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श्री बीतक - प्रकरण १२ | Beetak prakaran 12

कुरान पुरान की साखी

सिपारे बारमें मिने, पाने चौबीस में । तफसीर के तीन सौ एक, तुम देखियो तिन सें ॥१॥

श्री देवचन्द्र जी सरूप को, हकें दिया तारतम नूर । तिनका विस्तार कयामतें, होयेगा बड़ा मजकूर ॥२॥

मूल वेद कतेब की, साहिदियां लिखी सबन । सो आय मिली सब इतहीं, ताय मोमिन करें रोसन ॥३॥

कागद जो भागवत का, ले आया सुक मुनी । इनका अर्थ ब्रह्म सृष्टि, खोलें जान अपनी ॥४॥

और कागद ल्याइया, महम्मद अलेह सलाम । सो बीतक श्री देवचन्द्र जी की, लिखी अल्ला कलाम ॥५॥

जनम से आखर लग, जो लों मोमिन पहुंचे धाम । सो सारी हकीकत इनमें, सब पूरे मनोरथ काम ॥६॥

एक सौ बीस बरस लों, करी दज्जाल सों जोर । यहां लों इनसे लड़ा, करके बड़ा सोर ॥७॥

पहिली लड़ाई महम्मद साहिब सों, फेर उनके यार । ता पीछे श्री देवचन्द्र जी सों, करी खबर परवरदिगार ॥८॥

श्री जी साहिब जी और गिरोह सों, लड़ा इन दरम्यान । बीच बिहारी जी के बैठ के, तहां किया बड़ा कुफरान ॥९॥

इन सारों की साहिदी, लिखी अल्ला कलाम । सो मोमिन बीतक अपनी, आगे खोले खलक आम ॥१०॥

विरोध सारी विस्व का, भागत इन बीतक । सबको पहिचान होवहीं, पहुंचे कदमों हक ॥११॥

सेवे सब मोमिन को, पहिचान के निसबत । भूल माने अपनी, बखत हुआ क्यामत ॥१२॥

सिताबी चारों खूट में, पसर गई पहिचान । तब सब कोई दौड़िया, ले ले के ईमान ॥१३॥

श्री देवचन्द्र जी सरूप की, मूल जनम की बीतक । सम्बत सोलह सै अड़तीसे, सो सत्रह सौ बावन लों हक ॥१४॥

मास आसो सुदी चतुर्दसी, इत माह सुदि चौदस । बरस एक सौ दस, ऊपर मास चार सरस ॥१५॥

सो सब में जाहिर भई, छिपी न रही लगार । दिन क्यामत के इनसे, करी जाहिर परवरदिगार ॥१६॥

मसरक मगरब से, दौड़ी आवत खलक । ताको नीयत माफक, दीदार पावत हक ॥१७॥

जो जैसा मनोरथ, करत है मन में । पूरन सब ही होत है, सोहबत मोमिनों से ॥१८॥

महामति कहे ए साथ जी, ए मेहर है हक । जैसा ईमान जिन का, होत तिन माफक ॥१९॥

(प्रकरण १२, चौपाई ५०३)

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