श्री बीतक - प्रकरण १८ | Beetak prakaran 18
अब फेर कहों हब्से की, जाको प्रबोध पुरी नाम । तहां बारह महीना बीतक भई, सम्वत सत्रह सौ पन्द्रोतरे तमाम ॥१॥
कुतब खां सों सलाह करके, बजीर आया नए नगर । तब अंदर कहया महल में, क्यों ऐसा जुलम किया मेहेराज पर ॥२॥
एक तो घर लूट लिया, फेर बंध कर बैठाया । बरस रोज होने आया, क्यों ऐसा जुलम पहुंचाया ॥३॥
सिताब छोड़ो इनको, और देओ दिलासा इन । दे सिरोपाओ घरों पठाओ, ए दिलगीर होवे जिन ॥४॥
सिताब वजीर बुलाय के, तबही किये खलास । किताबें उतरी कादर से, बिन धाम न रही आस ॥५॥
ए किताबें लेयके, लगे बिहारी जी के कदम । बातें बीतक की करीं, पाया सुख आतम ॥६॥
लगे बातें करने, अपनी जो बीतक । यों किताबें उतरीं, हुई श्री मेहेराज पर हक ॥७॥
साथ सबों ने इन समें, देखी मेहर श्री राज । बांह पकड़ाई साथ की, दई हकें हाथ श्री मेहेराज ॥८॥
इत बिहारी जी चमके, सुन खटरूती के सुकन । इन तहकीक मुझसे लई, खास गिरोह सैयन ॥९॥
इन तो सुकनों में कहया, मैं लेऊं धनी अपना । तो इत बाकी क्या रहया, भई या सुकनों की पहिचान ॥१०॥
करने न देऊं जाहिर, ए बानी साथ मिने । दिल में जान ऐसा कहया, क्यों एता विरह किया आपने ॥११॥
मैं तो बैठा था एक सहर में, तेरे आगे नजर । तेरा विरह मुझ पर पड़ा, ए सुकन का देओ उत्तर ॥१२॥
अब ए बानी रहने देओ, ए चरचा सुनो साथ । अपनों जो मारग है, सोई ग्रहो हाथ ॥१३॥
बानी वहां न पसरी, वह सरत उस दिन । इन्तजार थे मोमिन, पर सुन सके न एक सुकन ॥१४॥
यहाँ से फारक भये, सोलोत्तरे के साल । वास्ते गांव बसावने, आए जूनागढ़ के हाल ॥१५॥
सत्रोत्तरे इहां रहे, अठोत्तरे के बरस । कान जी भाई इहाँ रहेवहीं, बानी सुने सरस ॥१६॥
हर जी व्यास एक ब्राह्मण, रहे तिनका चाकर होए । जब वह दुखी पड़ा, भोम उतारा सोए ॥१७॥
लगे दान करावने को, तब भया सावचेत । ए कैसा काम करत हो, मैं नही इन खेत ॥१८॥
क्यों मोहे दान करावत, जमपुरी का साधन । मैं नाहीं इन इण्ड का, मेरा क्यों कलपाओ मन ॥१९॥
दोय बात की दाझ इनमें से, लिये जात हों मैं । जाको मैं हां कही, सो ना न कही किनने ॥२०॥
जाको मैं ना कही, सो हां न कही किन । इन दोए बात की दाझ, रह गई मेरे मन ॥२१॥
ए सुकन कानजी सुन के, बड़ी उपजी दाझ । ए कैसे इनने कहया, क्या ए है हमारे मांझ ॥२२॥
ए तो सुकन सो कहे, ज्यों कहे वासना धाम । क्यों ए जीवता रहे, याके पूरें मनोरथ काम ॥२३॥
यों करते कानजी ने यह बात, श्री जी आगे करी । श्री जीएँ ये सुनके, दिल बीच धरी ॥२४॥
जो जीवता ए रहत है, कहूं चरचा के सुकन । सब सकें भानों इनकी, तुम साख रहियो सैंयन ॥२५॥
फेर एही बात को उठाया, दूर होवे गुमान । सेवा लगा कान जी करने, क्यों ये होए इन्हें पहिचान ॥२६॥
नित तरकारी ल्यावहीं, सोध के बागों से । तब राजी होवे कानजी पर, कहों स्याबास मैं ॥२७॥
मांग जो कछु मांगना, सो मैं देऊं तुम को । तें राजी मुझे बहुत किया, इन सेवा के मों ॥२८॥
जो हजार रुपया देवहीं, मैं राजी न तिन पर । तेरी तरकारी की सेवा से, खुसाल हुआ इन पर ॥२९॥
तब कहया कानजी नें, मैं मांगूगा आगे तुम से । तुम तो मोको देओगे, जो है मेरे मन में ॥३०॥
यों करते नित्याने, होये बहुत राजी । तब कानजी सों फेर कहया, तेरी क्या करों कारसाजी ॥३१॥
तब कानजी बोलिया, मैं मांगत हों एक वस्त । एक साध को सुनाओ चरचा, यही पॉंऊ मैं कस्त ॥३२॥
स्याबास कानजी तुमको, क्या तुम मांग्या मुझ से । एक तें राजी किया सेवा मिने, फेर चरचा सुनावने के ॥३३॥
बुलाओ साध वे कहां है, मैं चरचा सुनाऊं ताए । मैं तो बहुत राजी भया, जो कोई ऐसा आहार पहुंचाए ॥३४॥
तब कान जी ने श्री जी सों, कराए दिया मिलाप । मिलते ही सुख उपज्या, करनें चरचा लगे आप ॥३५॥
पूछी खबर इन उनको, कहां बसो तुम साध । कहया हम तो हैं परदेस के, सुन्या तुमारा मता अगाध ॥३६॥
भले साध तुम आये, मैं चरचा सुनाऊं तुमको । जो चर्चा कहो सो करों, तुम्हें राजी करों तिनसों ॥३७॥
ठौर दई उतरने, अपने बीच बाग में । अब होने लगी चरचा, भागवत के वचनों सें ॥३८॥
सुनत मास दो हुए, दोऊ राजी भए मगन । एक दिन ठौर नारायण की, ताके कहे वचन ॥३९॥
एक हीरे का मंदिर, ताको बड़ो विस्तार । चौरासी लाख जोजन, ताको करो विचार ॥४०॥
एह ठौर है किन की, सो मोहे कहो सुकन । तब जवाब व्यासें दिया, होय के दिल मगन ॥४१॥
एह ठौर अक्षर की, लिखा सास्त्रों में । तब कदमों लाग फेर कहया, एह ठौर पांऊ तुम सें ॥४२॥
एह ऊपर तले माहे बाहिर, के ए ब्रह्मांड तीत । मो सों कहो समझाए के, ए जो ठौर अतीत ॥४३॥
पांच तत्व तीन गुन, और मूल प्रकृत । इनको नास तुम कहयो, यह ठौर अक्षर की कित ॥४४॥
हमसों अन्तर ना करो, यह बताओ तुम । फेर फेर विनती करें, सुने तुम्हारे मुख हम ॥४५॥
तब जवाब व्यासें दिया, यह ठौर आद नारायण । खीर सागर में रहत हैं, लिखी सास्त्रों में पहिचान ॥४६॥
तब श्री जी ए कहया, ए तो कहया मिने इण्ड । ये महाप्रलय में ना रहे, उड़े त्रिगुन समेत ब्रह्मांड ॥४७॥
फेर फेर विनती करें, हम सों ना करो अन्तर । हमें तुम बिना कौन समझावहीं, दिखावे पटन्तर ॥४८॥
तब व्यासें झुक के कहया, मोहे कहत तुम क्या । सास्त्रों में ऐसा लिख्या, तो क्या उत्तर देऊं इनका ॥४९॥
कहया कटुक वचन आचारजों को, इनों ऐसे ही लिखे सुकन । तो मैं इत क्या करों, क्या निसा करों मोमिन ॥५०॥
तब कानजी ने कहा, कछु अक्षरातीत की पूछो बात । क्या जवाब करत हैं, सुनें इनके मुख विख्यात ॥५१॥
आया जोस श्री जीए को, दिया धक्का कर हाथ । क्या इनको पूछें क्या है इनमों, थका छर के साथ ॥५२॥
ए तो थका छर में, सुध नहीं अछर । अछरातीत की तिनको, ए क्या देवे उत्तर ॥५३॥
जब रीस करके कहा, श्री जी ने सुकन । तब व्यास की सुध गई, है ए बात सैंयन ॥५४॥
तब श्री जीयें कहया, सुनो व्यास वचन । जो मैं आया तुम पे, सुनने चरचा के सुकन ॥५५॥
तुम वचन अन्त समय, कहे थे मुख थें । मैं नही इन इण्ड का, क्या दान करों मैं ॥५६॥
और जाकों मैं हाँ कही, ताकी ना न कही किन । तिस वास्ते गुमान भानने, मैं भेज्या तुम पर सैंयन ॥५७॥
हमको पठाये हकनें, तुम को राखे तिन । जिन पर मेहर भगवान की, गुमान भान करे रोसन ॥५८॥
तब व्यासें वचन कहे, हे भगत हे भगतराज । मैं कहया यों ही कर, मेरा अरथ था इन काज ॥५९॥
कै गूलर लगे दरखत को, बहुत बेसुमार । तामें जीव अनेक हैं, एक दूसरे न जानन हार ॥६०॥
मैं जीव उन गूलर में का, नहीं मेरा और गूलर । आगे पण्डित मैं सब जीते, हारा न काहू सरभर ॥६१॥
सो आज मैं छोड़े हथियार, आगे तुम्हारे सब । तुम तहकीक भेजे हक के, आये मेरे सबब ॥६२॥
मोंको बताओ तुम, वह जो राह मुस्तकीम । मैं तो कछु न जानत, मोहे दिखाओ अजीम ॥६३॥
जेता अंकूर इनका, तहां लो भई सोहबत । फेर तिन से जुदे पड़े, आए नवतनपुरी तित ॥६४॥
सम्वत सत्रह सै उनइसे, देस पर आया कुतुबखान । उत इल्हाम हुआ, थी ब्रह्मसृष्टि की पहिचान ॥६५॥
कसाला उत साथ को, देखा उत बैठे । तब दौड़ आये बिहारी जी पे, आये बातें करीए ॥६६॥
फेर बीसोतरे जाम सत्ता की, लई दीवानगीरी सब । सारा कसाला सिर पर, खेंच लिया तब ॥६७॥
इहाँ से फेर गुजरात, गये बजीर संग जाम । तहाँ से माया छोड़ के, लिया मोमिनों का सिर काम ॥६८॥
आए दीप गुजरात से, श्री राज भये फारक । माया पूरी दिखाय के, नजर करी तरफ हक ॥६९॥
महामति कहे ब्रह्मसृष्ट को, माया में खेल की कही । अब आगे की कहों, ए जो बीतक भई ॥७०॥
(प्रकरण १८, चौपाई ८६२)
