श्री बीतक - प्रकरण १५
खेता भाई के कार्य हेतु अरब को गए
सम्वत सत्रह सौ तिलोत्तरे, हुक्म हुआ श्री राज । गांग जी भाई के काम को, तुम जाओ श्री मेहेराज ॥१॥
खेता भाई गांगजीय का, गया है बरारब । पच्चीस वर्ष इनको भये, तुम सिताब जाओ अब ॥२॥
जो ए आवे साथ में, तो सेवा होये श्री राज । सो सोभा होए तुमको, पूरे होएं सब काज ॥३॥
श्री देवचन्द्र जी ने कहया, सो मान लिया हुकम । नाव चलत बरारब, तामें बैठो तुम ॥४॥
माह फागुन के बीच में, नाव चले जब । सो चालीस दिन में पहुंच ही, जाए बरारब तब ॥५॥
खेते को आए मिले, दई पाती हाथ । बहुत सुख पाइया, राखे अपने साथ ॥६॥
कारभार बखार का, सारा सौंप दिया । तुम नवतनपुरी को चलो, दुनी बहुतक जमा किया ॥७॥
श्री तारतम की बातें, सुनाई बहुतक । उनको छांट न लागहीं, सब कही अपनी बीतक ॥८॥
इनको उत ले चलों, तो सेवा होय श्री राज । भाई है गांगजीय का, इन से होत है काज ॥९॥
चार बरस परवारते रहे, बरारब जब । खेता पहुंचा अपने ठौर को, मौत हुआ तब ॥१०॥
माल मता बखार पर, हुई हाकिम की मोहोर । ए तो रहे बाहिर, किया हाकिम नें जोर ॥११॥
तब उन हाकिम ने, बुरी करी नजर । टरे पीछली रात को, पहाड़ में भई फजर ॥१२॥
इहां सेती जाए के, पहुंचे सुल्तान इमाम । फरियाद करी दो मास लों, बीच खेते के काम ॥१३॥
जब उत से पीछे फिरे, एक मिला आरब । तिन आगे बीतक कही, तिन लिख दिया तब ॥१४॥
हिम्मत करके कहियो, जब निकसे सुल्तान । तब छेड़ा पकड़ के, ए सुनाइयो कान ॥१५॥
मेरे गले में थी, सो मैं डालत हों गले तुम । लेऊं हिसाब रोज ईद के, जब होवे हक हुकम ॥१६॥
जब चला सुल्तान निमाज को, ए खड़े रहे बीच राह । धाए के दावन झटका, टूट गई कस ताह ॥१७॥
था इतमाम जोरावर, सब बरजे सुल्तान । ए कहो हकीकत अपनी, मैं सुनो अपने कान ॥१८॥
ला तखोफ या बनी, कहो सब तेरी बात । तब रुक्का दिया हाथ में, कही सब विख्यात ॥१९॥
मैं अपने गले का बोझ, सो डारत हों गले तुम । लेऊं हिसाब तुमसों, खुदाए के हुकम ॥२०॥
जब हाथ तुम्हारा हाथ में, होवेगा खुदाए के । इन्सा अल्ला ताला रोज ईद के, तब लेऊं दावन झटक के ॥२१॥
तब जवाब सुल्तान नें, दिया योंकर इत । यह कलाम दुर्लभ, है बखत रोज क्यामत ॥२२॥
छेड़ा झटका अपनो, देखा तरफ खुदाए । ए सुकन मुझको कबहूं, किनहूं न सुनाए ॥२३॥
मैं ऐता तुमको ना कहता, पर मुझ पर हुआ जुलम । मैं बहुत भटका, तब फरियाद करी आगे तुम ॥२४॥
इन्सा अल्ला ताला करे, मैं करों तेरा इन्साफ । तेरा तुझको दिलाऊं, कर दिया तोहे सब माफ ॥२५॥
ओ तो गया निमाज को, फेर ए आये अपने घर । हुआ बखत फजर का, भेजे चोपदार याद कर ॥२६॥
ल्याओ उस सख्स को, जिन दावन झटका बीच राह । इनका इन्साफ पहिले करों, ए है वास्ता खुदाए ॥२७॥
चोपदार पुकारता, कौन वह सख्स निसान । जिन इमाम को पकड़ा, फरियाद सुनाई कान ॥२८॥
श्री जी आप खड़े हते, कहया वह सख्स हैं हम । दोऊ बाजू दो पकड़ के, खड़े किए तले हुकम ॥२९॥
पहुंचे हजूर सुल्तान के, पूछी बात हिन्दुस्तान । हकीकत पूछी इसलाम की, यों कर कहे सुल्तान ॥३०॥
राजी होए बातें करीं, तें क्यों फरियाद न करी दिवान । तब बचाया तिन को, मैं न सुनाई कान ॥३१॥
तब बहुत राजी भये, सेख सल्ला की करी फरियाद । उसी बखत हुकम हुआ, जाहिर उखाडूं बुनियाद ॥३२॥
सब मता इनका, सुनत दीजियो तुम । नातो मार उखाडों जड़मूल से, जो फेरे मेरा हुकम ॥३३॥
इन भांत लिख करके, दिया एक चोपदार । आये आगे खड़े रहे, सेख सल्ला के द्वार ॥३४॥
कागद दिया हाथ में, करियो इत सिताब । हुकम हुआ मुझको, इस सख्स के बाब ॥३५॥
तुरत कुंजी बखार की, और सामा सब । काढ़ के हाथों दई, ढील न करी तब ॥३६॥
सुनी बात श्री देवचन्द्र जी, भेजे बिहारी जी स्याम । पहुंचे आये बरारब, मुलाकात करी इस ठाम ॥३७॥
तब लेखा दिया हाथ में, पहुंची सब सामा । रोजनामा आगे रखा, जो लिखा था नामा ॥३८॥
सब मेहनत अपनी, कर दिखाई बात । पर इनों का कुफर, क्योंये कर न जात ॥३९॥
इहां सेती फेर के, आये पुरी नवतन । चुगली बालबाई करी, सुनाई जाम के कान ॥४०॥
सम्वत सत्रह सै अठोत्तरे, हुआ ए मजकूर । सब सामा गई रावर में, जिनके लिखी अंकूर ॥४१॥
इहां नौतनपुरी मिने, रहे बरस दोय । गये न श्री देवचन्द्र जी पास, हरख मिलने को बड़ो होय ॥४२॥
भांत भांत बिलखे वहां, घर के बीच में आप । न वे बुलावे न ए जाय, तो क्यों कर होय मिलाप ॥४३॥
देखो जोर ए माया को, दिखावे धनी धाम । हल्की याको जिन गिनो, याके रंग में बहो न ठाम ॥४४॥
खट ऋतु में साथ को, कहया सभी ए खोल । सिखापन विध-विध के, साथ वास्ते कहे बोल ॥४५॥
एक दिन भौजाई के, वचन ताने के जोर । तब प्रात उदास होए के, गए धरोल आप कर जोर ॥४६॥
इहां सेती फेर के, गये कलाजी पास । तहां जाए रोजगार की, दिल में राखी आस ॥४७॥
कलाजी के पास, रहे बरस दोय । या उपरान्त गुजरात, आठ महीने रहे सोय ॥४८॥
फेर आये गुजरात से, कला पे मांगी बखसीस । सम्बत सत्रह सै बारोत्तरे, अब मैं पाऊं सीख ॥४९॥
अब मोसों दुनियां का, होय नहीं बेवहार । एक दिल एकान्त में, सेवों धनी निरधार ॥५०॥
तब कला जी ने कहया, तेरा है अखत्यार । जिन्हें जानो तिन्हें सौंप दयो, सो चलावे कार वेहेवार ॥५१॥
इन समै श्री देवचन्द्र जी की, फिरी सुरत निजधाम । बुलाय ल्याओ श्री मेहेराज को, मेरे हजूर इस ठाम ॥५२॥
आई बालबाई बुलावने, तिनको दिया जवाब । मैं काम छुड़ाय के, आवत हों सिताब ॥५३॥
फेर बिहारी जी आए, मांगी अम्बर कस्तूरी । सुन बिहारी जी की बात, दिल बीच धरी ॥५४॥
मंगाय कस्तूरी अम्बर, ले करी हाजर । मैं भी कदमों तले, आवत हों फजर ॥५५॥
अपना काम काज सब, किया छोड़ने का उदम । मैं इहां से फारक होय के, पहुंचों आय कदम ॥५६॥
यों करते बिहारी जी को, फेर के भेजे श्री राज । तुम सिताबी जाय के, ल्याओ बुलाए श्री मेहेराज ॥५७॥
वे कहते सैयन को, सिंध की भाखा मों । मुंह मुंह कोड़ मत्थन, मैं बातें करों तिन सों ॥५८॥
जान हुन कोड़ धड़, धड़ धड़ कोड़ मत्थन । मत्था मत्था कोड़ मुंह, मुंह मुंह कोड़ जिभ्भन ॥५९॥
हितरा मिडी तोहिजा, तांजे गुण गिनन । भाल तोहिजे हिकड़ी, पुजी ते न सगन ॥६०॥
आये बिहारी जी फेर के, बात कही इसारत । बाप को दुखत है, कछु औषधि चाहिए इत ॥६१॥
तब कहया श्री मेहेराज ने, मैं आवत हों उत । कछुक काम रहया है, मैं उसके गले डालत ॥६२॥
श्री देवचन्द्रजी के दिल में, रही बात अटक । फेर फेर कहे बुलाओ, मेहेराज रहे खटक ॥६३॥
तब बिहारी जीएं कहया, तुम फेर फेर करत याद । हम तो कहि कहि थके, तुम फेर फेर करत बाद ॥६४॥
तब बिहारी जी को कहया, तुम बुलाय ल्याओ इन । मैं धाम दरवाजे पैठ ना सकों, ठाढ़ी इन्द्रावती करे रूदन ॥६५॥
यह बचन सुन के, बालबाई पहुंची धाय । मेहेराज तुम्हें क्या हुआ, एते बुलावने आय ॥६६॥
श्री देवचन्द्र जी तुमको, याद करें फेर फेर । मैं धाम जाय ना सकों, रहया इन खातर ॥६७॥
तब श्री मेहेराज नें कहया, मोसों कही न किन ए बात । मैं तो तब हीं आवत, जो एती जानों विख्यात ॥६८॥
तब कार भार सब डार के, हुये बिदा सिताब । आप रहते थे जिनके, तिनको दे आये जवाब ॥६९॥
सम्वत सत्रह सै बारोत्तरे, श्रावन वदि अस्टमी । मिलाप श्री देवचन्द्र जी सों, कहों बात जमी ॥७०॥
महामति कहे ए साथ जी, ए नवतन पुरी की बीतक । याद करो इन समय को, सो भान देऊं सब सक ॥७१॥
(प्रकरण १५, चौपाई ६९१)
