श्री बीतक - प्रकरण १०
पहिले कहों श्री देवचन्द्र जी, कबीले के नाम । जो कोई कदमों लगे, भये दाखिल निज धाम ॥१॥
मूल श्री देवचन्द्र जी, उतरे हैं अरस से । वास्ते खास उम्मत के, विहार किया साथ में ॥२॥
सनमंध जाहिर का, हुआ लीलबाई से । सेवा करी सनेह सों, सोभा दई राजें इनें ॥३॥
तिनके उदर प्रगट भये, बिहारी जी है नाम । सफर किया स्त्रीय नें, पहुंची अपने ठाम ॥४॥
जमुना बहिन कहियत हैं, थारो मेघो भाई दोय । जोरू ठकुरानी थारे की, नागजी बेटा कहया सोय ॥५॥
धनियानी मेघेय की, भाईत्रि याको नाम । जमुनाबाई दीकरी, श्री देवचन्द्र जी की इस ठाम ॥६॥
कृष्णा स्त्री बिहारीजीय की, धनयानी घर जोय । नागजी की जोरू, रंगबाई कही सोय ॥७॥
यह कबीला लौकिक, और अलौकिक कहों इत । जो कोई ल्याया ईमान, करने को खिजमत ॥८॥
प्रथम कहों हरिदास की, राधावल्लभी नाम । उनकी पहले खिजमत, श्री देवचन्द्र जी किये काम ॥९॥
जब भई इन्हें पहिचान, तब फेर ग्रहे कदम । सुख दिया सेवा मिने, सौंप दई आतम ॥१०॥
माता वृन्दावन की, धनियानी हरिदास । वृन्दावन ईमान ल्याइया, करी सेवा खास ॥११॥
मूली वृन्दावन की, नातो जोरू खसम । एह आई साथ में, जाग खड़ी आतम ॥१२॥
बेटा वृन्दावन का, कहया नाम नरहर । और माता वृन्दावन की, कछु इनको भई खबर ॥१३॥
महामति कहे ऐ मोमिनों, ए साथ बड़ो विस्तार । पर कछुक कहों हुकुमें, मेहर धनी निरधार ॥१४॥
(प्रकरण १०, चौपाई ४२९)
