श्री बीतक - प्रकरण २४ | Beetak prakaran 24
चिन्तामनि ढूंढ़त फिरे, कहां है उन साध का ठौर । आया पूछत कथा में, मोहे ढूंढ़त भई भोर ॥१॥
तब मिसरें बताइया, नाथे जोसी का घर । तहां से खबर लैय के, आय पहुंचे अटारी पर ॥२॥
तहां साथ सब बैठें थे, बीच में बैठे श्री राज । चरचा के बखत मों लगा, चिन्तामन कदमों इन काज ॥३॥
साथ संगी सब अपनें, चरचा लगे सुनने । श्रवना दई भली भांत सों, निसबत अंकूर अपने ॥४॥
सुख पाया चरचा मिने, अपनी मूली गई भूल । चरचा देखी अधिक, असल अंकूर का मूल ॥५॥
इनके जो सेवक थे, खल भल पड़ी तिन में । फिरे चित जो तिनके, इन चरचा सुनने से ॥६॥
दिन दोए तीन लग, चरचा सुनी बनाए । तब सब लगे कदमों, हुई पहिचान हक जाए ॥७॥
खण्डनी भली भांत सों, देखत साथ सबन । तब चिन्तामन छाने कहया, सरम राखियो बीच मोमिन ॥८॥
एकान्त मोसों कहो, जानो तैसी खण्डनी । पर मेरे सेवकों में सरम, राखो जान अपनी ॥९॥
तब राजें इनसों कहया, तुम्हारी क्यों न राखें सरम । तुमको जो हम कहेंगे, दे परदा ओट मरम ॥१०॥
ए सब गये अपने घरों, राजें रात में कियें कीर्तन । सुनो रे सत के बनजारे, ए सुकन ग्रहो मोमिन ॥११॥
तिनमें सुकन खण्डनी के, तुम छोड़ी ग्यान गुमान । प्रात को आये जब पढ़िया, तब चिंतामन को भई पहिचान ॥१२॥
अब मारों काले कुत्ते को, लाठी सिर ऊपर । सेवकों आगे तब कहया, मैं खाली कछु न खबर ॥१३॥
तब श्रीजीयें सराहिया, स्याबास चिन्तामन । पाई ते निसबत, ए सुकन मोमिन ॥१४॥
कहया श्री तारतम इनको, सब सेवकों समेत । परहेज कराया चार बात का, ए कबूल कर दिल लेत ॥१५॥
एक हराम कहया मांस को, दूसरा हराम सराब । तीसरी औरत बिरानी तजे, सो पावे हैयाती आब ॥१६॥
चोरी झूठ बोलना, इनका छोड़ाया उदक । अब हम कबहूं ना करें, हम पाया बेसक हक ॥१७॥
इन समय में चरचा, बड़ी जो होवे तित । साथ की आमदानी, हुई बड़ी इन बखत ॥१८॥
चतुरा एक पोहोकरना, आवे श्री राज की सेवा में । ल्यावे दूध नित्यानें, सुनी चरचा कानों उने ॥१९॥
तहां ब्रज रास को बरनन, होत हतो नित्यान । वह देख अचंभा होवहीं, चरचा सुनते कान ॥२०॥
तहां उनकी सोहोबत लाल सों, नित्याने बखार में होए । तहां आये चतुरे कही, चरचा सुनके आया जोए ॥२१॥
कहां ब्रज अखंड क्योंकर, कहां रास अखंड । ए तो तुम कहत हो, न्यारा जो ब्रह्मांड ॥२२॥
तब लालें कहया, रास ब्रज न हमारी दृष्ट । चरम आंख क्यों देखिए, इन हाल सब सृष्ट ॥२३॥
तब चतुरे ने कही, क्यों आवे तुम्हारी नजर । तुम दिव्य दृष्ट कब पाओगे, क्यों कर होय फजर ॥२४॥
पांच तत्व तीन गुन को, जब हुयो ब्रह्मांड को नास । तब ब्रज और रास की, ठौर कहां रही खास ॥२५॥
तब लालदास चौंकिया, तें कहां सुनी ए बात । मोहे ठौर बताय देओ, ए कहां पाई सिफत जात ॥२६॥
तब चतुरे ने कहया, कोई साध आए इन ठौर । तहां चरचा होत है, ब्रज रास की जोर ॥२७॥
महामति कहें ए साथ जी, ए ठट्ठे की बीतक । ए मेहर सैयों पर करी, साहिब सुभानल हक ॥२८॥
(प्रकरण २४, चौपाई १०५१)
