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श्री बीतक - प्रकरण २२

फेर कहों दीप बन्दर की, जो लड़ाई दज्जाल बीतक । तो मेहर में राखे मोमिन, करी सुभानल हक ॥१॥

कथा बांचने के आसन, सो हुये दुसमन । श्रोता जो थे उनके, सो आय देने लगे श्रवण ॥२॥

सवाल पूछे जाए तिनको, हमको देओ जवाब । इनको अर्थ आवे नही, रख न सके ताब ॥३॥

तब चुगली को चित्त में लिया, कोई करे उपाए । इनको इहां से काढ़िये, सब झगड़ा कीजे मिल धाए ॥४॥

मिल एक चुगल ठाढ़ा किया, करो फिरंगी से अरज । ये देव तुम्हारे निन्दत, करो हमारी गरज ॥५॥

चुगल केते दिन पीछे, गया फिरंगी पास । एक सख्स मिला दरबार में, इनही कारज की आस ॥६॥

तब उन सख्स ने कहया, तुम कहां जात कौन काम । आए उतावले दरबार में, इन बेर इस ठाम ॥७॥

तब कहया चुगल नें, कोई नया साध आया इत । सो निंदत सब देवों को, ताकी चुगली को जात तित ॥८॥

तब उनने कही तें निंदा, सुनी अपने कान । के तुम कही काहू की कहत हो, बिना करें पहिचान ॥९॥

तब उनने कही मोसो, नही उन साध पहिचान । मैं निन्दा कानों भी न सुनी, कही कहों औरों की जान ॥१०॥

ऐसा काम करत है, बिन देखे अपने नैन । फिरंगी ऐसे जालिम, सुनत तुम मुख बैन ॥११॥

तुरत अमल करत है, बहुत बुरा ए काम । तिन साध को कसाला, देवें फिरंगी इस ठाम ॥१२॥

तो क्या हाल तुम्हारा होवहीं, कछु होयगा तुम्हें दुख । उनके दिल भली लगी, बड़ो जो पायो सुख ॥१३॥

वह सुनत ही पीछे फिरया, ए कहके भया अलोप । फेर देखे तो उत ना पावहीं, होय के गया गोप ॥१४॥

साथ में खल भल पड़ी, हुआ चुगल का डर । भागे चारों तरफों, खाड़ी गये उतर ॥१५॥

कोई सहर में छिप गये, कोई कहें हम न जावें इत । कोई कहे हम न सुनें, कबहूं न गये तित ॥१६॥

इन भांत दज्जाल नें, सब के लिए हथियार । कोई खड़ा न रह सकया, तरफ धनी निरधार ॥१७॥

एक जयराम खड़ा रहया, और इनके घर के लोक । इनों आपोपा दिया, रहे अपने जोक ॥१८॥

ए तो नजर दज्जाल की, दिखाए अजमाए इन । खड भड पड़ी साथ में, डगे इत सैंयन ॥१९॥

वह तो सोर ऊपर का, स्याह मुंह भए चुगल । फेर साथ बैठा सब मिलके, करनें लगे नकल ॥२०॥

हांसी हुई साथ में, कहने लगे बीतक । भूल मानी भागते, आगे बैठ के हक ॥२१॥

फेर श्री राजें लिया दिल में, क्योंए इहां से पावें निकसन । साथ जुदा जुदा काढ़ना, क्यों इकट्ठे होए सैयन ॥२२॥

इन उपाय के वास्ते, आये दीप मारी आरबन । आई श्री बाई जी बंध में, तब चले छुड़ावने तिन ॥२३॥

नवी पोर बन्दर पाटन, सब ठौरों देखा फेर । काहू न हुआ मौयसर, के मोहजल की उठी लहर ॥२४॥

साथ में खल भल पड़ी, दज्जालें किया जोर । ठौर ठौर फितने उठे, करनें लगे सोर ॥२५॥

इहां सेती आये कच्छ, थावर दिया साथ । मंडई मिने आये के, साथ के पकड़े हाथ ॥२६॥

तहां प्रागमल कुंवरबाई, केतेक रहवे साथ । भूल गये साथ चरचा को, लई दज्जाल सों बाथ ॥२७॥

तहां खण्डनी करके, फेर जीवते किये सब को । ऐ हाल तुम्हारा क्यों हुआ, रहके माया मों ॥२८॥

अब जागो दिन आइया, धाम चलने का । अब कहा लों खेल देखने, रहोगे माहें माया ॥२९॥

ए काहू के रही है, इनकी कौन प्रतीत । तुम क्या करोगे इनको, रहो दुख देखनें इत जित ॥३०॥

तुम तो चतुर प्रवीन हो, है तुम्हारा तन धाम । तिनको भूल के माया में, करो कुफर काम ॥३१॥

तुमको ऐसा न चाहिये, जो भूलो अपनो ठौर । धाम लीला को छोड़ के, जाय काम करो और ॥३२॥

तुम देखो ओ घर अपना, हमको क्या बताया श्री राज । हम खड़े कौन भोम में, हम आये थें कौन काज ॥३३॥

उहां एक दिन रहके, किये जीवते सब । चरचा कर समझाए के, कपाइए आये तब ॥३४॥

हरबंस ठाकुर तहां रहे, अपने कबीले समेत । तहां आय बासा किया, जान धाम का खेस ॥३५॥

चरचा करी तिनके घरों, कहे खण्डनी के बचन । सबे हुये जागृत, दो दिल हुआ रोसन ॥३६॥

भेजे बिहारी जी के पास, जाये करो दीदार । तुमको ऐसा न चाहिये, जो छोड़ो धनी निरधार ॥३७॥

तहां से आये भोजनगर, आये घर वृन्दावन । मिलाप किया तिन सों, हुआ खुसाल मगन ॥३८॥

कर आदर भली भांत सो, अरूगाये श्री राज । लगे बातां पूछने, हम सों कहो काज ॥३९॥

कही बात बीतक की, भई चरचा इन समें । खण्डनी के कहे बचन, सुख पाया तिन सें ॥४०॥

फेर के चरचा भई, बचन खण्डनी के । वैराग पूरा राज को, सो घात बतावें ऐ ॥४१॥

सब को मीठी लगी, होय चरचा जो हाल में । मकसूद होवे तिनसों, सब सक जावे सुन के ॥४२॥

जो मलीनता मन की, सो सब हुई दूर । बड़ा सुख पाया इन समें, करते धाम मजकूर ॥४३॥

दिन दो एक रहके, फेर नलिये पहुंचे । तहां सेती चलके, आये ठट्ठे नाथे के ॥४४॥

पूछत घर उनका, नाथे सों भयो मिलाप । मिलते ही सुख उपज्या, मिट गयो सब ताप ॥४५॥

बात लगे पूछने, कौन भाग हैं हम । उहाँ सेती इहाँ लों, धरे मुबारक कदम ॥४६॥

महामति कहे ऐ साथ जी, दीप से ले ठट्ठा में । अब फेर कहों ठट्ठे की, भई बीतक जो हमसे ॥४७॥

(प्रकरण २२, चौपाई ९९५)

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