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विषय-सूची

श्री बीतक - प्रकरण ३३

श्री जी संग श्री बाई जी, और भट्ट गोवरधन । सेवा करी तन धन सों, तो हुआ साथ में धन धन ॥१॥

भीम भाई भली भांत सों, निकस्या तन ले धन । सेवा करी उमर लों, गाए प्रेम बचन ॥२॥

नागजी अति नेह सों, छोड़ कुटुम्ब की आस । तन, मन, धन सब ले चला, पाया खिताब नाम गरीब दास ॥३॥

स्याम भट्ट संग चल्या, रहया केतेक दिन । वचन वेदान्त सुनावत, कर न सका बस मन ॥४॥

नाहना भाई और पाखड़ी, चले श्री राज के साथ । आखर लों निबाहिया, जाके धनिये पकड़े हाथ ॥५॥

कान जी रामी चला, ले कबीला संग । आखर लों निबाहिया, कोई रहा न पीछे अंग ॥६॥

जमुनाबाई संग चली, छोड़ कुटुम्ब परिवार । सेवा करी सनेह सों, जान के परवरदिगार ॥७॥

छबीलदास संग चले, सेवन के सुख काज । बेटा जमुना का जान के, सेवा दई श्री राज ॥८॥

कोई दिन धारा रहे आए, फेर के जाए पीछे । पत्रियाँ पहुंचावें साथ मों, ऐ काम इन के ॥९॥

लालबाई संग चली, स्याम बाई को ले । श्री बाई जी की सेवा मिने, काम जो करती ए ॥१०॥

लाल दास संग चले, खाली लेकर हाथ । निबहे आखर लों, चले श्री राज के साथ ॥११॥

सुकदेव सूरत से, ले चले संग मानिक । अपना आपा डारिया, पहुंचे मेरते बुजरक ॥१२॥

प्रेम जी अति प्रेम सों, मारग में मिले धाए । हाजिर रहे हजूर में, सेवा करी चित ल्याए ॥१३॥

सूरत सेती चल के, आए पहुंचे गुजरात । राह खुदाए के वास्ते लड़े, मेटन को जुलमात ॥१४॥

गुजरात के बीच में, चार दिन रहे येह । तहाँ सेती कूच करके, सिद्धपुर पहुंचे तेह ॥१५॥

लछमन कबीला लेय के, पहुंचे हैं गुजरात । कबीला भारी भया, कही रहने की बात ॥१६॥

तिस वास्ते रहया बीच में, माया के सुख काज । उमर खोई तिन में, फेर सुरत करी श्री राज ॥१७॥

सिद्धपुर के बीच में, रहे बाईस दिन । भगवान उपाध्याय ने सेवा, करी अति मगन ॥१८॥

और भगवान का, रेवादास है नाम । पहुंचा पालन पुर में, इनके पूरे मनोरथ काम ॥१९॥

ए तीरथ गुरु होए मिलया, कछु न हुई खबर । एक मोहर दे विदा कियो, फेर लालच करी ऊपर ॥२०॥

तब गोवरधन ने कहया, करो इन सरूप की पहिचान । मांगो अलौकिक इन से, तुम को दे ईमान ॥२१॥

तब अरज करी भगवान ने, लगा दोऊ कदम । परआतम पहिचान के, जगाओ मेरी आतम ॥२२॥

तब चार सुकन चलते कहे, याद करो निजधाम । जमुना ताल घाट की, और अक्षर मुकाम ॥२३॥

ब्रज रास में हम थे, भी तीसरे आए इत । अब खेल देख पीछे फिरें, जाए लगें हम तित ॥२४॥

ए बात चित धर के, फेर आए अपने ठौर । सोई बात दिल में रखी, काहू न कहवे और ॥२५॥

बोला नही छः मास लों, रहे केसव भट्ट सोहबत । तिनसों चरचा करते, एक छत्री निकला इत ॥२६॥

तिनने हमें परमोधिया, दो एक कहे बचन । सोई बचन हम से कहो, तिनके दो एक सुकन ॥२७॥

तब दो एक सुकन, कह दिखाया धाम । तब केसव पहिचानिया, कहा कहों तुम्हें इस ठाम ॥२८॥

यह तो अक्षरातीत था, तुम न करी पहिचान । अब मैं उतहीं जात हों, मुझे आया ईमान ॥२९॥

ओ ऐसे ही उत से चल्या, ढूंढ़त फिरे सब ठौर । ढूंढ़ते दिल्‍ली पहुंचिया, खोज करी अत जोर ॥३०॥

रामचन्द पंसारी के इहां से, पाई इने खबर । लाल दरवाजे आय मिल्या, अति आतुर होए कर ॥३१॥

कोई दिन तहाँ रहया, सुने सुकन सुभान । तारतम नीके जानिया, कछु ज्यादा भई पहिचान ॥३२॥

तब लड़ने दज्जाल सों, बांधी कम्मर जोर । फेर आये सिद्धपुर में, किया साथ काढ़नें का सोर ॥३३॥

भगवान रेवादास को नसीहत, फेर के दई इने चिन्हार । तिनको ल्‍याया साथ में, किया खबरदार ॥३४॥

केसवजी परमोधिया, और द्वारकादास । धाम लीला दिखाय दई, तब टूट गई सब आस ॥३५॥

ऐ भी घर को छोड़ के, गये श्री राज के पास । दिल्‍ली मिने आये मिले, सेवा की दिल आस ॥३६॥

दूजे केसव दास को, दई तारतम सुध । तब लोक अलोक की, छूट गई सब बुध ॥३७॥

त्रीकम गंगादास नें, चरचा सुनी कान । तब ए दिल में धरके, पहुंचा ले ईमान ॥३८॥

बीठल चरचा सुनके, कछुक भई पहिचान । घर कबीला छोड़ के, पहुंचा ले ईमान ॥३९॥

जब जुद्ध भया दज्जाल सों, तब बीठल उपज्या डर । भाग चला पीठ देय के, पहुंचा अपने घर ॥४०॥

थाना थाप्या सिद्धपुर में, केसव भट्ट के घर । धाम चरचा नित होवहीं, साथ रहया पकर ॥४१॥

अब सिद्धपुर से, मेरते पहुंचे धाय । लाभानन्द जती सों, चरचा करी बनाय ॥४२॥

दस दिन चरचा में भये, ठौर ठौर हुओ जब बन्ध । तब कही महातम मेरो गयो, मेरे मारग को परबन्ध ॥४३॥

मारों दाब के पहाड़ में, इनको डारों उलटाय । सब दैत्यों के मंत्र से, भाँत भाँत किये उपाय ॥४४॥

घर परवत उठो नही, तब हार के बैठा ठौर । पंच वासना सब देव जहाँ खड़े, तहाँ मन्त्र चले क्यों और ॥४५॥

देखाऊं में डगाए के, आसन कर बैठा सुन । खोज खोज खाली भया, ग्रह के बैठा मुन ॥४६॥

रामचन्द आये मिले, मेरते के ठौर । सेवा में सामिल रहा, तब आस न रही और ॥४७॥

एक हवेली लेय के, तहां बिराजे श्री राज । चरचा बड़ी होवहीं, रहया न कोई काज ॥४८॥

सोर पड़या सहर में, आवत सब खलक । घेर रहे मध माखी ज्यों, कोई आय बीच हक ॥४९॥

आया चांपसी चित सों, और आया रघुनाथ । छोड़ कुटुम्ब कबीला, चला श्री राज के साथ ॥५०॥

अगरबारे बनियां मिनें, आया राजा राम । समेत कबीला आपनें, सेवा करी तमाम ॥५१॥

झांझन आया साथ में, लिये कुटुम्ब परिवार । ‍ल्याया ईमान अरस पर, पहुंचा परवरदिगार ॥५२॥

और आया मकरन्द, और भाई मानसिंघ । और भाई मोहन मनोहर, ए आये ईमान ले अंग ॥५३॥

और आया सादल, और भाई नन्‍दराम । और आया रिखेस्वर, दो जीवन दास नाम ॥५४॥

और आई सरूप दे, एक बाई लखमी । और आई रंभाबाई, इनों पायी कायमी ॥५५॥

जादी और कुसली, और बाई चाँद तथा मोज । ए आई इसलाम में, करके बड़ी खोज ॥५६॥

भागबाई और तेजबाई, अनूपो राधा नाम । बेनबाई मुरलीधर, ये दाखिल निजधाम ॥५७॥

ए आवत चरचा को, बानी सुनत श्रवन । खुसाल होवे मन में, सिफत सुने मोमिन ॥५८॥

और इनकी सोहबत से, आया केतेक साथ । तिनके नाम ना लिखे, पर धनिये पकड़े हाथ ॥५९॥

खरची पाती इनकी, पहुंचत लड़ाई मिने । पतली कमरी ओढ़न को, आवत थी उत सें ॥६०॥

इत सब साथ में, राजा राम सिरदार । तारतम बानी सब में, हुआ खबरदार ॥६१॥

और मनाबाई सेवा में, रहवे खबरदार । पावत है दीदार को, रहे तरफ धनी निरधार ॥६२॥

अब इन समै मेरते मिने, बड़ा जो पड़या सोर । चरचा और दीदार को, खलक चली आवे इन ठौर ॥६३॥

सुख बड़ो सब साथ को, इत उपजत है नित । एक मजल जो इन समै, होसी बखत क्यामत ॥६४॥

ये बातें बहुत है, कहा लों कहों बनाय । जो इत लीला में हाजर, ए अनुभव है ताय ॥६५॥

सुनी बात जब जसवंत की, तब पाती लिखी दोय । भट्ट गोवरधन ले चले, पैगाम पहुंचावने सोय ॥६६॥

अटक पार पहुंच के, खबर दई उन जाय । ए अंकूर बिना क्या करें, रहया रस न चरचा ताय ॥६७॥

तहाँ चार मास लगे, रहे मेरते में इन बखत । एक दिन बाहिर चलते, मारग खड़े तित ॥६८॥

बांग मुनारे पर चढ़के, दई मुल्ला नें जब । कानों सुन आवाज को, दिल विचार किया तब ॥६९॥

ऊपर चढ़ कलमा कहया, ला इलाह इल्लिल्लाह । महंमद रसूल अल्ला तिनकी, ए खबर कहे अल्लाह ॥७०॥

ला तो नाहीं को कहया, इलाह तो है हक । ए अक्षर अछरातीत की, बात बड़ी बुजरक ॥७१॥

ए तो श्री देवचन्द्र जी कही, तहाँ से आये तुम । दूसरा तो कोई है नही, इनका कौन दावा करे बिना हम ॥७२॥

तहकीक हमारे कासिद, हम वास्ते ल्याये कलाम । सब खबर हमारी होयगी, ल्याये महम्मद अलेह सलाम ॥७३॥

महामति कहें ए साथ जी, इहाँ लों ईसा का इलम । अब महम्मद को मिल चला, कहों एक दीन आदम ॥७४॥

(प्रकरण ३३, चौपाई १५५६)

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