श्री बीतक - प्रकरण २०
फेर कहों श्री जीय की, जो बीतक बीच इसलाम । लड़ाई करी दज्जाल सों, सो कहों मुकाम और ठाम ॥१॥
जब जाम वजीर बिदा दई, देख कसाला दुख । हुआ हुकम हक सुभान का, अब ए पावें सुख ॥२॥
तब गुजरात से आये दीप में, भाई साथी जयराम के घर । उठ मिले आनन्द सो, बड़ो सुख पायो देखकर ॥३॥
लगा खेम कुसल पूछने, कहां से पधारे श्री मेहेराज । हमसों कहो हकीकत, इत पधारे कौन काज ॥४॥
तब जवाब दिया श्री जी नें, हम आए तुम्हारे काज । हमको भेजा हक नें, हकम दिया श्री राज ॥५॥
ढूंढ़ काढ़ो साथ को, माया करो खबर । याद करो निजधाम को, चलो राह इस्लाम पर ॥६॥
हुई चरचा इन समें, श्री देवचन्द्र जी सों लेके । साथ की खबर पूछते, एते दिन दीपे में रहे ये ॥७॥
कौन साथ तुम काढ़िया, किन को राह बताई । तुम साथी श्री देवचन्द्र जी को, नूर रोसनी न दिल में ल्याई ॥८॥
तुमको ऐसा ना चाहिए, कर बैठो एती अंधेर । श्री धाम धनी को देखके, तुमको सरम न आई फेर ॥९॥
एक पाती कबहूं ना लिखी, के हमारो नातो श्री धाम । श्री देवचन्द्र जी सफर किया, तुम कबहूं न आये तिन ठाम ॥१०॥
बैठे बिहारी जी चाकले, ना गये तुम तित । कबहूं खबर न पूछो तिनकी, क्या हाल तुम्हारा बखत ॥११॥
मिल गये माया मिने, जाने अनादि के इत । हम कबहूं न जायेंगे, श्री धाम लीला मों तित ॥१२॥
तुम को ऐसा न चाहिऐ, देखो अपनी बुनियाद । तुम श्री देवचन्द्रजी के साथी, गिरोह पैगम्बर आद ॥१३॥
तिन सामे तुम ना देखया, के खाविन्द हमारा कित । हम आये माया देखने, क्यों ऐसा भूलो इत ॥१४॥
यों वचन खण्डनी के, श्री जी कहे बेसुमार । कै दृष्टान्त देके किया, जीवता खबरदार ॥१५॥
कब लों कासा कूटेगा, कब लों हथौड़ा एहरन । कब लों घर में बैठेगा, आई सिर पर क्यामत रोसन ॥१६॥
एह मुद्दाह चौदह तबक, सो अब होत है नास । कछु सरम न आई हक की, तुम कहावत गिरोह खास ॥१७॥
बहुत दिन मुरदार में, तुम किया गुजरान । अब केते दिन जीओगे, कछु घर की करो पहिचान ॥१८॥
कोई न अघाया इनमें, चचोड़त ठौर मुरदार । श्री धाम धनी सुख छोड़ के, क्या हमेसा होओगे ख्वार ॥१९॥
एह इन्द्रियन के स्वाद को, लगा सब संसार । ए मोह के जीव रहेंगे मोह में, तुम को तो चाहिए विचार ॥२०॥
तुमसे माया जीव से, एता भी न होय फरक । श्री धाम धनी की जिकर में, हुआ चाहिये गरक ॥२१॥
सो बोय न आवत तुममें, ना चरचा चितवन । ना साथ मिलावा सैंयन, ना दिल को किया रोसन ॥२२॥
ए बचन सुनके रोइया, भूल मानी अपनी सब । मुझसे कछु ना हुआ, करो धिक्कार आपको तब ॥२३॥
हमको इन माया मिनें, याद न आया धाम । हम भूले तहकीक, आड़े माया के काम ॥२४॥
ना जानी हम निसबत, ना कछु भई पहिचान । ना तो हम ऐसा क्यों करें, जो कछु बोए होती ईमान ॥२५॥
अब मेहर देखी श्री राज की, जो भेज दिये तुम को । हमारी तरफ न देखिया, हम तो डूबे संसार मों ॥२६॥
इन भांत की चरचा भई, सब मिला घर का साथ । सब आये चरनों लगे, जो धनियें पकड़े हाथ ॥२७॥
आदर रसोई का किया, नहवाए श्री मेहेराज । बैठाये रसोई मिने, अरूगाये श्री राज ॥२८॥
प्रसाद सबों ने लेय के, करी पौढ़ने की अरज । हम ना आये पौढ़ने, हमारी तो और गरज ॥२९॥
तुम्हें माया से काढ़नें, हम आये इन काज । तुम छोड़ों मुरदार को, याद करो श्री राज ॥३०॥
फेर बैठे चरचा करने, ब्रज को जो बरनन । देखो पगले आपनें, क्यों कर भरे सैंयन ॥३१॥
कैसा प्रेम तुम से, ब्रज में करते श्री राज । कौन भाँत तुम चलते, करते माया का काज ॥३२॥
कुटुम्ब परिवार सब थें, रहते चित्त उदास । तुमको एक श्री राज बिना, और ना रहती आस ॥३३॥
बैठे थे घर अपने, चित्त श्री राज के चरण । हिरे फिरे टहल में, रहे प्रेमैं में मगन ॥३४॥
कोई ना लगता तुमको, इन माया को नेम । रहों सदा छके जोस में, आठों जाम इन प्रेम ॥३५॥
तो फेर आए जब रास में, किया गौपदवच्छ संसार । नजरों कछु न आइया, आड़े परवरदिगार ॥३६॥
क्योंकर जोगमाया मिने, बदले तुम आकार । जोगमाया नें बीच में, नये क्यों कराये सिनगार ॥३७॥
तुम क्यों उथले किये राज सो, साम सामें बचन । क्यों कर तुमको राज नें, दिखाय वृन्दावन ॥३८॥
क्यों कर तित खेले तुम, मिलके ब्रज का साथ । क्यों कर राज रमे तुमसों, क्यों खेले लेके बाथ ॥३९॥
क्योंकर तुम सुख में, होय गए मग्न । क्यों अंतरध्यान होय के, विरह की दई अगिन ॥४०॥
महामति कहे ए साथ जी, ए दीप की बीतक । अजूं और बहुत है, सो कहों ग्रहे माफक ॥४१॥
(प्रकरण २०, चौपाई ९१८)
