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श्री बीतक - प्रकरण २५

श्री लालदास जी का श्री जी से मिलाप

ए ठट्ठे की बीतक, लालदास की मुलाकात । जिन भांत आए मिले, सो ए कहों फेर बात ॥१॥

तब लालदासें कहया, मोकों ले चलो तुम । मैं जाए मुलाकात करों, ए रहमत पावें हम ॥२॥

मैं उन्हें पूछ तुम्हें ले चलों, बिना उनके हुकम । मैं ले जाए ना सकों, तुमको उनके कदम ॥३॥

चतुरे आए अरज करी, लाल चाह करें दीदार । लछमन उनका नाम है, है तालिब धनी निरधार ॥४॥

हुकम हुआ श्री राज का, उनको बुलाओ सिताब । काहू काहू ने मने करी, फेर मेहर करी उनके बाब ॥५॥

आया बुलावन चतुरा, चला अपने संग लगाए । आये पहुंचे कदमों, भेंट करी बनाए ॥६॥

देखत ही दीदार को, बड़ो जो पायो सुख । मन की कुलफत सब मिटी, भाग गया सब दुख ॥७॥

भई चरचा सब ब्रज की, देखी सुनी सब कान । तब आय ईमान की, होय गई पहिचान ॥८॥

चार घड़ी चरचा सुनी, हुई खुसाली मन । फेर के लाल घरों आये, रहा कदमों दिल मोमिन ॥९॥

फेर के चरचा सुनने, आये बेर दो चार । बाग में जिन्दादास कही, धाम पैठे बिना विचार ॥१०॥

फेर चरचा मारकंड की, कह दिखाया दृष्टांत । तब नजर खुली बातन की, देखी दृष्ट एकांत ॥११॥

गीता और भागवत के, खोल दिये सब द्वार । आई वस्त अखण्ड, देखे धनी निरधार ॥१२॥

आया जोस वस्त का, रही न कछु सुध । लौकिक दृष्ट उतर गई, आई जागृत बुध ॥१३॥

और सुध कछु ना रही, वही आवे याद । दृष्ट फिरी उतथें, अपनी जो बुनियाद ॥१४॥

इन समें कलयुग ने, बड़ा जो किया सोर । लोग जो उन मुलक के, उनों किया जोर ॥१५॥

कछु ना चला काहू को, रहे सिर पटक । निन्दा करी बहुतक, थी इत मदद हक ॥१६॥

इन समें आइया, मोहनदास दलाल । राम दास वैद्य, ए भी हुआ खुसाल ॥१७॥

खटू मटू खत्री आये, और आया चतुर । और मंगल आइया, हुई खुसाली खूबतर ॥१८॥

और भगत सामल, कुंवरजी और गोवरधन । सुकदेव और जेठा, और द्वारका सैंयन ॥१९॥

रायचन्द्र बुला धीरा, और आये थिरदास । और साथी केतेक, ल्याये ईमान खास ॥२०॥

किसन बाई बसई, सेहेज बाई राम । वल्लभी चतुराई करें, चरचा में आराम ॥२१॥

और चिन्तामन के संग, आया केतेक साथ । तामें ईमान दाखिल वह भये, जाके धनियें पकड़े हाथ ॥२२॥

इत चरचा का मारका, बड़ा जो पड़िया आए । वल्लभी मार्ग के लोग, लड़नें को उठ धाए ॥२३॥

कलयुग डरा देख के, मेरे ए दुस्मन । मेरा कछु ना चले, ए मारत मेरा मन ॥२४॥

गुसांई के बालक रहे, होय निंदा तिन में । वस्त को समझे नहीं, फरियाद लगी तिन सें ॥२५॥

मास दस यहां रहे, हुआ चलने का दिन । मौसम भई मसकत की, विदा हुये साथ मोमिन ॥२६॥

अरज करी सब साथ नें, ए कारज करें हम । आप इत बिराजे रहो, ए कारज होवे हुकम ॥२७॥

तब कहया साथ को, उत है मेरा काम । क्या जानें किन कारने, मेरा जाना होत तिस ठाम ॥२८॥

बहुत विनती साथें करी, मानीं नाहीं कोय । तब आज्ञा पर धरी, कहा कारज कारण सोय ॥२९॥

फेर ठट्ठे से लाठी बन्दर, नाव ऊपर चढ़े । तहां से पहुंचे मसकत, सरत थी वायदे ॥३०॥

महामति कहे ए साथ जी, ए ठट्ठे की बीतक । अब कहों मसकत की, जो आज्ञा है हक ॥३१॥

(प्रकरण २५, चौपाई १०८२)

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