श्री बीतक - प्रकरण ३२
हजरतें हज इत करी, लेनें को मक्का । फते करी दज्जाल की, कूच करे दारूल बका ॥१॥
सहर मदीना सूरत, तहाँ सेती चले जब । महाजरों मद्दत करी, जो साथ सेवा में चले तब ॥२॥
तिन मोमिन की सिफत, पहुंची बका में जब । कुरान हदीसों में कही, सबों ऊपर सिफत अब ॥३॥
सो लिखी लोमोफूज़ में, कहत अल्ला कलाम । अग्यारे सें बरस आगूं ही, सब पढ़े खलक आम ॥४॥
श्री धनी देवचन्द्र जी ल्याए, किल्ली अल्ला कलाम । श्री जी आप जाहिर करी, दिया मोमिनों को ताम ॥५॥
मोमिन सुंनत जमात में, बातें करें बीतक । हक का प्यार इन पर, ए बात बड़ी बुजरक ॥६॥
जिनों सेवा करी सनेह सों, तन मन दिया धन । तो आए इसलाम में, ए खासल खास मोमिन ॥७॥
उतरी अरवाहें अरस से, तिनको ढूंढ़न काज । और जबरूती फिरस्ते, हुकुम दिया श्री राज ॥८॥
एही थे ब्रज रास में, हुए पूरन नही मनोरथ । तब तीसरो ए रचनों पड़यो, इने दिखावन अरथ ॥९॥
तीसरो उपजो अक्षर को, जाने तैसा ही इंड । सब जाने हम वही हैं, काहू खबर न पड़ी ब्रह्मांड ॥१०॥
तामें आई सृष्ट ब्रह्म की, ए जो खासल खास उमत । ताको जगावें जुगत सों, दावत कर क्यामत ॥११॥
सकुण्डल सकुमार को, चले जगावन काज । श्री मुख श्री देवचन्द्र जी कही, बुलाए ल्याओ श्री मेहेराज ॥१२॥
कुली कलिंगा दज्जाल सों, जंग करो जाय तुम । देह बुध छोड़ाय के, ल्याओ बुध आतम ॥१३॥
धरम विरोध धरा मिनें, करता कुली दज्जाल । ताको मारो सिताब सों, ज्यों होवें सब खुसाल ॥१४॥
एक दीन होए एक का, सब भजन करे भगवान । देओ वेद कतेब की साहिदी, ज्यों ल्यावें सब ईमान ॥१५॥
गाजी बनी असराईल, तामें श्री देवचन्द्र जी सिरदार । लड़े राह खुदाए के वास्ते, ए जो महिने हजार ॥१६॥
तिन से भी बेहतर कही, श्री जी बांधी कमर । जाहिर करी जगत में, ए लड़ाई सब पर ॥१७॥
तिन लड़ाई के बखत में, जिनों करी मद्दत । तिनकी मेहनत इन जुबां, करी न जाए सिफत ॥१८॥
तिनके नाम कहत हों, सुनियो चित दे साथ । कूवत दई कादर ने, पकड़े अपने हाथ ॥१९॥
संग चले सेवन को, ए जो मोमिन खासल खास । इनको श्री धाम धनी बिना, और न उपजे आस ॥२०॥
(प्रकरण ३२, चौपाई १४८२)
