श्री बीतक - प्रकरण ११
पहिले दीन इसलाम में, गांग जी भाई धरे कदम । सेवा करी श्री देवचन्द्र जी की, कदमों सौंपी आतम ॥१॥
कहों तिनका कबीला, जो दाखिल हुए निजधाम । दीदार श्री देवचन्द्र जी के, खिज़मत के किये काम ॥२॥
माता गांगजी भाई की, गंगाबाई है नाम । श्री देवचन्द्र जी तिनके, किए पूरे मनोरथ काम ॥३॥
भानबाई धनियानी, रहे गांगजी के घर में । श्री देवचन्द्र जी की सेवा, पूछ करे उनसे ॥४॥
बेटा कहिए स्यामजी, कछु न बोय ईमान । चरचा सुनता बहुतक, बिना अंकूर न भई पहिचान ॥५॥
बहू भानबाई की, अजबाई है नाम । सेवा लई सिर ऊपर, करे हमेसा काम ॥६॥
बेटा दूजा मान जी, करता था खिजमत । गांग जी भाई के वास्ते, हाजर रहवे इत ॥७॥
हीरबाई का बेटा, धनजी उनका नाम । बहिन जो है बालबाई, ए थी बीच इसलाम ॥८॥
भौजाई श्री हीरबाई, रहे सेवा में सनमुख । कै विध सेवा करके, इनों लिया अति सुख ॥९॥
भाई गोबिन्द जी रहे, ना दाखिल निज धाम । जुदा रहे सबसे, आवे न किसी काम ॥१०॥
जीवराज साथी साथ में, वासना बाई तान । माता उनकी बछाई, भई पूरी पहिचान ॥११॥
सालो रहे सामिल, गणेस उनका नाम । धनियानी रहे गोमती, करी सेवा इस ठाम ॥१२॥
हीरबाई की बेटी, जसोदा है नाम । बेटी की बेटी, राजबाई इस ठाम ॥१३॥
देवर मानबाई का, पारप्यो है नाम । देवरानी जसोदानी, करे सेवा का काम ॥१४॥
दो बेटी स्यामजी की, हरबाई लाड़बाई । पावत नित दीदार, आगे खिलौने सुखदाई ॥१५॥
मानजी का बेटा, सुखबाई की वासना । परखी श्री देवचन्द्र जी ने, जान घर अपना ॥१६॥
समय श्री देवचन्द्र जी, चरचा करते जब । इत काहू को बोलने की, ताकत न रहवे तब ॥१७॥
चरचा जोस में करें, कहें भाव से मुख । या समै इन साथ को, कहयो न जाय सुख ॥१८॥
भाव काढ़ दिखावहीं, सब चरचा को रूप । बरनन करें श्री राज को, सुन्दर रूप अनूप ॥१९॥
ब्रज रास लीला को, बड़ो दिखावें बोझ । सब्द साखी सास्त्र सब, रहस्य दिखावें कर खोज ॥२०॥
अंग में बड़ो उमंग, साथ मिलावन को । एक नया कोई जो आवत, तो उमंग न मावे अंग मों ॥२१॥
अब कहों कबीला श्री मेहेराज का, करी श्री देवचन्द्र जी मेहर । आवे नहीं हिसाब में, ए जो करी फेर फेर ॥२२॥
केसो ठाकुर पिता कहियत, माता बाई धन । श्री इन्द्रावती बाई की वासना, सौंपा धन तन मन ॥२३॥
स्त्री घरों फूलबाई, दूजी श्री बाई तेज । श्री जी साहिब जी धाम धनीय को, इनने पाया सहेज ॥२४॥
भाई गोवर्धन कहया, जासों पहिले श्री देवचन्द्र जी मिलाप । भई प्राप्त श्री मेहेराज को, हकें मेहर करी आप ॥२५॥
वासना ठाकुर गोवर्धन की, गुणवन्ती बाई नाम । और भाई ऊधव जी, गोविन्द जी इस ठाम ॥२६॥
और चतुर्भुज कहया, घर धनियानी पदमा । ए आए हैं साथ में, थे कबीले बीच जमा ॥२७॥
स्त्री ऊधवजीय की, नाम बाई भान । ए साथ में आई नहीं, कर न सकी पहचान ॥२८॥
और भाई ठाकुर श्री स्यामलजी, ए पीछे ल्याए ईमान । सीताबाई सेवा मिने, है प्रेम जी को पहचान ॥२९॥
और बाई सवीरा, यह आई साथ मिने । प्रेम जी की सोहबत से, ए फल पाया इनने ॥३०॥
विस्न जी भाई प्रेमजीय का, आया नहीं साथ में । पर पाया दीदार, श्री जी की सोहबत से ॥३१॥
और आई पूरबाई, साथ बेटा पीताम्बर । बेटे कानजी नान जी तिनके, हुए कुरबान श्री जी पर ॥३२॥
माता कान जी नान जी की, बाई कही रतन । आई परना बीच में, कहावत है मोमिन ॥३३॥
हरवंस के घर में, मेघबाई है नाम । हरखबाई की वासना, श्री देवचन्द्र जी कही इस ठाम ॥३४॥
गोकुलदास चलिया, आया था साथ में। ए श्री जी का कबीला, जो लगा था इनसें ॥३५॥
रहे रूद्रो जूनागढ़ में, था ए दूकानदार । करी सेवा श्री देवचन्द्रजी की, जान के धनी निरधार ॥३६॥
कानजी और थावर, और पदमसी जीवानाम । जसोदा और कानबाई, पहुंचे ए निज धाम ॥३७॥
डोसा और नैनबाई, मेनबाई और मानबाई । करी सेवा श्री देवचन्द्र जी की, सादी दीदार की पाई ॥३८॥
एक भाई महावजी, और जो परसोत्तम । रामजी कोठारीय के, इन्हों जाना महातम ॥३९॥
और भाई जयमल कहया, और जोरू इनकी । ए पीछे आए साथ में, सेवा बिहारी जी की करी ॥४०॥
और लछो कायथ, ए ल्याई ईमान । चरचा सुनने आवत, ना इन्हें भई पहिचान ॥४१॥
नारायन सोनी साथ में, और आए लीलाधर । ए सेवा में आवत, रस पीवत श्रवनों कर ॥४२॥
भाटिया एक भीम जी, था जोरू समेत । ए ल्याया ईमान, चरचा नित सुनत ॥४३॥
मूल जी की धनियानी, राय कुंवरबाई नाम । तारतम सुन्या तिनने, पूरे मनोरथ काम ॥४४॥
गुगलन मां दीकरी, हरबाई नाम तिन । कदमों श्री देवचन्द्र जी के, थी दाखिल मोमिन ॥४५॥
दीप में जो साथ है, एक कंसारा जयराम । और धनियानी इनकी, थी दाखिल निज धाम ॥४६॥
गणेस और स्त्री इनकी, भोजबाई बाई देव । भोज मूंजो गंगाबाई, इनों करी बड़ी सेव ॥४७॥
जीवो गंगो और ग्वाल, इनों सौंपी आतम । ए दीव में का साथ था, जिनों सुन्या तारतम ॥४८॥
मूलो पुहो करना ब्राह्मण, हासबाई बाई बेन । ए चरचा में आवत, श्री देवचन्द्र जी निरखे नैन ॥४९॥
और कायस्थ अखई, रहे नौतन पुरी मिने । मल्लो प्राग मंडई मिने, हरबीर कबीले समेत अपने ॥५०॥
और दूसरा हरबीर, आया अपने कुटुंब परिवार । तारतम सुन्या तिनने, पहुंचा परवरदिगार ॥५१॥
राधाबाई सोम बाई, सोम आई मंडई मिने । और बाई कुंवर, सामिल कबीले सें ॥५२॥
और नाथा जोसी ठट्ठे मिने, संग बड़ा महावजी ये । और लाला कायस्थ, और कायस्थ धना उसके ॥५३॥
और साथ बहुत हैं, गाम सहर और और । मैं थोड़े नाम लिखे, इनों कहे जायेंगे और ठौर ॥५४॥
महामति कहे ए साथ जी, इन साथ की सिफत । सोतो आगे होयेगी, बखत रोज क्यामत ॥५५॥
(प्रकरण ११, चौपाई ४८४)
