श्री बीतक - प्रकरण ३५
इन समय सूरत से, आया लक्ष्मीदास । रूपा बाई को लेइ के, बेटी जमुना खास ॥१॥
और भाई नारायण दास, और गोविन्द जी दास । रामबाई को लेइ के, दिल राज चरन की आस ॥२॥
और सभा चंद छत्री, भागवती हरीराम । केतक दिन संग रहे, पीछे किया माया में विसराम ॥३॥
लछमीदास के घर मिने, उपली द्रष्ट भई जोर । राज दीदार देवहीं, कछु न दिल में खोर ॥४॥
नित आरोगन आवहीं, आवत बड़ा आवेस । तिस वास्ते माया का, कछु न रहया लवलेस ॥५॥
और राज के दिल में, हांसी करने का काम । तिस वास्ते बातां करें, वायदा किया इस ठाम ॥६॥
आज से सकुमार बाई, आवें आठमें दिन । तब राज बड़ो आदर कियो, कहे बैठाओ जोड़े सैयन ॥७॥
ऐ श्री राज की कृपा, काहू ऊपर होइ । सो मेरे आगे होइ, ऐह काम करे सोइ ॥८॥
जो मेरे आगे होइ, या बैठे मेरे जोड़ । जो श्री देवचन्द्र जी सिर पर हैं, तो करों नही चित मोड़ ॥९॥
नाहीं तो मेरा पीछा, कोई जिन छोड़ो तुम । ऐह प्रकास देख के, जगाओ अपनी आतम ॥१०॥
तब कहया लखमीदास ने, मुझ से आगा ना होए । पर जोड़े तुमारे बैठोंगां, सकुमार जगाऊं सोए ॥११॥
दिन दो-तीन जोड़े बेठा, फेर आड़े आई सरम । स्याम भीम ताना मारते, तब हुआ दिल नरम ॥१२॥
जब आठ दिन पूरे भये, श्री राजें दिया दीदार । तब इनने अरज करी, करो पूरा परवरदिगार ॥१३॥
तब राज हाथ से जुदे हुये, तब हांसी हुई इत । ए तो नही मुकरर, बखत रोज क्यामत ॥१४॥
फेर विचार करके, दिल्ली से चले जब । साहजहानपुर बूड़िए, आये पहुंचे तब ॥१५॥
तहां आजूज माजूज नें, बड़ा जो किया सोर । मरगी पड़ी इन समें, आई थी इत जोर ॥१६॥
इन समें बूड़िए में, पकड़ा नागजी को । मलकल मौत झलूविया, तब मारा तिनका मोंह ॥१७॥
श्री धाम दिखाइ के, दिया अपना जोस । तब काल को मारिया, हो गया फरामोस ॥१८॥
इत सिरदार क्षत्री रहे, तिन करी ऊपर की पहिचान । सेवा करी तिन माफक, कछु न आया हीसे कान ॥१९॥
इहां से निरमलदास को, और जने जो चार । खड़कारी राजा पास, भेजे कर विचार ॥२०॥
तहां जाए के देखिया, तो ए जागा नाहीं जोग । दिन दस एक रहके, फेर आये मिले संजोग ॥२१॥
तब विचार करके, जों सिर पर थे सुकन । सो सोभा दई महंमद को, पहिचान करे मोमिन ॥२२॥
इन भांत सब्द फेर के, किये जब तैयार । तब भीम लालदास को कहया, देओ पैगाम परवरदिगार ॥२३॥
दोनों तैयार होए के, सिर चढ़ाया हुकम । चले बूड़िए सहर से, आये पहुंचे दिल्ली हम ॥२४॥
पीछे ते जबराईलें, दिया जब इलहाम । ए पैगाम जो भेजिया, पर होवेगा नहीं काम ॥२५॥
पीछे से कान जी भाई को, श्री राजें भेजा जब । पेठे दिल्ली में बराबर, हकीकत ल्याया तब ॥२६॥
तुमको पैगाम देने का, हुकम हुआ मनसूक । ए तुमको न मानेगा, पड़ेगी इनसे चूक ॥२७॥
हमको उत आवन देओ, आये के करें विचार । जैसा लाग देखेंगे, तैसा करें करार ॥२८॥
मास एक इत रहे, फेर चले हरद्वार । आये हरद्वार में, ताको कहों विस्तार ॥२९॥
साका सालवाहन का, सोरह से पूरन । बैठा साका विजियाभिनन्द का, तब फिराये फिरके सैयन ॥३०॥
विक्रमाजीत के राज से, बरस सत्रह सै पैंतीस । तब जिद्द हुई फिरकन सों, बुद्ध ईस्वरों के ईस ॥३१॥
हरदार के मेला में, चार सम्प्रदाय ताहिं । षट दर्सन भी तहां मिले, दस नाम सन्यासी जाहिं ॥३२॥
चार वर्ण चार आश्रम, सबे भये एक ठौर । सबने देख श्री राज को, कीनी दिल सक और ॥३३॥
कहया तुम्हारी राह तो नई है, हम सुनी न देखी कांह । झारो दीजे आपनों, तुम हम मारग में नांह ॥३४॥
तब कहे बचन श्री राज नें, तुम प्राचीन पुरातम । सो कहो हमें समझाय कें, आपनो इष्ट जो धरम ॥३५॥
क्रोध अहम को छोड़के, चितसों कहो समझाय । कहो यथार्थ वेद ले, सोई ग्रहें हम आय ॥३६॥
अपनो दृढ़ाव जो होय, सो हमको देओ बताय । तापर सक हमें होवहीं, सो तुम देओ मिटाय ॥३७॥
तब बोले रामानुज, सब सास्त्र वेद मत इष्ट । कहों अगोचर पन्थ सही, देखो अपनी दृष्ट ॥३८॥
हमारे गुरू धर्म में, कही नाम माला उर माहिं । अच्युत गोत्र अत सुचि परम, प्रभु अनन्त साखा जो आहिं ॥३९॥
सुकल हमारो वरण है, सब वर्णों से बाहिर । साम वेद द्वार श्रवना, मुक्त समीपी जाहिर ॥४०॥
मठ बैकुण्ठ है हमारो, सुमेर प्रदखिणा जान । बीज मंत्र निराकार है, नभ सम ब्रह्मे मान ॥४१॥
पद्मनाभ जो क्षेत्र है, मेल कोटा सुख बिलास । लक्ष्मी इष्ट अत गोप है, उजल अति प्रकास ॥४२॥
ये पद्धत लक्ष्मी से चली, ये पद्धत बिन भ्रम आए । चौदह भवन पर बैकुण्ठ है, सोइ अखाड़ा सुहाए ॥४३॥
रंगनाथ हम धाम है, नदी काबेरी तीरथ । देवी है कमला सही, सारे सबे अरथ ॥४४॥
श्री नारायण हैं देवता, विस्णु आचारज होय । गायत्री है अलख निरंजन, कही पद्धति रामानुज सोय ॥४५॥
सुन पद्धत श्री राज नें, किये प्रस्न जो एह । कहयो पंथ अगाध जो, तुम धन्य रामानुज तेह ॥४६॥
जग माहें की कही तुम, कहे वेद जगत को नास । पिण्ड ब्रह्माण्ड दोऊ प्रलय में, तो कहां जीव को वास ॥४७॥
तब बोले नीमानुज, वेद इस्ट जप धाम । अपनी सम्प्रदाय सब कहों, मूल ग्रहो बिसराम ॥४८॥
मथुरा है साला सही, धर्म क्षेत्र गोकुल पुनीत । सुख विलास वृन्दावन में, धाम द्वारका नीत ॥४९॥
नदी गोमती तीरथ, इष्ट रूकमणी होय । यजुर्वेद हर नाम की माला, टारे छल सब सोय ॥५०॥
वृन्दादेवी मुक्त सरूपी, प्रणव मंत्र ऊंकार । चली सम्प्रदा सनकादिक से, प्राचीन मत सार ॥५१॥
गोपाल वंस है गायत्री, गोपाल मंत्र है जान । नारद हैं आचारज, ऋषि दुर्वासा मान ॥५२॥
विस्णु को वाहन सही, गरूड देवता सोए । रक्षा करें सदा सन्त की, ए पद्धत नीमानुज होए ॥५३॥
तब किये प्रस्न श्री राज ने, तुममें नहीं विचार । कछु कही जगत के परे की, कछु जगत मंझार ॥५४॥
सार असार को एक किये, मिले नही मत वेद । तुम बिन सतगुर क्या करो, छूटे नही भव खेद ॥५५॥
तब विस्णु स्याम अचारज ने, अपनी सम्प्रदा सब । इस्ट उपासना वेद जाप, कहों सुनो तुम अब ॥५६॥
विस्णु कांची है धर्मसाला, स्वेत गंगा चक्र तीरथ सोए । सुख विलास इन्द्र दमन मध, जहां निर्मल सब होए ॥५७॥
मारकण्ड है तीरथ, परसोतम पुर धाम । इस्ट लछमी है सही, जगन्नाथ सेवन उपासना नाम ॥५८॥
अथर्व वेद हमरो सही, माला नाम की सार । अच्युत है गोत्र पुन, त्रिपुरारी साखा धार ॥५९॥
सुकल वर्ण तुम जानियो, तुलसी मंत्र है जाप । जल बिंव ऋषि हैं देवता, वामदेव आचारज थाप ॥६०॥
ब्रह्म गायत्री जानियो, महादेव से सम्प्रदा आए । सायुज मुक्त हमने ग्रही, ए विस्णु स्याम सम्प्रदा सुहाए ॥६१॥
तुम तो ऐ जग में कही, ए कहे बचन श्री राज । वेद पुराण जग नास कहे, रहे कहां सम्प्रदा विराज ॥६२॥
तब कही माधवाचारज ने, हमारी सम्प्रदा जोए । गोत्र क्षेत्र इस्ट धाम वेद, सुनों आप तुम सोए ॥६३॥
पुरी अवन्तिका साला सही, नीमखार क्षेत्र होए । सुख विलास है अंगपात मध, बद्रीनाथ धाम है सोए ॥६४॥
अलखा नदी तीरथ हमारो, विध उपासना जान । सावित्री तो इस्ट है, आद वेद ऋग मान ॥६५॥
हरनाम की माला उर में, विस्णु गायत्री है गान । विस्णु हँस रूप मंत्र है, ब्रह्मा आचारज प्रमान ॥६६॥
हंस ऋषि पुनि देवता, ब्रह्मा तें सम्प्रदा आए । सालोक है मुक्त हमारी, ए पद्धत माधवी सुहाए ॥६७॥
तब कहे प्रस्न श्री राज नें, ए तो कही जग माहिं । कहै वेद जग भरम है, तब मुक्त कही सो काहिं ॥६८॥
(प्रकरण ३५, चौपाई १६८२)
