श्री बीतक - प्रकरण ३
बीतक कच्छ देश की
अब कहो कच्छ देस की, पहुंचे आप आये जित । तहां आये खोज करी, सो बताऊं इत ॥१॥
लगे खोज करने, बैठे देहुरे जाय । चरचा को उत पूछत, वे प्रतिमा को ठहराय ॥२॥
तहां मन माने नहीं, राह न आवे नजर । कोइक दिन रहे तिन में, फेर उठे खोज ऊपर ॥३॥
आये खोजे सन्यासी, बड़े डिंभ धारी । आम पूजे तिन को, आवे खलक सारी ॥४॥
तहां जाय के खोजिया, कहें जानत हैं सब हम । देवें नाम सुमरन, नेहेचे कर ग्रहो तुम ॥५॥
और चरचा करें दत्त की, लिया नाम सुमरन । दिल में कछु न आवहीं, क्यों ए न पतीजे मन ॥६॥
कोइक दिन तहाँ रहे, फेर चले जागा और । बड़े डिंभ कन फटे, चले गये तिन ठौर ॥७॥
वे राज गुरू कहावते, बहुत चेले तिन को । कच्छ देस ताय मानहीं, जाय पहुंचे इन मों ॥८॥
कोइक दिन तहां रहे, साख न होय अन्दर । पूछी चरचा तिनकी, कछु न पड़े खबर ॥९॥
फेर वैरागी कापड़ी में, रहे कोइक दिन । वस्त न देखी तिन में, परे इन्द्री बस मन ॥१०॥
इन भाँत मेहेजद में, मुल्ला की करी सोहबत । तहाँ कछु न पावहीं, कोइक दिन रहे तित ॥११॥
और ब्राह्मण भेष कई, और भेष सब ठौर । खोजत ही फिरत रहे, मेहनत करी जोर ॥१२॥
फिर भोजनगर आए, तिन सहर में । तहां हरदास जी रहे, भई सोहबत तिन से ॥१३॥
वे थे राधा वल्लभी, सेवत कारज आतम । सेवा बंके बिहारी की, करे सखी भाव धरम ॥१४॥
रहे तिनकी सोहबत में, देखी सेवा अत प्रेम । साँचा देखा तिन को, सेवत हैं अत नेम ॥१५॥
जब रूत आवे गरमी की, तब सेवा तिन माफक । ठंडक करें हर भांत सों, आगा समे रूत ताकत ॥१६॥
जाड़े की रूत मिने, गरमी का करें इलाज । अब ए वस्त करों, चाहिएगी मुझे आज ॥१७॥
अस्नान करें दिन में, दोय चार वखत । जब रूत पलटे में चाहिए, गरमी सीत होय इत ॥१८॥
तब इनको अस्नान का, फेर फेर वखत होय । ए सांचवटी देख के, ऐसी करे न कोय ॥१९॥
इन ठिकाने आये के, आतम पायो करार । ए सांचवटी देख के, करने लगे विचार ॥२०॥
इनकी मैं सेवा करों, वस्त ग्रहों इनसों । तब लगे सेवा करने, रहें इनकी सोहबत मों ॥२१॥
नित्याने चरचा सुने, जाय बैठे सोहबत । जब ए मतू मेहते सुनी, धाय के आए तित ॥२२॥
नसीहत जो कहने हती, सो कह कह थके सब । ए क्योंए माने नही, बेजार हुए तब ॥२३॥
श्री देवचन्द्र जी माया के, क्योंए नजीक न जाये । इनको वह गमे नहीं, बड़ो दुःख पहुंचाय ॥२४॥
हरदास की सेवा करें, मनसा वाचा करम । कछू सक न ल्यावहीं, रहें आतम के धरम ॥२५॥
देख सांचे हरदास जी इनको, मन में देऊं नाम सुमरन । ऐसो विचार करके, एक दिल में लिया दिन ॥२६॥
मतू मेहता विचार करें, क्योंए डारों माया में । तो ए हाथ आवे मेरे, छूटे वैराग इनसे ॥२७॥
एक ठौर सगाई करके, ब्याह को धरायो दिन । वही दिन था उत्तम, लेने को नाम सुमरन ॥२८॥
मारग राधावल्लभी में, लेने नाम सुमरन । भद्र भेष होत है, श्री देवचन्द्रजी विचार किया मन ॥२९॥
हरदास जी ने पूछिया, तुमको नाम सुमरन देवें आज । भद्र भेष हो आओ, तो होय तुम्हारा काज ॥३०॥
तब ही भद्र भेष होय के, आय के बैठे पास पूछा नाम । सुमरन काहू का लिया है, कहया सन्यासी का कर विस्वास ॥३१॥
कहा सोई नाम सुमरन, चिट्ठी में लिख कर । रोटी में चिट्ठी वायके, देवो सन्यासी को यों कर ॥३२॥
तब श्री देवचन्द्रजी ने कहया, इनसे कछु न होय । जो नाम ओ जोरावर, तो क्योंकर निकसे सोय ॥३३॥
जो तुम्हारा नाम जोरावर, ओ आपही होवे दूर । ए तो अर्थ ऊपर का, ए आम का मजकूर ॥३४॥
सुन ऐसी बात हरदास जी, बड़ो जो पायो सुख । दियो नाम सुमरन, देखो सरूप सनमुख ॥३५॥
भजमन श्री वृन्दावन, कुञ्जबिहारी नित बिलास । एह राखो तुम दिल में, सुमरो कर विस्वास ॥३६॥
सखी भाव होय भजिओ, उपदेस करके एह । विदा दई तिन घर को, देखा मतू मेहते तेह ॥३७॥
भद्र भेष देख के, करने लगे सोर । ए कैसो काम कियो, चाहिए सिनगार इस ठौर ॥३८॥
रोय पीट दुख पाय के, खीज डराय कहे सुकन । श्री देवचन्द्र जी उत्तर दियो, तुम क्या चाहत हो दिन ॥३९॥
मैं ब्याह करने था जिनसों, किया है तिन सों । मैं तो तुमको बरजिया, मेरे काम नहीं इनमों ॥४०॥
ऐसे में ब्याह हुआ, खटपट नित होइ । श्री देवचन्द्र जी हरदास जी की, सेवा करत है सोइ ॥४१॥
रहे सोहबत हरदास जी की, दोय पहर रात लगे । चरचा और कीर्तन में, गुजरान करते ए ॥४२॥
रहें एक पहर घर अपने, पीछली रात रहे जब पोहोर । तब हरदास जी के मंदिर प्रदक्षिणा, देवे मेहनत जोर ॥४३॥
एक दिवस हरदास जी, उठे थे देह कारज । ऊपर झरोखे थें देखिया, कहया कौन फिरत कौन गरज ॥४४॥
रात पिछली पहर एक है, घर के पीछे फिरत । ए कौन सख्स आयो कहा, ए देख के तित ॥४५॥
तब हरदास जी टोकिया, कौन सख्स हो तुम । तब श्री देवचन्द्र जी उत्तर दिया, कहया इत आये हैं हम ॥४६॥
स्वर पहिचाना हरदास जी, आए श्री देवचन्द्र जी तुम कित । खोल द्वार घर में लिए, तुम क्यों आए इस वखत ॥४७॥
जवाब श्री देवचन्द्र जी दिया, सुनिए आप वचन । रात खबर मोहे न रही, मैं जान्या उग्या दिन ॥४८॥
सेवा करे न जनावहीं, अपनी आतम के कारन । दिखावें नहीं काहू को, समझावें अपना मन ॥४९॥
हरदास जी सुन के, कही है माफक परवान । ए नित प्रदक्षिणा देवहीं, और दिन की सेवा करे जान ॥५०॥
एक दिवस हरदास जी, थे सेवा में हुसियार । आगे श्री देवचन्द्र जी, बैठे थे खबरदार ॥५१॥
तब एक सख्स को, मारा बिच्छू ने जोर । तिनके आकार में चेतन, कछु न रहया इस ठौर ॥५२॥
चार जने पकड़ के, आये खड़ा किया सामे द्वार । और सख्स जो संग के, सो करने लगे पुकार ॥५३॥
आए बाहिर देखिया, हरदास जी इन समे । हाथ मूंछो पर फेरते, हुआ चैन तिन समे ॥५४॥
फेर के दूसरी बेर हाथ, मूंछों पर फेरा जो और । तब आकार चेतन होए के, खड़ा रहया इस ठौर ॥५५॥
तीसरी बेर फेरते, जोर न लगे जब । तब जहर कछु ना रहया, दण्डवत किया तब ॥५६॥
सबों ने सलाम कर, अस्तुत करी बनाइ । जीव दान तुमने दिया, तुम्हारी बड़ाई कही न जाइ ॥५७॥
तब हरदास जी ने कहया, श्री देवचन्द्र जी सो वचन । श्री देवचन्द्र जी बड़ो मंत्र है, ए रखों तुम्हारे तन ॥५८॥
जो एक घड़ी फुरसत, न होती मंत्र कहने में । तो प्राण न रहते इन के, होत ऐसो उपकार इन से ॥५९॥
तब श्री देवचन्द्र जी ने कहया, हरदास जी सुनो तुम । हम को मंत्र जो तुम दियो, सो हृदय राखें हम ॥६०॥
सो ए मंत्र कैसा है, जो लाख बिच्छु का दुख । सो जनम और मरण का, छुड़ाय के देवे सुख ॥६१॥
सो मंत्र जिन उर में रहे, तहां ए कैसे समाय । तब हरदास जी रीझ के, सिफत करी बनाय ॥६२॥
हे श्री देवचन्द्र जी ए बुध, हममें नहीं लगार । जो तुम कहत हो, सो हम में नहीं विचार ॥६३॥
इन भांत कै बीतकें, भई माहें भोजनगर । श्री देवचन्द्र जी सेवा करें, पड़े न काहू खबर ॥६४॥
एक दिन फिरते घर को, देखे झरोखे पर । देखा श्री देवचन्द्र जी को फिरते, बुलाय लिए ऊपर ॥६५॥
मैं जान्या तुम एक दिन, भूल के रात को आये । ए तो नित फिरत हो, मैं ए मेहनत सही न जाये ॥६६॥
तुम मोसों कहा कहत हो, क्या मांगत हो मुझ से । मोसों तुम कह देवो, वह मैं देऊं तुमें ॥६७॥
तब हरदास जी ने कहया, मैं तुम्हें देऊं बालमुकुन्द । तिनकी सेवा तुम करो, ज्यों पावो आनन्द ॥६८॥
तब श्री देवचन्द्र जी ने कहया, जो आज्ञा तुम्हारी होय । सोई हमें करनी, करें सेवा जो सोय ॥६९॥
महामति कहे ऐ साथ जी, यह बीतक भोजनगर । आगे इनके और कहों, बीतक पहिचान पर ॥७०॥
(प्रकरण ३, चौपाई १९२)
