श्री बीतक - प्रकरण ३१
श्री जी साहिब जी खुस्की चले, रण आन उतरे । चीरक भेष करके, धोरा जी मारग पन्थ चढ़े ॥१॥
ए जो साथ सूरत का, खंभालिया से चले । धोरा जी में उतरे, श्री जी साहिब सों आये मिले ॥२॥
प्रेम जी थावर सुनी, गाड़ी ले दौड़े ये । आये मिले मारग में, साथ को चढ़ाय लिये जे ॥३॥
पदमसी सेवा मिने, रहया हता दस दिन । तहां से आये घोघे मिने, तीन दिन रहे सैयन ॥४॥
तहाँ से सुहाली उतरे, फेर आये सूरत । गये सैयद पुर भगवान के, मोहनदास के रहे तित ॥५॥
तहां से सिवजी के, था घर के जोड़े घर । उतारे तिन मिने, हुआ सेवा में ततपर ॥६॥
सत्रह महीनें तहाँ रहे, कहों ताकी बीतक । जिन भाँत लीला करी, सो याद करो बुजरक ॥७॥
मोहन दास अमीन के, तित चरचा हुई जोर । तहाँ दज्जालें देख के, करने लगा सोर ॥८॥
तब वहाँ से उठ के, आये सैयद पुर में । तहां सिवजी भाई हते, सेवा भली हुई इन सें ॥९॥
पहिले ए जो साथ था, सिवजी राम जी नाम । तिनको समझाय के, भेजे बिहारी जी के ठाम ॥१०॥
तुम जाय दीदार उत करो, जोलों उत ना लगों कदम । तोलों तुम्हारी अलौकिक, सुध न होय आतम ॥११॥
इन भांत समझाय के, भेजे भाई सिवजी को । फेर पाती लिख दई रामजी को, सो भी चले इन काम मों ॥१२॥
सिवजी पाती दै मिले, जाय के लगे कदम । पांच मोहोर खर्च करी, उन निरमल करी आतम ॥१३॥
राम जी पाती ले गया, उनको न दिया आवनें । पाती ना लई तिनकी, साथ में न दिया पैठने ॥१४॥
रोय धोय विनती करी, और तीन किये उपवास । दया ना करी किनने, तब टूटी इनकी आस ॥१५॥
उन पाती फेर दई, कही अपनी बीतक । श्री जी तब दिलगीर भये, दिल में भई सक ॥१६॥
रहे धारा श्री जी के संग, सो बिहारी जी सुन्या मजकूर । कही जिनको हम निकालत, ताए ए ना करत क्यों दूर ॥१७॥
इन बात की उनके, दिल में रहे सक । मेरा हुकम ना मानत, ए आप कहावें बुजरक ॥१८॥
रामजी को हम काढ़िया, इन तिन को रख्या साथ में । ए भली न करी इनों ने, दुख पाया इन बात सें ॥१९॥
तब श्री जी साहिब जी नें सुनी, बिहारी जी पायो बड़ो दुख । मैं काढ़ों ताय ए रखें, इन हम सों फेरया मुख ॥२०॥
तब श्री जी साहिब जी नें कहया, जो कोई लूला पांगला साथ । इन्द्रावती न छोड़े तिनको, पहुंचावे पकड़ हाथ ॥२१॥
इन समय गोवरधन, आया अबासी बन्दर से । सो भी आये के इत, रहया भेला साथ मिनें ॥२२॥
तिन सेवा श्रीजीय की, सिर लई अपनें । सब खर्चनें लगा साथ में, सुफल जनम करनें ॥२३॥
सोर पड़ा सहर में, चरचा को आवे खलक । ले दिल में सक आवहीं, कर दीदार होय बेसक ॥२४॥
भीम स्याम भट्ट सुनी, करने आये दीदार । चरचा इत बड़ी भई, उनों किया बड़ा प्यार ॥२५॥
इन प्यार के बांधे, करने आवें दीदार । भयो रस चरचा को, हम समझें परवरदिगार ॥२६॥
उनों एक पख वेदान्त का, तिन गुरु सन्यासी संभूनाथ । ताय वस्तो गत दूसरा नही, इन चरचा लगे साथ ॥२७॥
जो खोज करे आतम की, ताय दिल में न होए विकार । सब आतम देखहीं, एही करे करार ॥२८॥
ए लगे चरचा समझनें, इत सर्व देसी चरचा होए । ताय सुन के अचरज, पावत हैं सब कोए ॥२९॥
वेदान्त की चरचा, वह तो जानत सब । ए चरचा तिन ऊपर, और कोई नहीं मतलब ॥३०॥
ए सुन के स्याम भट्ट, करनें लगा विचार । भीम भाई को कहया, तुम हूजो खबरदार ॥३१॥
वेदान्त के खोज की, इनों से छिपे नही सुकन । तिन ऊपर बतावत, ए कौन राह रोसन ॥३२॥
एह विचार करते, भीम की खुली नजर । ए तो अक्षर पार के, नजरों आई फजर ॥३३॥
आपन थे व्यापक लों, जानी सूरत एक । जब नींद उड़ी अक्षर की, ए जो फैली उड़ी अनेक ॥३४॥
ए तिन अक्षर के पार की, लीला बताई अखण्ड । त्रिगुन विष्णु महाविष्णु की, बोय न लोक ब्रह्मांड ॥३५॥
भीम की नजर खुली, जाय पहुंची लीला मों । तब आये कदमों लगा, अपनें कबीले सों ॥३६॥
पहिले गुरु से तोड़ के, आया बीच निजधाम । चरचा का सुख पाए के, रहया मोमिनों के काम ॥३७॥
एक व्यास गोविन्द जी, रहे वल्लभी मारग में । उनने चरचा सुनी, भागवत के बचनों सें ॥३८॥
इन समय भागवत की, मारग बल्लभाचारज । तिनके टीका मिने, था सैंयों का कारज ॥३९॥
इनकों कछु ना खुलहीं, चालीस प्रस्न तिन में । सो लिख के धर उतारिए, ए लिया चाहिये इन सें ॥४०॥
ए जो दलाल वल्लभ, रहे अपने साथ । सो मेहनत कर ल्याइया, आन दई श्री जी के हाथ ॥४१॥
तिन प्रस्नों की चरचा, कहवाई गोविन्द जी के मुख । तिनको तिनसे समझाइया, तिन पाया बड़ा सुख ॥४२॥
सो तबहीं कदमों लगा, आया साथ मिने । तब दज्जाल के लसकर के, लगे निंदा करने तिन से ॥४३॥
एह कीर्तन हुये तिन पर, मीठी वल्लभाचारज बान । कोई भली बुरी कहने लगे, काहू काहू भई पहिचान ॥४४॥
कोई आवे लड़ने, कोई आवे निन्दक । जब पावे दीदार, तब सुकर कहवे हक ॥४५॥
इनकी निंदा जो करे, सो होवे ख्वार । ए तो साध बड़े हैं, हैं तरफ धनी निरधार ॥४६॥
मानिक आवे दीदार को, सोहबत संग भगवान । इनको चरचा सुनते, होय गई पहिचान ॥४७॥
बिहारी जी इन समें, पाती लिख भेजे कलाम । तीन बात का बन्धेज, हम किया इस ठाम ॥४८॥
सो तुम भी कीजियो, ए बात बहुत सिरे । ए बात तुम उत करो, तो इत भी आन फिरे ॥४९॥
एक तो नीच जात को, सुनाइयो नहीं तारतम । दूजे रांड स्त्रीय को, तीजे कहें हम तुम ॥५०॥
एह तीन बात को, जहूर कीजो उत । धर्म उज्जवल देखियो, कोई करे न निन्दा कित ॥५१॥
ए बात पाती की सुन के, श्री जी लिखी खबर । तुम बाहिर दृष्ट छोड़ के, देखो अन्तर को नजर ॥५२॥
जवाब तीन बात का, हम तुम्हें लिखों बनाए । ताको विचार कीजियो, श्री देवचन्द्र जी राह चलाए ॥५३॥
उननें जात भेष को, भान डारया सीस । देख्यो जित अंकूर को, तित करी बखसीस ॥५४॥
सो देखो तुम जाहिर, खोजी बाई मुसलमान । और ओ स्त्री रांड थी, बखस्यो रही बाई वासना जान ॥५५॥
सो ए बात तुम देखी है, उनकी दृष्ट जात भेष पर नाहिं । जित देखो अंकूर धाम को, गिनो ऊंच नीच न ताहिं ॥५६॥
और उनने ए कही, ए लीला आई अखण्ड । या लीला के प्रताप तें, होए बका ब्रह्माण्ड ॥५७॥
सो हम तुम वस्त को, कहाँ लो कहते फिरें । जिनको पहुंचे तारतम, सोई प्रकास करे ॥५८॥
जित होए अंकूर निजधाम को, गिनिये ऊंच नीच न तित । ए राह श्री देवचन्द जीयें, कही आतम दृष्ट की इत ॥५९॥
सोई लिखी वेद पुरान में, जहाँ भक्त प्रगट होई । तिनकी जात पात न देखिए, ए बैकुण्ठ वालों की राह सोई ॥६०॥
ए राह श्री देवचन्द्र जीयें, हमको तुम आगे दई दिखाई । सोई तुम सब साथ को, अब वोही देओ बताई ॥६१॥
तो राह ए चलसी, होए बड़ो प्रकास । साथ सब दौड़सी, ले दिल जागनी की आस ॥६२॥
साथ सबे उतरयो, चारों वर्णो माहिं । ए बन्धेज बांधे से, होए अकारज ताहिं ॥६३॥
इन भांत की हकीकत, लिखों जवाब बिहारी जी ऊपर । और भेजी किताब कलस की, लेने मसनंद खबर ॥६४॥
सुन के बिहारी जी नें, बड़ो पायो दुःख तब । न मानों कलस को, देखी पाती जब ॥६५॥
उन लिख भेजी पातीय को, तुम्हारी राह भई और । और हमारी भी और है, भई जुदागी इस ठौर ॥६६॥
हम तो तुमको चीन्हया, तुम्हारे माहें कलाम । तुम नही हमारे साथ में, हम काढ़ें तुम्हें इस धाम ॥६७॥
हम जिन साथ को काढ़िया, क्यों तिन को लिया बीच दीन । तो इत तुमको हमारा, छूट गया आकीन ॥६८॥
तिस वास्ते हम तुमको, किए साथ से दूर । हमारे तुमारे नाता न रहया, जिन पाती करो मजकूर ॥६९॥
इन भाँत पाती लिखी, आए पहुंची सूरत । तब श्री जीयें विचारिया, ऐसा हुआ बखत ॥७०॥
ऐसा तो न चाहिये, जो हमको ऐसे लिखे सुकन । हमसे तकसीर ना पड़ी, ए काम नही सैंयन ॥७१॥
इन समें सब साथ ने, करी ए मसलहत । बैठे श्री देवचन्द्र जी किनके हिरदे, तुम तौल देखो इत ॥७२॥
कही ए श्री जी साहिब जी सों, तुम लेओ हक सिर काम । साथ को जमा करना, बीच दीन इसलाम ॥७३॥
कोई उनसे साथ में, ल्याया नही ईमान । चरचा राज की करके, काहू न भई पहिचान ॥७४॥
जिनको तुम समझाए के, भेजत हो उन तरफ । सो विकार पाए के, खाए आवत सब सक ॥७५॥
अब तुम क्या देखत, नजर करो तरफ धाम । लेओ तुम सिर आपने, दीन इसलाम का काम ॥७६॥
साथ सब लागू हुये, आगा किया भाई भीम । चरचा करके सिर ले, लिया जस अजीम ॥७७॥
तब पाती का जवाब, लिख भेजे कलाम । तुम हमको काढ़े साथ से, हम सिर पर लिया काम ॥७८॥
जो हम स्वारथ को, दौड़ करेंगे इत । तो सीधा कबहूं न होएगा, हम जायेंगे तित ॥७९॥
और साथ के वास्ते, जो हम करत मेहनत । तो हमारे सीधा होयगा, नजीक है साइत ॥८०॥
इन भांत का जवाब, पाती में लिखे कलाम । हम तो कमर बांधी, श्री निजधाम के काम ॥८१॥
इन समय लालदास, साथ आया ठट्ठे से । सुदामा पुर पहुंचिया, कहों बीतक तिन से ॥८२॥
सम्बत् सत्रह सताईसे, पहुंचे सुदामा पुर । तहां भीम पीताम्बर मिले, हुई चरचा तिन ऊपर ॥८३॥
कछुक इन ठट्ठे मिने, चरचा देखी जब । वहां दोऊ लागू भये, सुनायो तारतम तब ॥८४॥
कोइक दिन पीछे उने, सुनायो श्री तारतम । ए दोऊ जने तबहीं, सौंप चुके आतम ॥८५॥
तब दज्जाल इन समें, लगा जो करने सोर । विठलेस गुसांई के, लगे निंदा करने जोर ॥८६॥
वल्लभी मारग में, खड़ भड़ पड़ी उत । ए कौन मारग पैदा भयो, ए चलें सेवक इत ॥८७॥
हमारो तो बड़ों मारग, चारों खूंटों रोसन । तिन भांत के और को, बतावत साधुजन ॥८८॥
श्री राज के दर्सन की, चरचा होवे जोर । दज्जाल तिनकी करे, अपनी सिपाह में सोर ॥८९॥
धरम उंदरियों पैदा भयो, पांव बांधत घूंघरी । थाल धरे परदा करें, देखो ऐसी राह चली ॥९०॥
कहें हमारे घरों, श्री कृष्ण जी पधारत । सो अरूगाय के, एही राह चलावत ॥९१॥
इन भाँत सहर में, निंदा निस दिन होय । पूछे प्रस्न भागवत के, ताको अरथ न कहवे कोय ॥९२॥
काहू को सांची भासे, कोई चरचा सुन होवे गलित । कोई अस्तुति करे, जो देखे आये के तित ॥९३॥
रब्द प्रस्न चरचा का, रात दिन उत होय । जवाब काहू न आवहीं, क्यों उत्तर देवें सोय ॥९४॥
यों करते लोग इन समें, लगे चरचा सुनने को । गोपी साथ में आइया, खेमजी जोसी इन मां ॥९५॥
दामा और सूरचन्द्र, और वस्ता नाम । लालबाई धनियानी, भए दाखिल निजधाम ॥९६॥
इहाँ होय चरचा उच्छव, आया इत प्रधान । और आया मसकत से, महाव का बेटा कान ॥९७॥
यों एक गांठ होय चली, आवने लगा नया साथ । सोई चरचा सुनत हैं, जाके धनिये पकड़े हाथ ॥९८॥
लाल दास को इन समें, भई माया की उरझन । इनको राजें काढ़ के, चाहिये कदमों पहुंचे मोमिन ॥९९॥
तब माया की तरफ का, हुआ धक्का जोर । दज्जालें जोरा किया, ऊपर करने लगा सोर ॥१००॥
जब कछु न रहया हाथ में, तब माया दिया छोड़ । तब नजर करी तरफ राज के, चित माया से लिया मोड़ ॥१०१॥
अन्न का नेम लिया, जब मैं करों दीदार । नवतनपुरी जाय के, देखों धनी निरधार ॥१०२॥
तब लों अनाज ना लेऊं, तोलो करों फल आहार । इन भांत चलने लगे, ऐसा किया विचार ॥१०३॥
जब मगरोल पाटन, आये पहुंचे इत । तहाँ दज्जाल बैठा था, कहे तुम जाओ सूरत ॥१०४॥
बहुत रद बदल भई, माने नही सुकन । तब देखा तरफ श्री राज की, हुई आज्ञा ऊपर सैयन ॥१०५॥
तब उहाँ से दीप आये, तहां रहे पन्द्रह दिन । साथ सों मुलाकात करी, फेर घोघे पहुंचे ततखिन ॥१०६॥
तहाँ से नाव चढ़ के, आये बन्दर सूरत । सम्बत् सत्रह सौ उन्तीसे, इहाँ आय पहुंची सरत ॥१०७॥
आय के श्री जी साहिब जी के, लगे दोऊ कदम । नेम था अनाज का, सौंपी थी आतम ॥१०८॥
श्री जी अपने चित्त में, बड़ो पायो सुख । प्रसाद लेओ उठो अब, यों कहया श्री मुख ॥१०९॥
तब लालदासें कहया, हमको अगड़ है अनाज । जाऊं बिहारी जी के कदमों, अनाज छोड़े तिन काज ॥११०॥
तब आप श्री मुख कहया, भया पूरा तुम्हारा पन । कछु फिकर ना करो, पहुंचे मिलावे सैयन ॥१११॥
महामति कहे ऐ मोमिनों, ए सरत करो याद । फेर लाल आगे की कहों, जो झगड़े को बुनियाद ॥११२॥
(प्रकरण ३१, चौपाई १४६२)
