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श्री बीतक - प्रकरण २९

श्री जी साहिब जी चले ठट्ठे से, नलिये आये पहुंचे । धारे ने यह बात सुनी हती, आय पहुंचा धाय के ॥१॥

नलिये में आये मिल्या, किस्सा कहया अपना । मैं खंभालिया रहता था, हुआ साथ मिने रहना ॥२॥

आया सूर जी मसकत से, खंभालिये में जब । साथ का मण्डान चरचा का, बड़ा जो हुआ तब ॥३॥

नया साथ केतेक आया, आया मेरा कबीला सब । तहां श्री राज के दीदार से, वृद्ध लीला भई तब ॥४॥

मोकों आवे तहां आवेस, दिन में होवे दीदार । मैं श्री राज की बातें सब कहों, श्री धाम लीला विस्तार ॥५॥

तब साथ सब मिलके, लगे पूजने मोको । गादी बिछाय बैठाया, मोकों सेवे साथ मों ॥६॥

जहां कृपा होवे श्री राज की, तहां साथ सब पूजे । तहां सक न रहवे काहू को, मिल सेवे चित दे ॥७॥

ए बात सुनी बिहारी जी, अकरास लगी मन । ए कैसी राह चली, भई माया सामिल सबन ॥८॥

ए पन्‍थ गोलों का, हुआ सबमें नाम । कोई न लेवें श्री देवचन्द्रजी, मारग नाम निजधाम ॥९॥

तब बुलाया नाग जी को, कहया बिहारी जी इत । पाती लिखी सूरजी पर, सिताब पहुंचो इन बखत ॥१०॥

वह पाती सुन के दौड़िया, पहुंचा सूरजी नये नगर । मुलाकात करी बिहारी जी सों, डरया धारे की खातर ॥११॥

पूछी खबर साथ की, सब बताई इन । मेहर भई साथ ऊपर, कही खुसाली मोमिन ॥१२॥

तब बिहारी जी खण्डनी करी, तुमको माया लगी जोर । तुम्हारे घर मिने, किया कलिजुगें सोर ॥१३॥

धारे को तुम काढ़ देओ, रहे ना साथ मिने । ना राखो इनका कबीला, जो रहे साथ मिने ॥१४॥

तो हमारे तुम्हारे, नाता न रहे श्री धाम । नातो तुम्हें निकालें साथ से, जो हम सुन्या तुम्हें ए काम ॥१५॥

ए बात सूरजी सुनके, हुआ धारे से बेजार । हम काहे को इन्हें रखें, हम दाखिल बारे हजार ॥१६॥

मेरे नाता श्री धाम का, क्यों कर तोड़त तुम । हम कबीला न रखें धारे का, ना छोड़े तुम्हारे कदम ॥१७॥

ए रद बदल करके, फेर आया सूरजी खंभालिये । धारा कबीले समेत इलाज, किया निकालने के ॥१८॥

सब साथ को कहके, मोकों रजा दई तब । बेनी बाई जो थी साथ में, अरज करी साथ आगे सब ॥१९॥

क्या हमारा गुनाह है, कौन बुरा किया हम काम । जो हमको साथ से निकालत, देस ठौर ए गाम ॥२०॥

हुकम नही बिहारी जी का, इत क्या चले साथ हुकम । अरज करो उत जाए के, हजूर जाओ बिहारी जी तुम ॥२१॥

तब मैं कबीला लेय के, गया नवतन पुरी । आजिजी करी बहुतक, सो चित में कछु ना धरी ॥२२॥

रोए धोए पीछा फिरा, आज मोहे बरस भया एक । विनती मैं बहुतक करी, कै किये उपाए अनेक ॥२३॥

तब इलाज मैं देखिया, है ठौर एक श्री मेहेराज । मैं उत जाऊं कदमों, मेहर होवे श्री राज ॥२४॥

सुन तुम्हारी आमदानी, मोहे आनन्द भयो मन । मैं दौड़ा इत धाए के, आए कदमों लगा मोमिन ॥२५॥

अब ज्यों जानों त्यों करो, मैं तो आए ग्रहे कदम । अब मैं तो कहूं ना जाऊंगा, रहों हक के तले हुकम ॥२६॥

ए बात धारे की सुन के, श्री जीयें दिया उत्तर । खातर जमा रख तूं, कछु दिल में न कर फिकर ॥२७॥

बिहारी जी इत आवत, जाए खबर देऊं मैं । मेहरबान होवें मुझ पर, ए काम किये सें ॥२८॥

पहिले बिहारी जी को कागद, ताको दियो जवाब । हम तो कहूं न आवहीं, तुम जाए के कहो सिताब ॥२९॥

तब फेर विस्वनाथ को, पठाया नये नगर । हम चले आवत हैं, तुम रह न सको क्यों ए कर ॥३०॥

तब बिहारी जी चले, बैठ नाव ऊपर । मंडई में जब उतरे, धारा दौड़ा ले खबर ॥३१॥

दई बधाई आए के, आये श्री बिहारी जी इत । श्री जी सुन खुसाल भये, लगे बख्सीस देने तित ॥३२॥

तब धारे ने कहया, मैं एही पाऊं बख्सीस । कदमों बिहारीजीए के, जाए नमाऊं सीस ॥३३॥

मोकों लेओ साथ में, दाखिल करो इसलाम । मेरे दिल एही रहे, तुम पूरो मनोरथ काम ॥३४॥

इन समें साथ सूरत से, आये थे आठ जने । ते श्री जी के दीदार को, ले चले कबीले अपने ॥३५॥

एक आकिल भगवान था, और नागजी नाहना । बल्‍लभ और धन जी, ले चले कबीले अपना ॥३६॥

सुन्दरबाई साथ में, और बाई रतन। और बाई मटा लालो, ए आई भले जतन ॥३७॥

और बिहारी जी के साथ, संग जी और अखई । हरबंस और लाला, ए सोहबत इकट्ठी कही ॥३८॥

और श्री जी की सोहबत में, एक बाई कही तेज । रूपा और राधाबाई, उनों को सेवा में हेज ॥३९॥

आये ठठे से संग राज के, नाथा और खेमा । ए आये थे पहुंचावने, रहे साथ में जमा ॥४०॥

सूरजी और हरजी, थिरदास और जीवराज । अजबाई बहन धारे की, ए आये बिनती के काज ॥४१॥

और आया हरवंस, और आया नरहर । संग स्त्री अपनी, आये दीदार के खातर ॥४२॥

आये मिले नलिये सहर में, मिल के हुये खुसाल । बिहारी जी का आगा लिया, दौड़े दीदार को ले हाल ॥४३॥

एक ठौर मांग लई, नलिये के कामदार पास । थी उनसे न्यात की हुज्जत, तिन सगाई जानी खास ॥४४॥

उन हवेली में उतरे, साथ सबे एक ठौर । बिहारी जी की खिजमत, सब करने लगे जोर ॥४५॥

अपनी जो बीतक, श्री जी साहिब जी लगे कहने । बिहारी जी सारी सुनी, हंसने लगे मिनों मिने ॥४६॥

सब साथ एक ठौर हैं, सुन चरचा पाया सुख । सब सोक दिल के गए, जो देखे माया दुख ॥४७॥

उच्छव रसोई होने लगी, हुआ अंग उछरंग । सब साथ है एकठो, अंग न माय उमंग ॥४८॥

श्री जी साहिब जी की चरचा, होने लगी जोर । भाव दिखाए बचन कहें, चित माया से देवें मरोर ॥४९॥

रूपा राधा बाई जी, एकान्त बैठाये तिन को । सिखापन देने लगे, करो सेवा इन बखत मों ॥५०॥

श्री धाम का धनी जानियो, बिहारी जी को राज । इनकी आज्ञा में रहो, तो तुम मेरे किये सब काज ॥५१॥

जो इनकी आज्ञा भंग करो, तो मेरा तुमसे नही काम । तो तुम से मैं जुदा होऊंगा, तुम मेरा न लीजो नाम ॥५२॥

इन भांत इनको, दई सिखापन जोर । अब मैं कह छूटत हों, तुम मेरी न काढ़ियो खोर ॥५३॥

इन भांत सब साथ को, सिखापन लगे देने । सगाई श्री धाम वतन की, दई कर अपनायत अपने ॥५४॥

एक ठौर एकान्त में, करने लगे मसलहत । बिहारी जी और श्री जी, क्या करना आई साइत ॥५५॥

पहिनाये साथ सब को, काहू बस्तर काहू भूखन । काहू बासन काहू कछु, यों सेवें मोमिन ॥५६॥

और सामा सब लेयके, धरी बिहारी जी के आगे । नगद बस्तर भूखण, पहिन पोतिया जुदे हुए ॥५७॥

श्री बाई जी के भूखण, और बस्तर सिनगार । सो सब आगे रखा, जान के धनी निरधार ॥५८॥

आए आगे अरज करी, धारा साथ में दाखिल होए । इनका हों मैं रिनियां, तुम्हारी दई बधाई सोए ॥५९॥

मैं इनसे बचन हारिया, मोकों दई बधाई जब तुम । जीव निछावर इन पर करों, तो आवे न पटन्तर हम ॥६०॥

तिस वास्ते इनको, लेओ साथ में तुम । इतनी अरज करत हैं, इन तुम्हारे चरनों सौंपी आतम ॥६१॥

तब बिहारी जी ने कहया, ए अरज न सुने हम । यह अरज कबहूं ना करियों, जिन फेरो मेरा हुकम ॥६२॥

बहुत खीझ के कहया, इनें करों न दाखिल साथ । इनका दुख मोहे बहुत है, याके कबहुं न पकड़ो हाथ ॥६३॥

तब श्री जी साहिब जी नें, दिन दोय-चार बीच डार । फेर अरज विनती करी, तुम इनका करो विचार ॥६४॥

क्या गुनाह है इनका, और जो बाइयाँ दोए । काढ़ी इन्हें कौन गुनाह से, साथ से बाहिर सोय ॥६५॥

कदी गुनाह किया धारे नें, बदले और के क्यों निकालो इसलाम । ए तो जुलम होत है, सब दुख पावत इस ठाम ॥६६॥

तब बिहारी जी ने कहया, मैं तुम्हें बरजे तब । तुम फेर उनकी अरज, करत हो मिल सब ॥६७॥

मैं तो कबहूं न मान हों, वास्ते उन के । जो लाख बेर मोसों कहो, तो मेरा जवाब एक ये ॥६८॥

तब श्री जी साहिब जी सों, सब साथ लगे कहने । तबियत तो तुम जानत, क्यों न डरो वास्ते अपने ॥६९॥

और रूपा बाई का, ना लगे चित सेवा में । वहां से श्रीजीय के, सक बढ़ चली तिन से ॥७०॥

महामति कहे ऐ साथ जी, ए नलिया में मजकूर । और भी अजूं बहुत है, सो आगे कहों जहूर ॥७१॥

(प्रकरण २९, चौपाई १३१७)

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