बखत (पांचमा पहर)
- अब कहों पहर छठे की जित चरचा होत है हक (छठा पहर)
- अब रात पहर दो गई पोहोर चार दिन दो रात (सातमा प्रहर)
- अब कहों पोहोर आठमा श्री राज पौढ़ें पलंग पर (आठमा पहर)
- दिन आठों पहर की कही बिरत जो ए
- गरमी के दिनों में सब सेवा खुसबोए
