Kuljam.org

विषय-सूची

श्री बीतक - प्रकरण २३

अब कहों बीतक ठट्ठे की, याद करो मोमिन । जो दिखाया खेल तुम को, बीच जिमी नासूत सुभान ॥१॥

श्री जी आये ठट्ठे में, रहे दिन दस-बार । फेर लाठी बन्दर आये, हुए इत हुसियार ॥२॥

विस्वनाथ भट्ट मिले, आये देवे के दुकान । उन आदर बड़ो कियो, थी ऊपर की पहिचान ॥३॥

इहां से चढ़े नाव में, सत्रह दिन लगा तूफान । ओ जहाज फेर आई, जो था हुकम सुभान ॥४॥

फेर पधारे साथ वास्ते, अजूं मोमिनों सों न भयो मिलाप । तो नाव जाय न सकी, फेर के आये आप ॥५॥

फेर लाठी से ठट्ठे आये, नाथा जोसी मिला धाए । बन्धन सो मुलाकात भई, उन अपने घरों पधराए ॥६॥

फेर जिन्दा दास मिले, सुनी चर्चा बाई ठाकुरी । ओ आई साथ में, मेहर राज की उतरी ॥७॥

तब होने लगी चरचा, बड़ो आनन्द भयो साथ । चरचा करें जोस में, जाके धनियें पकड़े हाथ ॥८॥

इन समें लोक आवत, चरचा सुनने को । सोर पड़ा सहर में, एक साध आया ठट्ठे मों ॥९॥

जो कोई साध ए सुने, सो करने आवे दीदार । सुन चरचा राजी होवे, कहे सुकर परवरदिगार ॥१०॥

सुने साध चिन्तामन, रहे कबीर के धरम । कहया कीजे दीदार तिनका, देखें चरचा उनके करम ॥११॥

घरों गये उनके, तिनसों करी मुलाकात । देखत ही पाया सुख, वह करने लगा बात ॥१२॥

कहां से आये तुम, चरचा करो हमसों । के तुम हमको सुनाओ, जो कछु ज्यादा आवे तुमको ॥१३॥

जो देने आये हों तो देओ, लेने आये हो तो देवें हम । तुम सुनो हम कहें, ज्यों होए चरचा आतम ॥१४॥

कहो तो चतुर्भुज का, दिखाऊं तुम्हें दरसन । के कहो ज्योति स्वरूप को, के सेससांई सहस्त्र फन ॥१५॥

के झिलमिल अनहद, ए सब दिखावें हम । ना तो तुम हमको दिखाओ, जो कछु पाया होवे तुम ॥१६॥

तब श्री जीयें कहया, हम लेने आये वस्त । हमको तुम बताये देओ, ए है हमारा कस्त ॥१७॥

जो कछु तुम कहया, सो ग्रहें तुम्हारे वचन । तिनका निरणय कर देओ, दिल करो रोसन ॥१८॥

एक कमाल की साखी पर, चरचा हुई जोर । जोस में श्री जी ए कहया, तब पाया चित मरोर ॥१९॥

साखी :कहया कोड़ी ते हीरा भया, हीरा ते भया लाल । आधा भक्त कबीर है, पूरा भक्त कमाल ॥

तब श्रीजीए कहया, तुम क्या जानो कबीर । तुम जो आधा भक्त इनको कहया, जो चित नाहीं तुम धीर ॥२०॥

कहां मजल कबीर की, केती अकल कमाल । तौल देखो दोनों को, किनका कैसा हाल ॥२१॥

बिन पहिचाने बोलत, नाहीं तुम सराफ । कहां कबीर कहां कमाल, विचार देखो आप ॥२२॥

एक कबीर का कीर्तन, सुनाये दिया तब । तब चिन्तामने ने कहया, देखो सब्द निकस्या अब ॥२३॥

साखी :एक पलक ते गंग जो निकसी, हो गयी चहुं दिस पानी । उहि पानी दो परवत ढांपे, दरिया लहर समानी ॥ उड़ मक्खी तरवर चढ़ बैठी, बोलत अमृत बानी । वह मखी के मखा नाहीं, बिन पानी गरभानी ॥ तिन गरभें गुन तीनों जाये, वह तो पुरूष अकेला । कहे कबीर या पद को बूझे, सो सतगुरू मैं चेला ॥

देखो सब्द आगे चला, सो सख्स मिल्या आए । अब देखो सब्द इनके, ए सब्द पार पहुंचाए ॥२४॥

मैं तुमसे कहता था, जो सब्द आगे चलत । अपने सेवकों से कही, वह सख्स पहुंचा इत ॥२५॥

एती मुलाकात करके, उठे श्री जी साहिब । आए अपने आसन, करी साथ से चर्चा तब ॥२६॥

कलू मिश्र के घरों, कथा में गए एक दिन । असनाई उहां कच्ची, उत चर्चा सुनी सैंयन ॥२७॥

महामति कहें ऐ साथ जी, ए ठट्ठे का मजकूर । सम्बत सत्रह सै चौबीसें, कहूं आगे और जहूर ॥२८॥

(प्रकरण २३, चौपाई १०२३)

इसी सन्दर्भ में देखें-