श्री बीतक - प्रकरण १९
तीन सृष्ट कही वेद ने, तीनों कही फिरकान । और तीनों बानी साधों में, तामें सैयों में पहिचान ॥१॥
एक जीव ईस्वरी ब्रह्म की, तीनों के जुदे जुदे मुकाम । आम खास खासल खास, कही बीच निजधाम ॥२॥
सृष्ट ब्रह्म की साथ है, जाए महंमद दिया पैगाम । ल्याए कुंजी ईसा रूहअल्ला, दई सो हाथ ईमाम ॥३॥
करे विजयाभिनन्दन जाहिर, बुध जाग्रत अवतार । कलंक मेट नेहेकलंक करें, अखण्ड किया संसार ॥४॥
एक साहिब वेद कतेब में, सब तिनकी लिखी मजकूर । जो साहिदी नेक हुकमें, जाहिर किया नूर ॥५॥
हकें भेजा मोमिनों पर, पैगम्बर जो आखरी । सो लिखी हकीकत कुरान में, ब्रह्मसृष्ट दिलधरी ॥६॥
उनों आगूं लिया दिल में, आवें रूहें बीच इन्सान । ए खेल किया इनों वास्ते, जाने इनको आवे ईमान ॥७॥
महम्मद हक के नूर से, भई दुनिया महम्मद के नूर । चाहे कायम तिन को करें, ईमान बका मजकूर ॥८॥
पैगम्बर का माजजा, देवें सबों ईमान । एक दीन दुनी कर, किये जाहिर सातों निसान ॥९॥
रूह अल्ला की आवसी, खोलने बका द्वार । अन्त सदी दसमीय के, सब होय बारहीं कार गुजार ॥१०॥
मिलावा रूहन का, कहे गाजियों मिसल सोइ । होवे खिलवत खाना जाहिर, बका पहिचान सबों होइ ॥११॥
ईस्वरी सृष्ट फिरस्ते कहे, सो पहुंचे नूर मकान । और सृष्ट जीव की आम जो, पावें आठों भिस्त निदान ॥१२॥
मोमिन अरस अजीम के, बैठे खेल देखत । मायने खोल जाहिर किये, एही बखत क्यामत ॥१३॥
एही साइत हजूर की, तहां बेर नहीं लगार । चार घड़ी दिन पीछला, ए जाने परवरदिगार ॥१४॥
महामति कहे ऐ मोमिनों, ए बेवरा तीनों का कहया तुम । कहूं आगे और मजल की, जो दिखाया खेल हुकम ॥ १५॥
(प्रकरण १९, चौपाई ८७७)
