श्री बीतक - प्रकरण १६
आय के मुलाकात करी, लगे श्री देवचन्द्र जी के कदम । तब पूछा ए कौन है, कहया श्री मेहेराज की आतम ॥१॥
नाम सुनत मेहेराज को, बड़ो जो पायो सुख । पूछा मेहेराज आये तुम, बात करने लगे मुख ॥२॥
दई दिलासा नरमी से, मुखतें कहे सुकन । मैं बहुत बेर याद किया, तुम तरफ पठाये मोमिन ॥३॥
तब जवाब श्री मेहेराज ने, दिया श्री देवचन्द्र कों । था काम लौकिक का, डाला गले और के मों ॥४॥
मोकों बुलावने का, किने न कहया वचन । जब मैं सुना सुकन, तब देखे कदम रोसन ॥५॥
अब तो फेर न जाओगे, लौकिक काम ऊपर । के फेर जाय के आओगे, काम इस्लाम पर ॥६॥
मैं तुम को इस वास्ते, फेर फेर किया याद । जो इन्द्रावती ठाड़ी रोवती, देखी ऊपर बुनियाद ॥७॥
मैं पैठ न सकों धाम में, तहां इनको रोवती देख । तिस वास्ते मैं तुमको, बुलाया कर विसेख ॥८॥
अब तो भला भया, तुम आये जो इत । मोकों अति सुख उपजा, अब मैं हुकम करत ॥९॥
फेर थाल प्रसाद सों भराय के, धराया आगे आन । तब श्री जी ने किया, बिहारी जी का सम्मान ॥१०॥
आओ बिहारी जी तुम, बैठो मुझ भेले । एक ठौर प्रसाद लीजिये, बैठ के एकठे ॥११॥
तब बिहारी जी ने कहया, मैं न बैठों संग तुम । श्री जी ने फेर कहया, अरज तलबी हुकम ॥१२॥
तब श्री देवचन्द्र जी ए कहया, आप श्री मुख सुकन । क्या रद बदल होत है, आपस में सैयन ॥१३॥
तब श्री जी ए कहया, बिहारी जी और हम । एक ठौर प्रसाद लेवें, ऐसा करो हुकम ॥१४॥
तब श्री देवचन्द्र जी ए कहा, क्यों न भेले बैठो तुम । जो श्री मेहेराज बुलावहीं, क्यों न होय एक आतम ॥१५॥
तब बिहारी जी आय बैठे, श्री जी के भेले । प्रसाद लिया एकठे, बातें करने लगे ॥१६॥
श्री देवचन्द्र जी धनी सों, बातें करीं श्री जी साहिब । अपनी जो बीतक, बतावत गये तब ॥१७॥
सुनके उत्तर दिया, भला किया अब तुम । काम माया का छोड़के, आये तले हुकम ॥१८॥
इन समें इहां दिन बाइस, रहे साथ मिने । फेर नजर करी धाम को, साथ छोड़े इन समें ॥१९॥
साथ को इन समें, कछु नहीं पहिचान । धाम नाता किने ना देखा, अपने ठौर इहां ईमान ॥२०॥
ए आज्ञा यों ही हती, करी हक सुभान । लिखा लोहमौफूज में, भई तेती त्यों पहिचान ॥२१॥
बात जो इसलाम की, रही न दिल में किन । आप अपने घरों, सब बैठ रहे मोमिन ॥२२॥
केतेक दिन पीछे, बाल बाई इत आई । श्री मेहेराज के घरों आये, ये खबर ल्याई ॥२३॥
श्री मेहेराज सों मसलहत, करने बैठी जब । अब क्या करना है तुम्हें, रहया काम धाम का सब ॥२४॥
मसनन्द श्री देवचन्द्र जी की, सोतो बड़ी बुजरक । सो खाली क्यों रहे, देखो हुकम सामने हक ॥२५॥
कोई उत आवत नहीं, भूल गए सगाई । काहू को निजधाम की, रही नहीं असनाई ॥२६॥
किनको बिठावें इन पर, किन का करें अखत्यार । निसबत नसल से करें, बिहारी जी हैं सिरदार ॥२७॥
तब श्री मेहराज ने कहया, ये ही बात है सिरे । सब साथ मिल के, ये ही काम करें ॥२८॥
यह बात बैठी दिल में, यह काम करना जरूर । साथ सों भली भाँत सों, मैं करों मजकूर ॥२९॥
पहिले श्री बिहारी जी को, मैं बैठाऊं इत । कदमों लाग सेजदा करूं, तब साथ भी आवे तित ॥३०॥
एह मसलहत करके, आई बालबाई अपने घर । समय दिन देख के, पहुंचे उस काम ऊपर ॥३१॥
आये के बिहारी जी को, बैठाये ऊपर मसनन्द । कदमों लाग के बैठे, फेर घर में भया आनन्द ॥३२॥
महामति कहें ये सैंयनों, ए बीतक पुरी नवतन । अब आगे की कहों, याद करो मोमिन ॥३३॥
(प्रकरण १६, चौपाई ७२४)
