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श्री बीतक - प्रकरण १३ | Beetak prakaran 13

दोनों स्वरूपों का मिलाप

श्री देवचन्द्र जी के अमल में, साथ को सुख हुआ अंग । तिनकी चरचा सुनते, मावत नाहीं उमंग ॥१॥

गांग जी भाई सेवहीं, उच्छव रसोई नित । नई नई भांतों सेवहीं, हुआ अंग में उमंग इत ॥२॥

कोई नया जो आवहिं, बीच इन निज धाम । तो श्री देवचन्द्र जी सुख पावहीं, सो केता कहों इस ठाम ॥३॥

कोई नए साथी को ल्यावहीं, समझाय के दीन में । तिन ऊपर राजी होवहीं, क्या नेकी करों इन सें ॥४॥

दिल में साथ आवन का, करे मनोरथ मन । आदर होवे तिनका, ए धाम की सैंयन ॥५॥

इन भोम में देखिया, साथ धनी श्री धाम । कौन ब्रत इनसों करों, पूरों मनोरथ काम ॥६॥

इनको राजें भेजिया, देऊं धाम न्यामत । ए कौन भांतों सुख पावहीं, सोई करों मैं इत ॥७॥

ए श्री धाम से आये, खेल माया का देखन । इनको खबर कछु नहीं, पर मैं पहिचानत सैंयन ॥८॥

ए पड़े माया मिने, होय गये परबस । इनको समझावने, कौन लेवे जस ॥९॥

मैं बाहिर निकसों, दूंढ़ के काढ़ों साथ । मोको श्री धाम धनीय ने, इनके पकड़ाये हाथ ॥१०॥

तो यह मेहनत, मोकों करनी जरूर । तिस वास्ते साथ के आगे, चरचा का चलावें पूर ॥११॥

नित्यानें चरचा होत है, सो केती कहों बीतक । साथ रहे नजर में, आज्ञा दई मोहे हक ॥१२॥

अजबाई भतीजी मेघबाई की, रहे गांगजी के घर में । स्याम जी को ब्याही थी, हुई बातें इनसे ॥१३॥

मेघबाई हरबंस के, आवे अज बाई । देखे गांगजी के घर में, राज की मेहरबानगी आई ॥१४॥

राज नित देवें दीदार, आरोगें बेर तीन । वस्ता मांगे आरोगते आज, क्यों फीकी खारी कीन ॥१५॥

तंबोल दे आरोगते, और मिठाई कै भांत । जमुना जल अलाखल, चल दिखावें एकान्त ॥१६॥

सैंयन को कंचन की, एक दिन कंसेड़ी दई । कोई दिन कुछ देवहीं, यों करें नित सादी ॥१७॥

अजबाई नित बातें करें, दीदार धनी निरधार । हम तो नित देखत हैं, तुमहूं करो दीदार ॥१८॥

तब मेघबाई ने कही, जाओ गोवर्धन तुम । ल्याओ खबर इनकी, फेर बुलाय ले जाओ हम ॥१९॥

पद्मा स्त्री गोवर्धन की, सो पहिले गई सोहबत । तिन भी आये बातें करी, मैं देखी लीला इत ॥२०॥

तब गोवर्धन गये, जाय के लगे कदम । मैं सरन तुम्हारे आइया, जगावने आतम ॥२१॥

सम्बत सोलह सौ सतासिया, ए कार्तिक में मजकूर । यहां सेती उदय भई, उदया मूल अंकूर ॥२२॥

चुगली खाई कोतवाल सों, एक कायस्थ के घर । जोरू मर्द बैठत हैं, तुम क्यों न लेत खबर ॥२३॥

दोय चोपदार पठवाय दिये, तुम जाय ल्याओ बात । मोसों आय जाहिर करो, जो कछू होय विख्यात ॥२४॥

सो चुगल दिखाय पीछे फिरा, ए चले जायें सामे दीपक । छेह न आवे तिनका, जहां लगे मन सक ॥२५॥

एक फिरा कुंए पर, चार पहर रात । दूजा बारह कोस का, पन्थ किये जात ॥२६॥

जाय निकसा धरोल में, तहां भई फजर । पूछा पनिहारी को, मैं कौन गांव देखत नजर ॥२७॥

कैसी बात कहत है, के ज्यों होत दिवाना । सहर मोहबड़जीय का, तैने जान्या अपना ॥२८॥

खिसियाय के पीछे फिरा, आया मुरक के घर । घर में बड़ी दुचिताई, लगी लड़ाई लग फजर ॥२९॥

दोनों के घर में, बड़ा जो पड़िया सोर । एक दूजे को पूछत, कहो खबर कछु और ॥३०॥

फजर को आय के, दोनों कही बीतक । इन चुगलें हमको मारिया, ल्याया दिल में सक ॥३१॥

आये कोतवाल से कहया, बातें करी बनाय । जो चुगल हमको मिले, तो मारे गरदन तायें ॥३२॥

हमको इन चुगल ने, मार डारे आज । जागा ऐसी बताई, सूझे न कोई काज ॥३३॥

इन भांत कै माजिजे, और लाखों दिये निसान । पर साथ कोई न समझे, कछू न हुई पहिचान ॥३४॥

सम्बत सौलह सौ पचहतरा, भादों वदि चौदस नाम । प्रथम जाम और बार रवि, प्रगटे धनी श्री धाम ॥३५॥

हलार देस पुरी नौतन, उदर बाई धन । केसव ठाकुर पिता कहियत, तहां श्री राज प्रगटन ॥३६॥

सब भाई भेले रहत हैं, सामल जी तन में सिरदार । बड़ा गोवर्धन कहया, जो धाम लीला में खबरदार ॥३७॥

श्री देवचन्द्र जी पुरी नवतन, आये इहां बसत । सेवा गोवर्धन करें, पहुंचा नजीक बखत कयामत ॥३८॥

पहिले मिलाप गोवर्धन का, श्री देवचन्द्र जी से । तहां श्री राज के दीदार की, बातें करें घर में ॥३९॥

तब कहया गोवर्धन को, मोहे ले जाओ तुम । कहया ए मोसों न होवहीं, बिना श्री देवचन्द्र जी के हुकम ॥४०॥

तब गोवर्धन के संग, चले श्री मेहेराज । तहां हाथ छुड़ाय के गये, तित रोय गिरे इन काज ॥४१॥

अरज करी गोवर्धन ने, श्री देवचन्द्र जी सों आय । आज रोय के पीछे लगे, तब भाग के आया धाय ॥४२॥

तब आज्ञा दई श्री देवचन्द्र जी ने, ल्याओ बुलाय श्री मेहेराज । बाल वय वस्त आवत, सो होवे पूरन काज ॥४३॥

ध्रुव को चरन भगवान के, भये पांच बरस सों प्रापत । तिस वास्ते श्री मेहेराज को, आवन देओ तुम इत ॥४४॥

तब गोवर्धन श्री मेहेराज को, लेके चले साथ । तब आय चरनों लगे, सिर पर धरे हाथ ॥४५॥

बारह बरस महिना दोय, ता ऊपर भये दस दिन । तब श्री देवचन्द्र जी सों मिले, उन पहिचाने मोमिन ॥४६॥

मिलाप श्री देवचन्द्र जी का, सोहबत श्री जी साहिब । सम्वत्‌ सोलह सै सतासिय में, सो सत्रह सौ बारोत्तर लों अब ॥४७॥

सम्बत्‌ सोलह सौ सतासिया, मागसर सुदि नौम । मिलाप श्री देवचन्द्र जी सों, भए दाखिल कौम ॥४८॥

बारह बरस मास दोय, ऊपर भए दिन चार । तब से मिलाप का, बातून हुआ विचार ॥४९॥

आय के चरणों लगे, तबहीं दई निध । ततखिण हिरदे मिने, आय बैठी जागृत बुध ॥५०॥

साकुण्डल सकुमार दूंढन की, एकान्त होए सुनाई बात । मूल सरूप उनके हंसत हैं, ओ खेल में हैं अपनी जात ॥५१॥

तब ए चित में ग्रह लई, इसारत उन बखत । और बीज कुरान का, सो देखी श्री देवचन्द्र जी में तित ॥५२॥

खोजी बाई यवन को, कही रई बाई वासना जात । तब पूछी श्री जी साहिब जी यें, क्या इन में है अपनी बात ॥५३॥

तब श्री देवचन्द्रजी यें कहया, यामें कोई कोई वासना जान । और इनके कुरान में, है अपनी पहिचान ॥५४॥

हम तो इन कुरान को, बहुत किया पढ़न । पर जाहिरी लोक जो, हमको न देवे लेवन ॥५५॥

तुम्हारे आगे कहत हों, याके वास्ते सब । ए बात तुमसे होयेगी, लीला आगे होय जब ॥५६॥

और इसारतें कई धाम की, सो सुनके ग्रह लई तब । बीज मात्र इन लीला को, सो पायो उस बखत सब ॥५७॥

नित यों चरचा सुनत हैं, मिलके दोऊ भ्रात । दोऊ प्रेम में भीगे रहें, करे मूल निसबत विख्यात ॥५८॥

घर से चले दोऊ मिल के, आवे मिलकर साथ । बांध्यो चित अति हेत सों, दो नाते की बात ॥५९॥

तो एक दिन आये घर में, बड़ा भाई करत अस्नान । कहया तुम बिगड़े दोऊ भाई, भये काम काज से अजान ॥६०॥

सो सोहबत गांगजी से, और गुरु सोहबत । दोनों को निकालें सहर से, तब तुम सुधरो इत ॥६१॥

तब गुस्से होय दौड़े मारनें, मिलके भाई दोए । छिपाए माता ने घर में, सुनी आए पिता ने सोए ॥६२॥

तब कही केसव ठाकुर ने, जिनकी तुम चरचा सुनत । तिन सुनी कान जी भट्ट सें, बांचे स्याम जी मंदिर जित ॥६३॥

उतही चलके तुम सुनो, तब दियो जवाब इन इत । जो पूछें ताको देय जवाब, तो हम हमेसा बैठें तित ॥६४॥

तब पिता ले चले तिन पे, वे बैठे जाय के ताहिं । कही भट्ट लड़के कछु पूछत, देयो जवाब चित दे आहिं ॥६५॥

तब पूछी दोऊ भाई ने, भट्ट कितने गुन के लोक । तत्व कहो कितने सही, कितने प्रलय अलोक ॥६६॥

तीन गुन ते चौथो गुन नहीं, पाच तें छठो न तत्व । चौदह तें लोक नहीं पन्द्रहमों, और प्रलय चार है सत ॥६७॥

तो कहो पारब्रह्म रूप जो, सो रहत कौन ठौर । कही क्षीर समुद्र अक्षय वट पर, रहे अंगुष्ठ मात्र न और ॥६८॥

चौथो गुण तुम न कहयो, छठो तत्व न होय । लोक कहयो नहीं पन्द्रहमों, रहे कौन ठौर वह सोय ॥६९॥

तब भट्ट की सुध बुध गई, कही ए जवाब ब्रह्मा से न होय । तब कही तहां पिता नें, तुम्हारे चित्त आवे करो सोय ॥७०॥

या भांत नवतन पुरी में भई, दोऊ भाई से चरचा कै ठौर । सो बीतक कहा लों कहों, भयो प्रेम दोऊ में जोर ॥७१॥

बरस चौबीस मास दस, ऊपर भये पांच दिन । तहां लो सोहबत रहे, बीच गिरोह मोमिन ॥७२॥

सम्वत सत्रह सौ बारोत्तरे, भादों मास उजाला पख । चतुर्दसी बुधवार की, हुये दृष्टें अलख ॥७३॥

रहे लौकिक काम में, थे वजीर के कामदार । लौकिक में से जुदे हुये, रहे तरफ परवरदिगार ॥७४॥

महामति कहे ऐ मोमिनों, जिन पर हुआ म्याराज । सो खासल खास उम्मत हैं, तन मार डारत हक काज ॥७५॥

(प्रकरण १३, चौपाई ५७८)

इसी सन्दर्भ में देखें-