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श्री बीतक - प्रकरण ३४

इहाँ लगे कतेब की, चरचा में न चित । कलमा से हासिल किया, लिया मुहम्मद मता इत ॥१॥

लालदास को कहया, आज एक बात पाई। तब अरज करी लालदास ने, ए हमको देओ दिखाई ॥२॥

तब बात कलमें की, कर दिखाई सब । मुहम्मद कुरान ल्याये, सब तुमारा मतलब ॥३॥

इत महम्मद सो मिल चले, तब अहमद पाया खिताब । ईसा और महम्मद मिले, मारे दज्जाल सिताब ॥४॥

अब लड़ाई करने को, जाइये पास सुलतान । इनको प्रथम दावत करें, ए ल्यावे ईमान ॥५॥

श्री देवचन्द्र जी ने कही थी, आवे सकुण्डल सकुमार । तब खेल देख पीछे फिरें, पहुंचे परवरदिगार ॥६॥

तिस वास्ते ढूंढ़ काढ़िये, ए लीला होए जाहिर । कुली दज्जाल को मारिये, करत बदफैली बाहिर ॥७॥

तब साथ सब को, होवेगी खबर । दौड़ेंगे आप अपनी, आए मिले आखर ॥८॥

ए विचार करके, मेरते से चले जब । गोकुल मथुरा आगरे, आए पहुंचे तब ॥९॥

कोई दिन तहाँ रह के, दिल्‍ली पहुंचे धाए । कितनाक साथ ठठे का, इत पहुंचा आए ॥१०॥

हरि राम चौधरी, और चिन्तामन लालमन । और रामचन्द्र आये पहुंचे, रहे कोइक दिन ॥११॥

ईश्वर दास चोबदार, ए रहया बरस दोए । पीछे माया लहर में, रह न सक्या सोए ॥१२॥

मलूक चन्द भली भाँत सों, लड़ा दज्जाल सो जोर । सौंपी अपनी आतम, कछु न आई खोर ॥१३॥

सेखबदल आइया, नीके ग्रहे कदम । लड़ा दज्जाल सों सनमुख, और न मारी दम ॥१४॥

अनन्तराम आये मिला, लड़ाई के बखत । सेवा में सामिल रहया, समय पाया इत ॥१५॥

तुलसी बिहारी दास, और हिरदे राम । कोइक दिन सामिल रहे, फेर घरों किया बिसराम ॥१६॥

ए जो हरिराम भाई का, बेटा हीरानन्द । कोइक दिन रहया सेवा मिने, पीछे पहुंचा अपने वतन ॥१७॥

भाई श्री मुकुन्दास ने, सुन्या सूरत में तारतम । आये पहुंचे सैयद की हवेली में, जाग खड़ी आतम ॥१८॥

रामचन्द्र मेड़ते से, पहुंचा इन सोहबत । कोइक दिन रहके, फेर घर किया इत ॥१९॥

और साथी केतेक, आए के गये अपने घर । पर बात न छूटे दिल से, रहे इसलाम ऊपर ॥२०॥

केतेक मुनकर हुये, सो पैठ न सके इसलाम । जो मुँह नीचा करे साथ, कोई न कहे कलाम ॥२१॥

कोई दिन पीछे आइया, गोवरधन अटक से । लाल दरवाजे आए रहया, गंगाराम की दुकान में ॥२२॥

तहां बचन तारतम के, कहे जो गंगाराम । आसाजीत परबोधिया, तित पाया बिसराम ॥२३॥

नैनसुख महाजन सों, कहें वचन दो चार । तिनने अपने दिल में, किया बड़ा विचार ॥२४॥

फिरते उर्दू बाजार में, मिले गरीबदास । धाय के तिनको मिले, पूछी खबर खास ॥२५॥

कहाँ साथ रहत है, श्री जी आप हैं कित । मैं अपनें साथ को, लेकर आऊं इत ॥२६॥

पूरे विट्ठल गौर के, सैयद की हवेली में । तहाँ श्री जी रहत हैं, मैं खबर करों इनसें ॥२७॥

गोवरधन अपने घर गया, आया गरीबदास । खबर करी श्री राज सों, आया गोबरधन खास ॥२८॥

ब्रत समै गोवरधन, ल्याया अपने संगी मिलाए । सब आए कदमों लगे, बीतक कही बनाए ॥२९॥

इन हवेली में आप, मास छः रहे । तहाँ से लाल दरवाजे को, ले चला उत के ॥३०॥

इहाँ आए सकुमार को, पाती लिखी बनाए । बाईस प्रस्न तिन में, लिखे चित सों ल्याए ॥३१॥

इन पाती लिखने में रहें, श्री जी और लालदास । रात दिन मेहनत करी, श्री राज सेवन की आस ॥३२॥

ए पाती लेइ के, आये लाल दरवाजे । हवेली छत्रीय की, तिन में रहे आये ॥३३॥

तहां आए बैठ के, बड़ी करी मसलहत । पूछा विचार सब को, कहा करनो अब इत ॥३४॥

आसाजीत आइया, लगा श्री राज के कदम । तब ए बिचार पूछिया, कहा करनो अब हम ॥३५॥

तब आसा जीत को, पाती पढ़ सुनाई । सुनके उन उत्तर दियो, ए पाती क्यों दिखाई ॥३६॥

ऐ तो हिन्दुअन का, हमेसा रहत दुसमन । प्रात को मुंह ना देखहीं, ए आप कहावत मोमिन ॥३७॥

सो पाती हिन्दवी की, क्यों कर सुने कान । सरियत है जोरावर, है पोहोरा मुसलमान ॥३८॥

मास दोय इहाँ रहे, होए चरचा वेद वेदान्त । ऊपर अटारी के, बैठत हैं एकान्त ॥३९॥

इत सूफी एक आवत, चरचा सुनाई ताए । मीठी लगी तिन को, लालच को इत आए ॥४०॥

दयाराम दिल प्रेम सों, इत आया तिन ईमान । ल्याया सबके देखते, है खास सैयों में जान ॥४१॥

दया राम को ल्याईया, ऐ जो भाई नैन सुख । सुख दयाराम जो पाईया, सो कहो न जाए मुख ॥४२॥

चंचल आगे चरचा, करी जो दया राम । यह भी ईमान ल्याईया, बड़ा पाया बिसराम ॥४३॥

हरप्रसाद हरकरन, चरचा सुनी न किनके मुख । इन दोऊ भाइयों को, ल्‍याया बीच इन सुख ॥४४॥

ए दोऊ भाई प्रेम सों, चरचा छिपके सुनते । ईमान पूरा ल्‍याये, पर बड़कों से डरते ॥४५॥

और भिखारी दास नें, कछु चरचा सुनी । ऊपर की पहचान सों, सेवा करी अपनी ॥४६॥

श्री राज को घरों पधराए के, अरूगाया थाल । साथ सब की सेवा करी, होए के दिल खुसाल ॥४७॥

गंगाराम आवत, खाली हाथों न कब । पावें भली वस्त बाजार में, राज आगे धरे सब ॥४८॥

दयाराम आवत, ल्‍यावें मिठाई पकवान । नये नये मेवे लेय के, ल्यावत दिल ईमान ॥४९॥

चंचल अपनी दूकान से, ल्यावत कर चोरी । ल्यावें श्री राज के वास्ते, अंग उमंग करी ॥५०॥

कुटुम्ब कबीला लड़ते, बरजत रहे हमेस । तिनका मोंह मार के, काहू न गिनत खेस ॥५१॥

रामचन्द पंसारी नें, करी उपली पहिचान । खिजमत अपने माफक, करी ऐसी जान ॥५२॥

महाजन जेठा वेदान्ती, चरचा सुनता कान । सुकन भले चीनता, पर छूटा न सुंन मकान ॥५३॥

अब ए विचार करने लगे, क्यों ए बात सुने सुलतान । इत बैठे ना बनत, बड़ा अमल सैतान ॥५४॥

कोइक जागा पकड़ के, लड़ें इनसे हम । वचन इने सुनावनें, कहो इलाज कोई तुम ॥५५॥

ऐसा विचार करके, दिल्‍ली से चले जब । साहजहानपुर बोड़िया मिने, आये पहुंचे तब ॥५६॥

केतेक साथ दिल्‍ली मिने, राख के आप चले । हम लेंइगे पीछे ते खबर, जाएंगे उस जगे ॥५७॥

महामत कहें ऐ साथ जी, याद करो धनी तुम । उतरी मेहर हक से, जगाओ अपनी आतम ॥५८॥

(प्रकरण ३४, चौपाई १६१४)

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