श्री बीतक - प्रकरण २६ | Beetak prakaran 26
आए पहुँचे मसकत में, उतर नाव से । कांठे दुकान महाव जी की, आए बैठे उन में ॥१॥
पूछी खबर उन नें, उठ के मिले धाए । कुसल खेम पूछन लगे, भले आप पहुँचे आए ॥२॥
इत बड़ो आदर कियो, लौकिक नाते से । आदर भाव करने लगा, खबर बन्द की पूछी इन समें ॥३॥
विस्वनाथ संग था, श्री बाई जी की दई खबर । रूपा राधा संग थी, धाए के पहुंची घर ॥४॥
ठौर पास दई रहने को, सब मिल हुये खुसाल । बातां लगे करनें, बीतक अपनें हाल ॥५॥
महावजीयें रसोई का, आदर किया इत । लगा आप सेवा करने, हाल भाल इन बखत ॥६॥
कानजी बेटा उनका, रहे दुकान पर । आरोग के फेर बैठे, साथ ठट्ठे की कही खबर ॥७॥
लगी होने चरचा, जो ठट्ठे की बीतक । उन समय जो सुख भया, मेहर सुभानल हक ॥८॥
तिनकी बातें करते, बड़ा जो हुआ सुख । कसाला जो बंद का, सो भाग गया सब दुख ॥९॥
इत रूपाबाई राधा, सुनी चरचा तिन । श्री राज की तरफों, रोसन हुआ मन ॥१०॥
चरचा मीठी होत है, कोई देवे कान । महावजी ने चरचा सुनी, होने लगी पहिचान ॥११॥
और लोग आवें सुनने, लगी बातें चलने । दीदार को लोग आवही, बातां लगे सुनने ॥१२॥
इहां दिन दस बीस में, भई जो चरचा जोर । दज्जालें इत सुनिया, लगा जो करने सोर ॥१३॥
दज्जाल अपनी सिपाह में, निन्दा लगा करने । ए कहाँ से आये है, मेरे मारनें का मन में ॥१४॥
मैं करों लड़ाई इनसों, ए क्या करें मुझको । बैठ बाजे दिल में, आये लड़ने को सामों ॥१५॥
इहां चरचा कीर्तन होत है, हांस विनोद विलास । साथ को धाम धनी बिना, और न कछुये आस ॥१६॥
इत दोय चार कीर्तन, नये किये बीतक । तूं दुनी को क्या पुकारे, देख तरफ हक ॥१७॥
रे हो दुनियां बांवरी, खोवत जनम गमार । दुनिया को तू कहा पुकारे, ए अपनो करे आहार ॥१८॥
तूं भूल ना महामत, संभार अपना आप । सब स्याने अपने काम में लगे, तोहे विरह धाम का ताप ॥१९॥
इन चरचा होते भया, भाई महाव जी का इत काम । चरचा मीठी लगी इनको, दाखिल हुआ निजधाम ॥२०॥
और भी केतेक साथी, आय पहुंचे इन ठौर । श्री राज की चरचा बिना, सूझत नाहीं और ॥२१॥
एक दिन चरचा मिने, भई खण्डनी महावजी पर । वाकिफ पूरा न था साथ में, अवगुन भासा दिल ऊपर ॥२२॥
मैं न जाऊं उन पे, चरचा सुनने को । मुझ पर करी खण्डनी, क्या देखा अवगुन मुझमों ॥२३॥
रिसाय के आप अपने, रह गया घर में । चरचा समें न आइया, हुआ दिलगीर राज सें ॥२४॥
जब सोया रात को, अपनी दुकान मों । रातें मारा तमाचा राज ने, हुई दहसत जोर इनको ॥२५॥
क्यों रीस करी इन को, क्यों न दिये तुम कान । तूं जा फेर उतहीं, कर देख पहिचान ॥२६॥
जागे पीछे रोइया, प्रात बैठा आय द्वार । जगाये श्री जीय को, करने लगा मनुहार ॥२७॥
रोय के कदमों लगा, अपनी कही बीतक । मुझे तमाचा मार के, मोंह फिराया हक ॥२८॥
मैं खण्डनी सुन के, होय गया बेजार । मैं तो कच्चा साथ में, ना पहिचाना परवरदिगार ॥२९॥
इहाँ से चरचा मिने, भया पकव प्रवीन । चरचा सुनते सुनते, बड़ा भया आकीन ॥३०॥
बेटा जोरू बाप महतारी, और कुुटुम्ब परिवार । सो सब लगे लड़नें, ले दज्जाल हथियार ॥३१॥
ओ तो लसकर दज्जाल का, करने लगा सोर । जोर लड़ाई उनों करी, जो था उनमें जोर ॥३२॥
एह ना डगा इन समें, थे श्री राज इनके साथ । जाको मदद हक की, धनीये पकड़े हाथ ॥३३॥
किने ना चला तिनसों, सिर भाना दज्जाल । इनको धाम धनीय का, बड़ा जो हुआ हाल ॥३४॥
इन समें साथ आइया, कहों जो तिन के नाम । पहिले सबसे आइया, विस्वनाथ इन काम ॥३५॥
राधा बाई रूपा, और भाटिया प्रधान । और आया खट्टू, पहिले राजो को पहिचान ॥३६॥
और हीर जी भाटिया, और महावजी इन समें । और नारायण कायथ, रामें सुनी उन सें ॥३७॥
और जीवा खम्भालिये का, संग जी आया इन ठाम । कान जी महावजी का, आए गंगा हीरा इसलाम ॥३८॥
और लखमन रंगानाथी, और मानजी जीवा वे । और रूप जी कामदार, और बेरसी सुनी ये ॥३९॥
एह आये इन समें, तामें चरचा बड़ी होए । सुख लिया इन साथ में, क्योंकर कहों मैं सोए ॥४०॥
उच्छव चरचा नित्याने, होत साथ मिने । हाथ पटके दज्जालें, ए मगन धाम मिने ॥४१॥
बन्दीवान के पैसे को, आए दरोगा करे पुकार । काफर गरजे सिर पर, क्यों होत न खबरदार ॥४२॥
सिर पर साहिब जो, वह है खबरदार । हमको फिकर न कछुये, और कादर भरतार ॥४३॥
बड़ो दृढ़ाव देख के, वह हो गया जेर । जिनकी ऐसी चरचा, फेर कहने आवे फेर ॥४४॥
इन मिस से इनके, करने आवे दीदार । चरचा सुने श्रवनों, कहे सुकर परवर दिगार ॥४५॥
इन भांत अट्ठाइसे साल में, रहे मसकत में । जात आप अपनी, सबों छुड़ाई आरबों सें ॥४६॥
यह बात भैरों सेठ सुनी, सबों छुड़ाई जात अपनी । रहे अबासी बन्दर, करों अपनी नेक नामी ॥४७॥
भेजे अपने आदमी, लेने को खबर । केते पैसे बंद के, है डांड इन ऊपर ॥४८॥
खबर लेके आदमी, दई उनें पहुंचाए । लहारी सत्तर हजार, इतनी देनी आए ॥४९॥
महामति कहे ए साथ जी, है बहुत मसकत बीतक । सो आगे मजकूर होएगा, कहों अबासी बन्दर बुजरक ॥५०॥
(प्रकरण २६, चौपाई ११३२)
