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श्री बीतक - प्रकरण २७

अबासी बन्दर की बीतक

अबासी बंदर में, भैरों रहे सिरदार । अपनी न्‍यात छुड़ावनें, हुआ खबरदार ॥१॥

भेजे अपने आदमी, मसकत बन्‍दर में । छुड़ाय ल्याया न्यात को, आया आबासी बन्दर अपने ॥२॥

भई मुलाकात भैरों से, श्री जी साहिब जी सों जब । अपने घरों ले गया, खिजमत करने लगा तब ॥३॥

खेम कुसल बातें पूछी, अपने देस परदेस । सब बात का उत्तर, बताए दिया खेस ॥४॥

भई पहिचान आपस में, हुआ रसोई का आदर । जागा अपने नजीक, उतारे अपने घर ॥५॥

उहां बिछौना बिछवाए के, तहां पधराये श्री राज । रसोई होत एक तरफ, लगे चरचा के काज ॥६॥

आए आगे बैठा भैरों सेठ, अपने कबीले समेत । ब्रज लीला की चर्चा, भैरों श्रवणा सों लेत ॥७॥

सुन चरचा सुख पाइया, भई दो पहर बैठक । काहू को खबर न काल की, ना रही सुख आड़े सक ॥८॥

रसोई की अरज भई, उठे श्री राज उन बखत । भैरों गया अपने घरों, बहुत खुसाल हुआ इत ॥९॥

श्री राज आरोग फेर बैठे, साथ सुख मिलाय । कोई कोई इत आय मिले, चरचा को ललचाये ॥१०॥

फेर होने लगी चरचा, बखत भयो लेल । फेर कीर्तन करने लगे, भये मगन ब्रज के खेल ॥११॥

इहां बहुत रात बीत गई, हुआ उठने का समें । भैरों सेठ गया अपने घरों, भये साथ मगन चरचा से ॥१२॥

फेर चरचा होत होत, होय गई फजर । उठे दातौन पानी को, भैरों खुली नजर ॥१३॥

कोई इत सोये रहे, कोई बैठे पासे श्री राज । कोई आवत दीदार को, रहया चरचा का काज ॥१४॥

तब आये भैरों ठक्कर, उन संग आये कै लोक । होने लगी चरचा, भागा सारा सोक ॥१५॥

दोय मुलतानी भैरों संग, आये उन बखत । थे जोगारंभ में मेहेरम, चेला नानक के तित ॥१६॥

पोथी साखी कबीर की, रहे उनके पास । अरथ न सूझे तिनका, तापर चरचा हुई खास ॥१७॥

कोई दिन चरचा से, वे दोऊ लगे कदम । जेता था अंकूर इनका, इनों सौंपी आतम ॥१८॥

तेजबाई इन समै, आई करन दीदार । ल्याई कबीला अपना, न रही सक कीर्तन विहार ॥१९॥

तिनको सुन गलतान भई, संग आई सखी जेती । कीर्तन उन्हें मीठे लगे, राज के चरन चित लेतीं ॥२०॥

फेर वे आवनें लगीं, छोड़ दिये सबों घर । बैठी रहें चरचा मिने, घर दिल न लगे क्योंए कर ॥२१॥

अब भैरों सों राजें कहया, तुम हमें बुलाये इत । उहां सेती छुड़ाय के, सेवा करी इन बखत ॥२२॥

अब हम तुम्हारे आगे, कौन सी राखें वस्त । जिनसे होवे बदला, हम ता का किया कस्त ॥२३॥

जो कछु हम पै वस्त है, सो आगे राखें सब तुम । सो ग्रहों तुम चित्त में, ज्यों फल पावे आतम ॥२४॥

तब भैरों ठक्कर ने, बचन आजिजी के कहे । तुम मेहर करी मुझ ऊपर, जो सुनावने के तुम भये ॥२५॥

तब श्री जी ने कहा, तुम इतना करो परहेज । होंए प्राप्त चरन भगवान के, घरों बैठे सेहेज ॥२६॥

एक महीना की मुद्दत, इत मुझ आगे करो तुम । ज्यों होवें चरन प्राप्त तुमको, कहे ते सुनावें हम ॥२७॥

तब अपना परहेज तोड़ियो, बिदा कीजो हमको । हम जावें अपने घरों, तुम रहियो मगन माया मों ॥२८॥

पीउना तमाखू छोड़ देओ, और मांस मछली सब । सराब और सब कैफ, परदारा चोरी न कब ॥२९॥

इत एती बात का परहेज, करो इन बखत । तो तुमको होय प्रापत, पाओ सुख तित ॥३०॥

एह सुकन सुन भैरों ने कहा, एह बात है सेहेल । ए अवस्य मोहे करना, ए छोड़ दई दज्जाल गैल ॥३१॥

इतनी मेहेनत से, जो जागे अपनी आतम । तो और क्या चाहियत है, हमको कह दिखाओ तुम ॥३२॥

उस बखत आगे हुक्का था, सो दिया तुरत फोर । उदक धरा चार वस्त का, देई श्रवना आतम जोर ॥३३॥

रसोई मिने मने भई, मांस मछली करो जिन कोए । हमारी रसोई जुदी करो, होय गया विरक्‍त सोए ॥३४॥

घर के लोग अन्दर, लगे बड़ बड़ करने । कौन आया हमारे घरों, क्यों परहेज कराया इने ॥३५॥

इनको पिण्ड तो इनपे, था इन पर गुजरान । ताको क्यों छुड़ावत, सुकन कहे बिन ईमान ॥३६॥

भैरों सेठे खीझकर कहा, लिया परहेज मैं कोई दिन । मैं परहेज फेर तोडूंगा, जो दाखिल न होऊं मोमिन ॥३७॥

यों दृढ़ाव करके, चरचा लगे सुनने । तीसरे दिन के सुनते, कहे वचन मुख अपने ॥३८॥

मैं जनम भर को छोड़िया, ए चारों वस्त निखेद । वस्त भई मोहे प्रापत, पाया माया माहें भेद ॥३९॥

एह आया यों साथ में, पड़ा सहर में सोर । तब दज्जाल लगा पुकारने, बड़ा जो किया जोर ॥४०॥

सखी बाई आई साथ में, तिन संग आया गोवरधन । लगे भणसारी निन्दा करनें, ए कहां से आये मोमिन ॥४१॥

हमारे घर के लोग, बरजे न रहवें कोय । राव भैरों ठक्कर से कही, हमारी लड़ाई तुमसे होय ॥४२॥

तब भैरों ठक्कर ने कहया, रखो अपनी लुगाइयां बरज । हम बुलावने न जात काहू को, सब आवत अपनी गरज ॥४३॥

इत हम इनको क्या करें, इत चरचा होत भगवान । कारज होत आतम को, आवत पूरी पहिचान ॥४४॥

तुम आड़े होत हो तिन के, न आप सुनो न देओ सुनने । ए सब करत है कलिजुग, सब भलो चाहें अपने ॥४५॥

ए सुकन सुनके, हुये सरमिंदे सब । खिसियाय के पीछे फिरे, अपने घरों आये तब ॥४६॥

लगे लुगाइयों से लड़ने, क्यों तुम जाओ तित । ऐसा न चाहिए तुम को, जो घर छोड़ो रात वखत ॥४७॥

तब जवाब दिया उनों ने, हमसे बुरा न हुआ कोई काम । चरचा सुनने भगवान की, जात हैं तिस ठाम ॥४८॥

एक तो इस देस में, कबहूं न चरचा होए । इत कौन आवत करने, आये भाग हमारे सोए ॥४९॥

ए तो पूर्व अंकूर तें, प्रापत भये चरन । तिन आड़े तुम होत हो, हमारे दुसमन ॥५०॥

हम आतम सौंप चुकीं, भगवान के कदम । देह तुम्हारे भाग की, सो छोड़ देत हैं हम ॥५१॥

क्या करोगे तुम हमको, यों बरजी न रहवे कोए । तब तेजबाई के घर गये, मिल लड़ने को सोए ॥५२॥

वह थी सहर में सिरदार, तिन आगे करी अरज । तुम जिन जाओ साध पे, हमारी एह गरज ॥५३॥

तब तेजबाई ए कहया, क्या मोहे बरजत तुम । मेरी अवस्था न देखत, दोष न कछुए हम ॥५४॥

तब उन सबों ने कहया, हम तुम्हें क्यों बरजे । पर तेरे पीछे सब लगी, जात हैं चरचा में ॥५५॥

तिस वास्ते हम तुमको, बरजत हैं इन काम । ना जाओ हमारी खातर, सुनने चरचा उस ठाम ॥५६॥

तब तेजबाई ने कहया, तुम अपने घर के बरजो जाए । मैं तो वहां जाऊंगी, तुमें करने होए सो करो आए ॥५७॥

साथ नाम केते कहों, अबासी बन्दर के । एक तो भैरों ठक्कर, और देवचन्द भाई जे ॥५८॥

और भाई अमरिया, और भाई अमोलक । मेर बाई बाई इन्द्रावती, राधाबाई बुजरक ॥५९॥

सुताई और फूलबाई, और बाई रतन । लच्छो बाई और सखी, ए आई तले जतन ॥६०॥

तेजबाई और बाई किसनी, और जसोदा बाई । पहिले ए आई साथ में, खुसखबरी इनों पाई ॥६१॥

और साथ बहुत हैं, सो केते लेऊं नाम । आगे जाहिर होयेंगे, जो दाखिल निजधाम ॥६२॥

यों चरचा होने लगी, एक दूजे के संग। साथ को आनन्द भयो, अंग न माए उमंग ॥६३॥

चरचा चितवनी उच्छव, होने लगा जोर । चित राज को साथ तरफ, बढ़ते चला और ॥६४॥

नयो साथ आवत है, सो करत है हेत । रमण ब्रज रास को, सो बानी भली भाँत लेत ॥६५॥

भैरों ठक्कर आदर, भला जो किया साथ । श्री जी से दिल बांधिया, धनिये पकड़े हाथ ॥६६॥

जब इत मास दोय तीन भये, रजा मांगी जब । हम जायें उन देस में, उन रोय बातें करी तब ॥६७॥

हमको क्यों इत छोड़ोगे, कर असनायी धाम । हमारी सुरत बंधी एक तुम सों, रहया न कोई काम ॥६८॥

श्री जीयें विचारिया, जो कदी बरस रहवें एक । तो साथ आवे सनेह सों, एक से होए अनेक ॥६९॥

बात बड़ी है करनी, आवे सकुण्डल सकुमार । विस्तार होय ब्रह्मांड में, जाको वार न पार ॥७०॥

हम एकै बन्दर अटकें, क्या राज करना इत । एतो हमें ना छोड़त, आज इन बखत ॥७१॥

यह विचार नित करें, देखा तरफ श्री राज । साथ चित बांध चला, धाम के सुख काज ॥७२॥

यह तो कारज कारन, आज साथ काढ़ना ठौर ठौर । तिस वास्ते ऐसा चाहिए, तब आई बातिन और ॥७३॥

हुकम हुआ तागीर का, वहाँ नये की आमदान । तब रात को लगे भागने, जहाँ तहाँ निदान ॥७४॥

संकोच भयो भैरों को, रखने लड़के अपने । इनको कहां छिपाऊंगा, बात आवे न दिल मिने ॥७५॥

तब रजा दई राज को, नाव को बैठ गये बसरे के । तापर चढ़ाये साथ को, उत आये पहुंचे ए ॥७६॥

वस्तर भूषण पैसे, भली भांत दिये साथ । जैसी उनकी सकत, तैसी भली चालाकी करी हाथ ॥७७॥

जैसा जिनका अंकूर, लाभ लिया तिन माफक । ताको तैसी सोभा भई, जो अग्या थी हक ॥७८॥

महामति कहे ऐ मोमिनों, ए अबासी बन्दर की बीतक । अब फेर कहों ठट्ठे की, जो बीतक हुकम हक ॥७९॥

(प्रकरण २७, चौपाई १२११)

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