श्री बीतक - प्रकरण १४ | Beetak prakaran 14
तेरह वर्ष माया मिने, था ऊपर लौकिक बोझ । श्री राज तरफ रहत है, रमें बीच कौसर हौज ॥१॥
चर्चा नित विचारहीं, मन में बड़ो विलास । नित प्रते श्री राज सों, करत विनोद कै हांस ॥२॥
एक दिन श्री मेहेराज को, दिल उपजो एह विचार । हम आये हैं अरस से, भेजे परवरदिगार ॥३॥
तो हमारी हुज्जत राज सों, कछु न चलत । हम क्यों न देखें धाम को, अपनी जो बीतक इत ॥४॥
श्री देवचन्द्र जी देखत, श्री धाम के निसान । सो हमारे आगे कहत हैं, कर देत पहिचान ॥५॥
हमारा धनी धाम का, क्या तिन से ए न होय । हमें अरस अजीम की, ठौर दिखावें सोय ॥६॥
सो हमारा खेल में, इतना भी न चलत । तो क्यों कहिए हम धाम के, अपनी न देखें बीतक इत ॥७॥
पर हममें हैं अवगुन, तिस वास्ते अन्तराय । जब अवगुन हम काढ़हीं, तब क्यों न देखें हम ताय ॥८॥
तिस वास्ते अवगुण को, ढूंढन लगें जब । नजरों जो ही आइया, काढ़ दिए तब सब ॥९॥
श्री देवचन्द्र के आगे, आय अरज करते ए । मेरे अवगुण मुझको, काढ़ देओ सब इन्द्रीयन के ॥१०॥
तब देते उत्तर, तिन में न कोई अवगुण । तूं निरमल आत्मा धाम की, इन्द्रावती उत्पन्न ॥११॥
फेर अपने दिल में, करते एह विचार । श्री धाम धनी यों कहत हैं, मोहे चलना इन पर ॥१२॥
सुनत श्री मुख चरचा, श्री देवचन्द्र जी की जब । चरचा की चरचा, करत साथ आगे सब ॥१३॥
वचन वर्णन करत हैं, लेत हैं अपने सिर । ए मोको जो कहत हैं, मोहे चलना इन पर ॥१४॥
यह विचार करके, साथ को दिखावत । अपने दिल विचारत, ए मोहे करना इत ॥१५॥
तिस वास्ते अपने मन पर, करते बड़ा जुलम । कस्त अपने आकार को, जगावें अपनी आतम ॥१६॥
उतरता अहार घटाइया, रहया पैसे भर दोए । बल घटा इन्द्रियन को, सूक चला आकार सोए ॥१७॥
नैनों नीर झरत हैं, जब लों चरचा धाम । रंग जरदी का आइया, और न सूझे काम ॥१८॥
ढूंढ़त फिरे अवगुन को, अजुं मेरे रहे और । यह मेरे घर में रहया, पहुंचाऊं हादी ठौर ॥१९॥
तब घर के भूखन, कोई रहया स्त्री के पास । सो भी चित्त में अवगुन, आया दिल में खास ॥२०॥
तिनको भी काढ़ के, अरज करे आगे हादी । तब अवगुन काढ़ के, ए दिल आवे साहिदी ॥२१॥
मेरे आगे मन की, मैं देखों परख । बाजार ही में चलते, ए कहूं चले ले हरख ॥२२॥
परख ऐसी करें मन की, खीजे बहू बचन । अजहूं रही सरीखी, मान रे चण्डाल मन ॥२३॥
इन भांत अंग को, देत कसौटी जोर । अरज करते अंग की, चित्त न हुआ मरोर ॥२४॥
राह माहें चलते, कोई सामें मिल्या यार । तो मुंह फिराय के चलें, जिन बीच पड़े परवरदिगार ॥२५॥
तब श्री धाम मुंह आगे, फिरवल्या गिरद । अपना आपा देखिया, किया आकार को रद ॥२६॥
तब बालबाई आए के, कहया आगे श्री देवचन्द्र जी । श्री मेहराज के आकार की, अरज आए करी ॥२७॥
एक भाई पहिले चलिया, अब यह हुआ तैयार । तुम क्यों न कहत हो, डर नहीं लगत लगार ॥२८॥
तब श्री देवचन्द्र जी यें, सवाल किया मेहेराज । क्या है तेरे दिल में, सो मुझे कहो आज ॥२९॥
मेरे अवगुन मुझको, दिखाए देओ तुम । तब कहया मुझको, क्या पहिचानत आतम ॥३०॥
ब्रज की बातें सुनते, पानी झरत है नैन । तब श्री देवचन्द्र जी कहया, क्यों रहे तन सुनते बैन ॥३१॥
कहया मेरे आगे धाम की, बात करो जब तुम । तब पानी नैना झरे, सुख पाऊं इन हुकम ॥३२॥
तब बालबाई ने कहया, क्या पहिचान धनी धाम । जो ए बात लौकिक है, तिनसे होवे पूरन मनोरथ काम ॥३३॥
जो पहिचान होवे सरूप की, तो पलक न रहवे नैन । प्रदक्षिना फिरता रहे, और मुख न निकसे बैन ॥३४॥
जो मुझे देखे धनी धाम का, तो पलक न फेरे नैन । रात दिन दे प्रदक्षिना, मुख ना निकसे बैन ॥३५॥
ए अवगुन नहीं तेरे, क्या कहत ए सुख । अगिनत देखे अवगुन, कहयो ना जाय या मुख ॥३६॥
श्री देवचन्द्र जी पूछिया, क्या है तेरे मन में । तुम देखो मैं क्यों न देखूं, सो क्यों न होए मुझ सें ॥३७॥
यह वस्त हुकम की, सो होवे एक ही ठौर । मोहे उठाय तुम बैठो, पर ना होवे कहूं और ॥३८॥
तब चित पीछा पड़ा, हुआ मनोरथ भंग । फेर के विचार किया, श्री देवचन्द्र जी संग ॥३९॥
इन्हें काम दीजे माया का, तब पीछे हटे चित । कहया मैं हुकम करत हों, जाओ श्री मेहेराज तित ॥४०॥
तब गुजरात भेजिया, एक बहाना ले । जब चले गुजरात को, जोस फिरा तिन से ॥४१॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, सुनियो यह बीतक । आगे फेर कहत हों, जो आज्ञा है हक ॥४२॥
(प्रकरण १४, चौपाई ६२०)
