श्री बीतक - प्रकरण ३० | Beetak prakaran 30
देख नूर चरचा रोसनी, भई बिहारी जी को दिल सक । ए तहकीक मसनंद मेरी लेयगा, ए बात बड़ी बुजरक ॥१॥
फेर के बैठे मसलहत करने, जाएगा एकान्त एक ठौर । अब क्या करना हमको, चलो ढूंढ़ काढ़िये साथ और ॥२॥
तब श्री बिहारी जी यें कहया, ए राह नहीं इसलाम । जो आपन माया को छोड़ के, कीजे विरक्त का काम ॥३॥
जो इत हलार देस में, रह ना सको तुम । तो करो चाकरी कच्छ में, ए सुकन मानो हुकम ॥४॥
तब श्री जीयें कहया, मोकों श्री देवचन्द्र जी दई निध । तिन से मेरे दिल में आई, वतन की जागृत बुध ॥५॥
तिनसे ऐसे राजाओं को, जब देवें प्रमोध हम । सो सेवा तुम्हारी करें, चलें तुम्हारे हुकम ॥६॥
अब तो हम माया को, क्यों ए पकड़ें नाहें । रद किये चौदह तबक, हम क्यों काम करे सो जायें ॥७॥
सकुण्डल-सकुमार की, थी श्री देवचन्द्र जी नजर । वे आवें जब साथ में, लैल मिट होवे फजर ॥८॥
ताके वास्ते आपन, मिल निकसें बाहिर । श्री देवचन्द्र जी को प्रकास, करे सब में जाहिर ॥९॥
यह जो इष्ट फिरके चले, किया मूल बिना विस्तार । अपनी अखण्ड वस्त श्री धाम की, खड़े सिर पर धनी निरधार ॥१०॥
सो विस्तार क्यों न करें, जाको मूल है हक । चाहिए लीला परवरदिगार, होय ब्रह्माण्डों पर बुजरक ॥११॥
और तुम दिल में कछुए, संकोच न राखो लगार । हम तुम्हें बैठावें अटारी पर, तले हम रहे खबरदार ॥१२॥
चरचा सबसे हम करें, सबको देवें जवाब । जब श्री धाम के जोग होय, सो इत आवे लेने सवाब ॥१३॥
ताको पठाऊं तुम पे, आवे करन दीदार । तुमको यों कर सेवहीं, जान के धनी निरधार ॥१४॥
तब बिहारीजीयें कहया, मेरा निकलना क्यों होय । मेरे संग रंगबाई कही, है बड़ी बोझल सोय ॥१५॥
तिनकी महतारी तिन संग, और कुटुम्ब परिवार । सो तो निकल ना सके, मेरा क्यों चलना होय तुम लार ॥१६॥
तिस वास्ते मेरा चलना, होय नहीं क्योंए कर । धनी को जो है करना, सो आय जुड़े त्यों ही कर ॥१७॥
इन भांत की रदबदल, होत रहे निसदिन । मास डेढ़ लगे इहाँ रहे, करे परियान मिल सैंयन ॥१८॥
और कोई साथी साथ में, किए थे उनों दूर । अरज होत रही तिनकी, सो न मान्या मजकूर ॥१९॥
रूपा बाई ऊपर, भई बिहारी जी को सक । ए सेवा में न आवहीं, दिल में पैठी अनख ॥२०॥
श्री जी के दिल में, ऐसी उपजी आए । इत आवेस रहे राज को, मेरा दिल क्योंये न समझाए ॥२१॥
इत से दोऊ के दिल में, होय चली अन्तराए । पर बाहिर जाहिर ना हुई, एक दूजे रखी छिपाए ॥२२॥
श्री जीयें अपना चित्त, समझाय कियो फेर । अवगुन उठा सो भान के, फेर सुध किया दूसरी बेर ॥२३॥
इहाँ सेती चलके, आये मंडई बन्दर । तहाँ साथ सब आये मिले, बाग में लई जागा उतारा कर ॥२४॥
गये बिहारी जी खंभालिये, इहाँ दज्जालें किया सोर । मोमिन एक ठौर भये, इनें पहुंचाऊं जोर ॥२५॥
तब एक सख्स से, कहया राजा आगे । तुम्हारे गांव में श्री मेहेराज, इत आये उतरेंगे ॥२६॥
वह रखता था दुसमनी, दिल में असल की । तिन चौकी बैठाई सब ठौरों, करी बड़ी हराम खोरी ॥२७॥
सब साथ चढ़े नाव पर, रहे श्री जी आप एकले । जब चढ़ने लगे नाव में, छींक भई तिन समें ॥२८॥
तब श्री जी पीछे हटे, हम ना चढ़े इस ठाम । सकुन मोकों ना भयो, और राह चलें इन काम ॥२९॥
जब इहाँ से नाव चली, लगा वायु जोर । खंभालिये आये पहुंचे, किया दज्जालें बड़ा सोर ॥३०॥
साथ सब पकड़े गये, उत माहें राज द्वार । साथ सूरत का सब था, सो हुआ खबरदार ॥३१॥
बहुत जाप्ता तिन किया, चल्या न कछु लगार । खलास किये दूसरे दिन, हुये तरफ धनी निरधार ॥३२॥
महामति कहें ऐ साथ जी, ये नलिये की बीतक । अब सूरत की कहों, जो आज्ञा है हक ॥३३॥
(प्रकरण ३०, चौपाई १३५०)
