श्री बीतक - प्रकरण १७
सम्बत सत्रह सौ बारोत्तरे, आसो महिने में । सब साथ को खबर, पहुंची श्री मेहेराज से ॥१॥
सबसों चरचा करके, चित को दिया मरोर । तुम आय सब सेजदा करो, कर खण्डनी कहया जोर ॥२॥
सब साथ ता दिन से, आए हुकम तले निजधाम । चरचा प्रात संझा को, करने लगे इस ठाम ॥३॥
जहां तहां साथ में, बात भई जाहिर । चरचा श्री धाम की, करे बिहारी जी बाहिर ॥४॥
सब उच्छव कीर्तन, हुआ साथ मिने । सरम पड़ी सबको, जान धाम अपने ॥५॥
ज्यादा किया दीन को, एहिया ने इस ठाम । साथ की सुरत फेर के, लगाई लै इसलाम ॥६॥
आगे सब के श्री मेहराज, बैठे चरचा सुनने को । सबों खण्डनी कर समझावहीं, इन साथ के मों ॥७॥
चरचा की चरचा, करें एकान्त एक ठौर । धाम धनी साथ बिना, ना दिखावें और ॥८॥
यों नित्याने चरचा करते, खुली आंकड़ी अन्तरजामी । सब आई दिल में, खुसबोय इसलामी ॥९॥
हम तो हैं धाम में, ए खेल नहीं रंचक । हम सेहेरग से नजीक, बैठे आगे हक ॥१०॥
एह खुसाली दिल में, उठत कै तरंग । हमारे धाम नजीक, हक सुभान की अरधंग ॥११॥
साथ आगे खोलनें, दिल हुआ रोसन । त्यों चरचा ज्यादा करें, खुसाल होय सैंयन ॥१२॥
सेवा करों सैंयन की, यह मनोरथ उपजत । कौन भांत कीजिये, इनों की सेवा इत ॥१३॥
इन भांत बंदगी के, लगे करने विचार । गोविन्द भेड़े के काम में, उहां ही खबरदार ॥१४॥
तहां से कमाए के, तब सेवा होए सब साथ । करी मसलहत बिहारी जी सों, लई दिवानगिरी वजीरी हाथ ॥१५॥
बात लगाई वजीर सों, जाए तिनका लिया काम । कोई बखत आवे साथ में, दीदार को इस ठाम ॥१६॥
आया बोझ लौकिक का, सिर के ऊपर सब । चरचा के करन को, अन्तर पड़या तब ॥१७॥
तब कसाला करके, चूके न बखत सुनन । धरम लगे पालने, सांचा है मोमिन ॥१८॥
उठे पीछली रात को, करने को दीदार । बिहारी जी पास आय कें, सुने चरचा परवरदिगार ॥१९॥
सरूप चरचा सुन के, तब आवें दरबार । कार भार चलावें लौकिक, होय के खबरदार ॥२०॥
यह काम बेहेवार करते, रहया चार घड़ी पीछला दिन । तब वहां से उठके, आय बैठे जमात सैयन ॥२१॥
तहां चितवनी धाम की, करत है सब कोए । सरूप वस्तर बरनन, होने लगा सोए ॥२२॥
आहार इसलाम करके, रूह को पहुंचावें खुराक । इस बेर इसलाम की, बुजरक जानी खाक ॥२३॥
अब मैं साथ इसलाम का, करों सबें एक ठौर । उच्छव रसोई करके, सेवा करों अति जोर ॥२४॥
वस्तर भूखन पहेराए कें, सेवा करों सब साथ । मोकों धाम धनीय ने, इनके पकड़ाये हाथ ॥२५॥
माया मिने बैठ के, लाहा लेने अब । धाम में जागे पीछे, एह न होवे कब ॥२६॥
तिस वास्ते इस बात की, लूट होय करनी । इनसे प्रीत कीजिये, सगाई जान धाम अपनी ॥२७॥
सो सबे जाहिर में, करों मनोरथ सब । लाभ लेऊं माया मिने, धाम में बातें होवें तब ॥२८॥
एह अजमाइस साथ की, करत हक सुभान । मोमिन की माया मिने, होत है पहिचान ॥२९॥
ऐसा जान के दिल में, सेवा लगे करनें । रखा अपने पास ही, जान धाम सगाई अपने ॥३०॥
तिनको तब ए कहया, जो हाथ चालाकी होय तुम । सो साथ की सेवा करो, यह मेरा हुकम ॥३१॥
कछु न पीछा देखियो, करते खर्च मिने साथ । मैं सब सौंप्या तुमें, दिया मुद्दा तेरे हाथ ॥३२॥
बिहारी जी को भूखन, रूच के दियो बनाइ । वस्तर करो ऊंचे, प्रेम प्रीत दिल ल्याइ ॥३३॥
एक तो कहना साथ में, और दूजा पाया हुकम । सो सेवा करने लगा, ज्यों सुख पावे आतम ॥३४॥
नाग जी के हथियार, और वस्त्र भूखन । ए सेवा साथ की, उस वखत करी मोमिन ॥३५॥
सब साथ के वास्ते, किया बुलावने का इलाज । इनको इकट्ठे करके, उच्छव कीजे श्री राज ॥३६॥
तिस वास्ते साथ को, किया बुलावने का हुकम । मैदा घीऊ खांड़ को, इकट्ठे करो तुम ॥३७॥
सामा लगे जोड़ने, धरें अपने घर में । सामा जमा होने लगी, कपड़ा मंगाया उत सें ॥३८॥
इन बात की चुगली, वजीर आगे गई । उनने कछु ना विचारिया, बात दिल में लई ॥३९॥
ए तो कारज कारन, है धनी को करने । तिस वास्ते माया का, हुआ धक्का इन समें ॥४०॥
तब बजीर नें लेय के, बैठाये अपने घर । सामा लई सरकार में, हुआ जोरा इन ऊपर ॥४१॥
सम्वत सत्रह सौ चतुरदसे, भई कुतुबखान की मुहिम । जाम वजीर गये तिन पर, खड़ भड़ पड़ी इन कौम ॥४२॥
बैठे प्रबोध पुरी मिने, जाय हब्सा लिखा इत । तहां विचार करने लगे, थे इसलाम काम पर तित ॥४३॥
क्यों ऐसा हम पर, पहुंचाया सख्त बखत । हम तो बन्दगी में हते, क्यों ऐसा किया इत ॥४४॥
थी मेरे मन में उम्मीद, ले जमात करों निजधाम । और कछुये वास्ते, कछू ना लिया काम ॥४५॥
यह विचार करते, श्री देवचन्द्र जी बैठे दिल पर । ठौर एकान्त करके, दिल हुआ विचार पर ॥४६॥
लगे चरचा करने, वरनन वानी सरूप । यों करते दिल खुला, बैठे दिल सुन्दर रूप अनूप ॥४७॥
श्री ठकुरानी जी का सिनगार, पहिले हुआ जो ये । पीछे राज का सिनगार, जरूर करने के ॥४८॥
तब साथ का सिनगार, किया चाहिये इत । ताको वरनन करत हैं, दिल खुला हुआ बखत ॥४९॥
कछु रास की रामतें, साथ की भी करों रोसन । एही सेवा साथ जी, सुन सुख पावें सैंयन ॥५०॥
दुःख मोसों जाता रहया, आय अंग में उमंग । रामत भई सब रास की, सुख पायो जो थे संग ॥५१॥
सामलिये बड़े भाई को, इत आया ईमान । चरचा सुनी इन समें, कछुक भई पहिचान ॥५२॥
अंजील किताब इन समें, उतरी कही फिरकान । हब्से के पातसाह पर, ए बड़ा लिखा निसान ॥५३॥
होते इन किताब से, नूर रोसनी जोर । तब छोड़ चित राज की तरफ को, छोड़ माया की मरोर ॥५४॥
यों करते चरचा, जबराइलें किया जोर । आया जोस इन समें, कछू न रही खोर ॥५५॥
और बानी निकसी मुखसें, सो कलाम जंबूर के । ज्यों ज्यों आयतें उतरीं, उत्तमबाइयें लिखी ये ॥५६॥
ज्यों ज्यों उतरती गईं, त्यों त्यों किये जमे । फेर उहाँ से उतार के, ले पुस्तक चढ़ाये तिन से ॥५७॥
ए दोय किताबें उतरीं, अंजीर और जंबूर । षटरूती भी इन समें, इस्क विरहा का उतरया नूर ॥५८॥
फल बीज इन समें, उठा इत अंकूर । सो तब थें चढ़े दीप में, हुआ सूरत में मजकूर ॥५९॥
बेहद बानी उतरी, दीप बन्दर जल में । जब तैयार भई, तब जाने सिर लगा आसमान से ॥६०॥
और रास की रामतें, हुआ मेरते में विवेक । और कीर्तन वेदान्त के, राह में भये अनेक ॥६१॥
और किताब तौरेत, उतरी बीच सूरत । ताको कहया कलस, सनन्ध अनूप सहर वखत ॥६२॥
गुजराती भाखा फेर के, करी भाखा हिन्दुस्तान । ए जो वास्ते ब्रह्मसृष्टि के, सुख पावे कर पहिचान ॥६३॥
केतिक बाणी धनी की, रामनगर में भया मूल । तहां से विस्तार भया, भया परना में बड़ा तूल ॥६४॥
और बानी फिरकान की, हदीसें महम्मद अलेह सलाम । भई सो सारी परना मिने, बीच दीन इसलाम ॥६५॥
जो प्रदक्षिणा निजधाम की, सातों सरूप श्री राज । सो सारे परना मिने, वास्ते सैंयन के सुख काज ॥६६॥
एक खिलवत और सागर, केतिक बानी और । सो हुई मोमिनों वास्ते, मजल परना ठौर ॥६७॥
महामति कहे ए मोमिनों, ए हादी मेंहेदी इमाम । ताकी बीतक और कहों, जो नूर दीन इसलाम ॥६८॥
(प्रकरण १७, चौपाई ७९२)
