श्री बीतक - प्रकरण २१ | Beetak prakaran 21
फेर कहे सुकन जयराम को, दीप में श्रीजीयें जब । रास लीला याद करते, पहिले कहया सनमन्ध को सबब ॥१॥
फेर तुमही प्रगटे क्योंकर, क्योंकर भाना सोक । फेर राज सों मिलके, करने लगे जोक ॥२॥
क्यों कर जमुना त्रट, लगे थे करन झीलन । क्यों कर सिनगार करके, याद करी बातें मोमिन ॥३॥
क्योंकर तुम आसन किया, तापर बैठे श्री राज । क्यों घेर बैठे श्री राज को, अरूगावन के काज ॥४॥
फेर झीलना करके, बैठे आरोगन जब । बिरहा ताप याद आइया, इत सवाल किये हैं तब ॥५॥
बातें क्योंकर तुम करी, बैठे हिरदे विरह बचन । क्यों पूछे प्रस्न श्री राज सों, क्यों उत्तर दिया रोसन ॥६॥
भई क्यों आज्ञा धाम चलने, क्यों रहे मनोरथ तुम । क्योंकर भाग्या सुपना, तुम पर हुआ हुकम ॥७॥
फेर इत सुपन भागा, जब मोमिन पहुंचे धाम । चाह रही खेल देखने, होय पूरे न मनोरथ काम ॥८॥
अजूं मनोरथ रह गये, क्यों कहेगी रूहें विख्यात । क्योंकर राजें दिखाइया, तुम्हारे दिल की बात ॥९॥
तिस वास्ते इण्ड तीसरा, रचिया तुम कारन । त्रैगुन खिलौने तुम्हारे, तुम हो खास सैंयन ॥१०॥
फेर खेल क्योंकर किया, याद करो ताए तुम । क्यों रमाये तुमको दे, तुम्हारे साथ अपना हुकम ॥११॥
अजूं तुम मोह अंधेर में, जो एता दिया तुम्हें याद । फेर फेर माया मोह में, याद न करो बुनियाद ॥१२॥
इन चरचा के रस में, देखा न जाते दिन । सुनके सब मगन भये, दिल हुआ अति रोसन ॥१३॥
फेर चरचा करने लगे, भलो जो पायो सुख । ता समें साथ की सिफत, कही न जाय या मुख ॥१४॥
सम्वत सत्रह सै बाइसे, दीप पधारे श्री राज । दोए बरस तहां रहे, सब पूरे मनोरथ काज ॥१५॥
नित चरचा इन भांत की, होवे दीप बन्दर में । बड़ा सोर पड़ा सहर में, आवत सब सुनने ॥१६॥
अपने अंकूर माफक, हिस्सा लिया सबन । पर आये केतेक साथ में, जो निसबती साथ सैंयन ॥१७॥
जुध किया दज्जाल नें, बड़ा जो किया सोर । हाथ पांव अपने पटके, पर कछु न चला जोर ॥१८॥
धक्का दिया बड़ा साथ को, पर जाको डग्या न ईमान । सोई खास गिरोह मोमिन, जाको हकें दई पूरी पहिचान ॥१९॥
अब कहों साथ आवन की, पहिले आये जीवा और जयराम । रतनबाई घर में रहे, किया माया मिनें आराम ॥२०॥
चरचा सुनके आइया, रहे गणेस इन घर मिने । यह आया साथ में, सुन राज की चरचा से ॥२१॥
गंगादास आइया, इन चरचा के संग। आय बैठा साथ में, कर कलजुग से जंग ॥२२॥
नरसिंह दास ग्वाल जी, ए आय बैठे बीच निजधाम । जंग भया दज्जाल सों, ए डगा नहीं इन काम ॥२३॥
गरीबदास साथ में, था पहिले का भोज भाई । आवत नित राज पास, ए चरचा श्रवन देने को सुखदाई ॥२४॥
इत सरूप दे आई साथ में, वीरबाई और तेज । और तेज बाई गेहेलबाई, इनों का सेवा में बड़ा हेज ॥२५॥
चम्पा और सुहासन, बेलबाई और बाल । ए आई चारों साथ में, हुये राज अति खुसाल ॥२६॥
यों साथी साथ में, भये संगी चरचा के । पचास साठ आये साथ में, आहार चरचा देवें ए ॥२७॥
बड़ो विलास जो होवहीं, सो क्योंकर कहों इन मुख । लाहा लियो साथ में, सो कहयो न जाए या सुख ॥२८॥
बड़ा सोर हुआ साथ में, कांप्या कुली दज्जाल । ए आये मेरे दुस्मन, मोकों करे बेहाल ॥२९॥
महामति कहे ए साथ जी, ए बीतक दीप बन्दर । लड़ाई दज्जाल सों, पहुंचाई सख्ती मोमिनों पर ॥३०॥
(प्रकरण २१, चौपाई ९४८)
