श्री बीतक - प्रकरण २८
आवासी बन्दर से श्री जी का ठट्ठानगर पहुंचना
अबासी बन्दर से, आये कोग बन्दर । तहाँ से फेर नाव चढ़े, पहुंचे लाठी बन्दर ॥१॥
तहां चार दिन रह के, आये नगर ठट्ठे । नाथे जोसी ने सुनी, दौड़ा लेने को आगे ॥२॥
साथ सब दौड़े सामें, मारग में किया मिलाप । साथ सबें सुख पाइया, मिट गई दुनियां ताप ॥३॥
ठाकुरी बाई जिन्दादास, आये डेरा किया तित । और साथ सब आए मिले, आये डेरा किया मिलाप इत ॥४॥
ठाकुरी बाई इन समें, भये साथ रसोई के काम । साक तरकारी बाजार से, सब साज ल्याई इस ठाम ॥५॥
श्री जी और बाई जी, और साथ सब ततपर । बैठे इत आरोगने, ठाकुरी बाई के घर ॥६॥
इत उछरंग साथ में, हुआ बड़ा ठौर ठौर । सब सामा लै लै दौड़हीं, अपनें घरों से और और ॥७॥
आबासी बन्दर की, कही सब बीतक । इन भांत साथ आये के, सुकर बजाया हक ॥८॥
मन बढ़े सब साथ के, सुनते यह बीतक । राह जानी निजधाम की, देखी सबों पर बुजरक ॥९॥
इत दीदार को आवत, ठठे के सब लोक । देख साथ सब तिन को, भागत सारा सोक ॥१०॥
सम्बत सत्रह सै अठावीसे, मास बैसाख का होय । पधारे ठठे मिने, तब साथ रजा न देवे कोय ॥११॥
ठठे के साथ के संग थें, आया मटहरी का साथ । जिन चरचा सुनी धाम की, जाके हकें पकड़े हाथ ॥१२॥
ताके नाम लेत हों, सुनियो सब सैयन । हकें इनों के दिल को, किये अपनी तरफ रोसन ॥१३॥
भगतीदास साहजू, और अड़न मकरन्द । पारन मोटन तुलसी, और आया गोवरधन ॥१४॥
जेठमल और बालचन्द, दयाल और धर्मदास । सुखनन्द स्यामल श्री नन्द, सेवा दास मीठा खास ॥१५॥
टोडरमल और नन्दलाल, और दूसरा मोटन । लाड़क गौरी गरीबदास, बाई ज्ञान और खेलन ॥१६॥
स्यामबाई सुहागबाई, और बाई कल्यान । समगी और मेघबाई, भई सहजमल को पहिचान ॥१७॥
थारीबाई और पारबीबाई, और बाई कही परी । अजबाई आई तिन पर, पाई धनी की खुसखबरी ॥१८॥
और भाई धर्म दास, और कहया बन्धन । पृथ्वीमल और जयमल, माधो दासे सौंप्या मन ॥१९॥
और आया जेठमल, बालचन्द गोकल दास । बंसीदास और गिरधर, बूलचन्द रायचन्द हक आस ॥२०॥
और तीसरा मूलचन्द, हरपाल हीरा उन नाम । बाल भोग और सूर जी, खेमदास आया बीच निजधाम ॥२१॥
और राजन थारा कमाल, सुमारचन्द हरवंस जेह । कृस्नदास जेठियानन्द, मूलबाई रामबाई एह ॥२२॥
मखाबाई उमर बाई, मलूक बाई जीवनी । स्याम बाई सहुद्रा बाई, रुईचन्द हरबाई जान्या धनी ॥२३॥
लखमीबाई समईबाई, ए आई बीच निजधाम । पर पूठे कानों सुनी, ल्याये ईमान इस ठाम ॥२४॥
एह साथ मटोद में, इत भई राज की चरचा जोर । एह देख के दज्जाल नें, इत किया जो बड़ा सोर ॥२५॥
साथ सब कोई को, पहुंचा कसाला इत । यह समया कठिन है, आया बखत रोज क्यामत ॥२६॥
अब फेर कहों बात ठठे की, भेजी खबर पुरी नवतन । हम आये बन्दर अबासी से, सब खबर लिखी रोसन ॥२७॥
ज्यों साथ आया मसकत में, और अबासी बन्दर । सो हकीकत पाती में लिखी, श्री बिहारी जी ऊपर ॥२८॥
और भी सहर पुरन के, साथी सबकी लिखी खबर । स्यामलदास था साथ में, तिन पैगाम दिया सब पर ॥२९॥
और साथ सब दीप का, सब लिखी नवतन पुरी । हकीकत पाती लिखी, बिहारी जी को खुसखबरी ॥३०॥
हम आवत हैं कच्छ में, तहां तुमसों होय मिलाप । वहां से इत आवन का, इलाज कीजो आप ॥३१॥
ए पाती भेज के कहया, हमको रजा देओ तुम साथ । हम जायेंगे कच्छ में, होय बिहारी जी सों मिलाप ॥३२॥
साथ रजा न देवहीं, भई रद बदल कोईक दिन । मास एक तहां रह के, फेर बिदा दई सैयन ॥३३॥
इन समें लछमन पुर में, जाय साथ काढ़या एह । तहां जो चरचा भई, लिखी खबर पाती में तेह ॥३४॥
महामति कहें ए साथ जी, ए बीतक ठट्ठे की जान । अब याद करो नलिये को, आगे कहों पहिचान ॥३५॥
(प्रकरण २८, चौपाई १२४६)
