श्री बीतक - प्रकरण २
महाकारण
अब कहों फेर के, मूल मिलावे की बीतक । जैसी आज्ञा धनी की, सो बातें बुजरक ॥१॥
पहले मूल अद्वैत में, भोम जहाँ इस्क । तहां प्रेम रबद में, भया हुकम हक ॥२॥
एह खेल देखन की, इच्छा उपजाई दोय । अक्षर और सैयन को, आदि अनादि फल कहयो सोय ॥३॥
ताके तीन तकरार कहे, सो भये तीनों इण्ड । ताकी बीतक जुदी-जुदी, माया मिथ्या नट ब्रह्मांड ॥४॥
पहले अग्यारे बरस, और ऊपर बावन दिन । काल माया ब्रह्मांड में, खेले मिल निज जन ॥५॥
ता पीछे आये रास में, इण्ड जोगमाया जाग्रत । जहां विरह विलास दोऊ, देख के फिरे इत ॥६॥
ब्रज-रास दोऊ अखण्ड, कर चेतन बुधि फिरे मन । ए ब्रह्माण्ड तीसरा, जहां महम्मद आये रोसन ॥७॥
रास लीला खेल के, आये बरारब में । तहां बात सब जाहिर करी, चल्या मारग इनसे ॥८॥
छे दिन कुरान में, वाके भए जब । ता दिन की हकीकत, सारी छिप कही तब ॥९॥
तामें एक दिन ब्रज में, दूसरे दिन रास । एक रात तहां खेले, देखे विरह विलास ॥१०॥
मनोरथ पीछे रहे, तब तीसरो भयो इण्ड । तामें आये बरारब, आमर फैलाया ब्रह्मांड ॥११॥
एह है दिन तीसरा, रहे साठ बरस और तीन । रब्बानी कलाम अल्लाह के, सब को दिया आकीन ॥१२॥
एह कथा बहुत है, विस्तार नहीं सुमार । पर ए चौथे दिन की, सैयां करो विचार ॥१३॥
जब महंमद साहेब की, नव सदी बीतक । सवा नव बाकी रहे, दसमी के बुजरक ॥१४॥
साल नव सै नब्बे मास नव, हुए रसूल को जब । रूह अल्लाह मिसल गाजियों, सैयां उतरे तब ॥१५॥
सम्बत सोलह सै अड़तीसे, आसो सुदी चौदस को । जन्मे दिन श्री देवचन्द्र जी, आए प्रगटे मारवाड़ मों ॥१६॥
तामें गाम उमरकोट, मत्तू मेहता घर अवतार । माता जो कुंवरबाई, ताको कहों विस्तार ॥१७॥
जब जनमे मारवाड़ में, घर अति आनन्द नर नार । यह बधाई ब्रह्मांड में, त्रिगुण समेत विस्तार ॥१८॥
सुखदाई सबन को, अखण्ड करन हार । विश्व बन्दे अक्षर लों, सुके परीक्षित सों कहयो विचार ॥१९॥
सतजुग के बीज भूत, इनों बीच रहे विस्तार । होवे सब में जाहिर, अखंड ए संसार ॥२०॥
सोई वेद कतेब में, इनों की लिखी साख । और उपनिषद भागवत में, लिखी बाणी कै भाख ॥२१॥
जब को ये ब्रह्मांड, तब के एह वचन । जनम से ले बीतक, जाके सुने पतीजे मन ॥२२॥
ताके ग्रन्थ भाषा मिने, आप अपने किये सब । एक मिलाय खोल दीजिए, ए वस्त पावे तब ॥२३॥
सोई सरत कुरान में, लिखी एक सौ बीस बरस । चार पांच छठा दिन, तब जाहिर होवे अरस ॥२४॥
सब सष्टि सेजदा करे, होवे जाहिर अखण्ड धाम । जो याद नहीं अक्षर को, सो सुध सबों हुई तमाम ॥२५॥
जो दृष्टि सुपन जीव की, नहीं लखी मिनें लगार । सो दृष्टि अखण्ड सुख में, पहुंची नूर के पार ॥२६॥
ए सुध जो ले आये, रूह अल्ला चौथे आसमान । तिन सेती प्रापत भई, त्रिगुण सृष्ट पहिचान ॥२७॥
तीन सरूप की बीतक, जनम से लेकर । सो कहों आगे सैयनों, ए चरचा सब ऊपर ॥२८॥
जब भया बरस अग्यारमाँ, तब मन उपज्यो विचार । मैं कौन कहां थे आइयो, कहां मेरो भरतार ॥२९॥
पूछत फिरे परदेस में, कहां है परमेस्वर । जिन सब को पैदा किया, सो कहां है सब ऊपर ॥३०॥
कोऊ कहे वह घट घट, है व्यापक संसार । तब जान्या वह निकट, ए ही ग्रहों मैं सार ॥३१॥
एक देहुरा तहां रहे, तामें मूरत पिंगल स्याम । आगे इहां बिराजते, दै प्रदक्षणा उस ठाम ॥३२॥
ले लोटा घर से चले, दन्त धावन के काज । सुध आकार करके फिरें, आवे न मन में लाज ॥३३॥
नित्य इत प्रदक्षणा, देवें एक पोहोर । फेर दण्डवत करके, मेहनत करें अति जोर ॥३४॥
उस देस में साध सन्त, आवत नाहीं कोइ । जल कसनी देख के, काहू न आवन होइ ॥३५॥
एक बेर मत्तू मेहता संग, आए हते कच्छ देस । तहां देहुरे साध बहुत, देखे बीच विदेस ॥३६॥
बात तब की मन में रहे, मैं जाऊं कच्छ में । तहां जाय के खोज करों, पाऊं परमेस्वर तिन से ॥३७॥
घर में खटपट रहे, मन में रहे वैराग । दुनी से वैर रहे, उन्हें देखे लगे आग ॥३८॥
दै सिखापन बहुतक, कर कर थके सब कोय । ए फिराए ज्यों फिरे, कहे समझावें सोय ॥३९॥
श्री देवचन्द्र जी के मन में, जाऊं कहूं विदेस । तहां जाय के खोज करों, कोई मोहे दे उपदेस ॥४०॥
पूछत फिरे सब ठौरों, कोई मुझे बतावे राह । या समय राजा उमरकोट का, ताको बजीर जाय ताह ॥४१॥
खांड़ा विवाहने को, जाता था कच्छ में । दो सै असवार एक बहल, उतावले पहुंचने ॥४२॥
श्री देवचन्द्र जी नें सुनी, गए पूछने तिन के । तिन बजीर ने बातें करीं, हम कच्छ जायेंगे ॥४३॥
तब पूछा उन्होंने, क्या असवारी तुम्हारे । हम संग क्यों पहुंचोगे, प्यादे असवारों के ॥४४॥
तब कहया श्री देवचन्द्र जी, हम चले आवेंगे । तब उनने बरजे, जिन आओ संग हमारे ॥४५॥
तब श्री देवचन्द्रजी विचारिया, मैं काहे पूछों इन्हें । पीछे चला जाऊंगा, अपने पांवों से ॥४६॥
घरों जाय के साज को, राह की लेने लगे । थारी कटोरा लोहंडा, और लोटा जल के ॥४७॥
एक नीमचा कमर को, और कपड़े पहनन के । बकुचा बांध तैयार भये, खरची बांधी तिन में ॥४८॥
ले प्रसाद पौढ़ रहे, पीछला दिन रह्या घड़ी चार । वे साथ असवार भये, ए करने लगे विचार ॥४९॥
कमर बांधते बांधते, कछू ठील हो गई इत । वे असवार रिंग गये, ए पीछे चले जाये तित ॥५०॥
चले अति उतावले, मन में पहुंचौं धाय । वे असवार ये प्यादे, क्यों कर पहुंच्यो जाय ॥५१॥
यों करते चले गये, बीच पड़ी आए रात । ए मुलक रेतीय का, ए किन सों करें बात ॥५२॥
तहां चली राह न पाइये, भय चोरन का जोर । एक दोय निबाह न सकें, है इन भांत का ठौर ॥५३॥
एक ढेर वाउ उठाए, खड़ा करे तरफ और । फेर तहां वाउ लगे, ढेर लगे और ठौर ॥५४॥
वय बालक मन दहसत, पेट में उठा दरद । ना जाने आगे पीछे, है कौन जागा सरहद ॥५५॥
यों करते चले जाते, एक सख्स दिया दीदार । तब बड़ी दहसत भई, ऐसो आयो विचार ॥५६॥
ए चोर मोको मारेगा, नहीं बचने का ठौर । मेरा कछु न चलहे, मुझ गई दिस और ॥५७॥
इतने में आए गया, होए गई मुलाकात । देखत ही दहसत भई, वह कहने लगा बात ॥५८॥
ए भेष सिपाही का, कमर कटारी तरवार । मोंह दाढ़ी हाथ बरछी, ऐसो भेष ल्यावन हार ॥५९॥
मुख से आये वचन, कहे छोड़ो कमर तरवार । मुंह मूंदा दहसत से, कछू न आयो विचार ॥६०॥
तुरत तरवार छोड़ के, दई हाथ में श्री राज । कहा छोड़ तू गाठड़ी, ए बातें देखी इन काज ॥६१॥
तब जान्या मुझे मारेगा, उनने कहे सुकन । बिछाय पिछौड़ी सुवाये, तब कांपने लगा मन ॥६२॥
बरछी हाथ पकड़ के, एक साथल पर दे पाय । बोझ दिया सरीर का, फेर यों पूछी जाय ॥६३॥
दरद भया कछू हलका, सूल पेट का था जोर । श्री देवचन्द्र जी उत्तर दिया, कछू रह्या और ठौर ॥६४॥
फेर दूसरी जांघ मूल में, दे पांव खड़े रहे । बोझ दिया सरीर का, इन सरीर पर दे ॥६५॥
फेर पूछा क्या खबर, सूल मिटा आकार । तब उठ खड़े भये श्री देवचन्द्र जी, ऐसा किया विचार ॥६६॥
पिछौड़ी कमर बंधाइ के, बोझ बांधा अपनी पीठ पर । तब जान्या श्री देवचन्द्र जी, ए मारे नहीं क्योंए कर ॥६७॥
बन्दीखानें रख के, करेगा गुलाम । मारने से तो बचाया, अब क्या करावे काम ॥६८॥
मिल दोऊ इहां से चले, राह में अत जोर । लगे बात लौकिक पूछने, कहो कौन तुमारो ठौर ॥६९॥
नाम माता को पूछत, और कुटुम्ब परिवार । ताको उत्तर देत हैं, चले जाये तिन लार ॥७०॥
देवचन्द्र उत्तर दियो, रहें उमरकोट गाम । मत्तू मेहता जो पिता, करें सौदागरी का काम ॥७१॥
फेर खबर देस की, पूछने लगे सुकन । कौन राजा तुम देस को, कैसो ताको चलन ॥७२॥
कौन वजीर ताके रहे, क्योंकर चलत बेहेवार । कै ऐसी बातें लौकिक, एही पूछे विचार ॥७३॥
यों करते पूछत चले, पन्थ करते जाय । रात रही थोड़ी बाकी, साथ को पहुंचे धाय ॥७४॥
उस जागा खड़े रहे, पिछौड़ी छुड़ाई कमर से । अपनी पीठ पर गांठड़ी, सो दई श्री देवचन्द्र जी को इन समें ॥७५॥
दई तरवार छोड़ के, देख ए तेरो साथ । पीछे फिर के देखहीं, मेरा किनने पकड़ा था हाथ ॥७६॥
उहां तो कछु न देखहीं, कौन कहां गयो एह । ए तहकीक मेरा खावन्द, कियो विलाप याद कर तेह ॥७७॥
फेर के एता विचारिया, मेरे ए तो हैं सिर पर । जहां कहूं मैं डार हों, ए छोड़े नहीं क्यों कर ॥७८॥
ए तो तहकीक हुआ, धनी हैं मेरे हाजर । भले अब कहां जायेंगे, खोज लेऊं इन पर ॥७९॥
तब सनमुख चले साथ को, आवत रोके तिन । कौन है कहां आवत, नाम श्री देवचन्द्र लिया इन ॥८०॥
तब ले चले सिरदार पे, उनने पूछे सुकन । तुम क्यों आये हमको मिले, बड़ो अचरज भयो मन ॥८१॥
क्योंकर राह पाई तुम, क्यों पहुंचे असवारों संग । तब जवाब श्री देवचन्द्र जी दिया, आए चले जैसे वंग ॥८२॥
तुमारे पीछे चले आये, कदमों पर धरे कदम । पांव अपने बल से, चले मार्ग आये हम ॥८३॥
सबों बड़ो अचरज पाइ के, कही खोलो कमर । वे पुन डेरा डाण्डी पछाड़ी, कोई था आग जलावने पर ॥८४॥
तब उन कायस्थ सिरदार ने, रसोई का किया आदर । चाहो तो सीधा लेवो, या आओ रसोई पर ॥८५॥
तब श्री देवचन्द्र जी ने, यों कर दिया जवाब । मैं अपने हाथों करत हों, कहया कायस्थ तिन के बाब ॥८६॥
तो हमारे भंडार से, सीधा लेवो तुम । तब श्री देवचन्द्र जी ने कहा, घर से सीधा ल्याए हम ॥८७॥
तब कायस्थ दुख पाय के, कही हमारी नहीं ए रवेस । हमारी न्यात का ले हम पे, हो तुम हमारे खेस ॥८८॥
तब सीधा तिनका लिया, करी रसोई तब । जा सरूप को दर्शन पायो थे, ताको रसोई अरुगायी सब ॥८९॥
प्रसाद लेके पौढ़ रहे, फेर के उठे जब । उठके गैल चलन को, हुए तैयार सब ॥९०॥
तब उन कायस्थ ने, कहया अपने लोगों को । दोय ऊंट पर असवार, केते सामिल हो उन मो ॥९१॥
तब उनने उत्तर दिया, हम हैं जने चार । तब कहया पांचमा एह तुम, सामिल करो असवार ॥९२॥
इन भांत श्री देवचंद्र जी, आये पहुंचे कच्छ मों । गये लोक अपने ठौर, आप लगे खोज को ॥९३॥
महामति कहें ए साथ जी, एह श्री देवचन्द्र जी की बीतक । आगे खोज करेंगे, सो बातें बुजरक ॥९४॥
(प्रकरण २, चौपाई १२२)
